बिजली रानी का लोकतांत्रिक लुकाछिपी खेल
कोटर क्षेत्र में इन दिनों बिजली ने शायद कोई नया लोकतांत्रिक सिद्धांत खोज निकाला है—"सबको समान अवसर मिलना चाहिए, इसलिए अंधेरा भी सबके घर बराबर पहुँचना चाहिए।" परिणाम यह है कि उमस भरी गर्मी में उपभोक्ता पसीना बहा रहे हैं और बिजली रानी आँख-मिचौली का राष्ट्रीय खेल खेल रही हैं।
दिन हो या रात, बिजली का आना-जाना अब किसी सरकारी कार्यक्रम से कम रहस्यमय नहीं रहा। लोग पंखा चलाने का बटन दबाते हैं और उसी क्षण बिजली को शायद यह अपमान लग जाता है कि उससे काम लेने की कोशिश की जा रही है। वह तुरंत ट्रिप होकर बताती है कि लोकतंत्र में उसकी भी स्वतंत्रता है।
उमस ऐसी कि आदमी बैठे-बैठे भाप बन जाए। बच्चे पढ़ाई से अधिक मच्छरों की गणना कर रहे हैं और बुजुर्ग हाथ के पंखे को ऐसे चला रहे हैं मानो स्वतंत्रता संग्राम की कोई अंतिम लड़ाई लड़ रहे हों। घरों में इन्वर्टर भी अब थककर सोच रहा है कि आखिर उसका जन्म बैकअप के लिए हुआ था या स्थायी विद्युत विभाग बनने के लिए।
बिजली विभाग के पास भी अपने तर्क होंगे। कहीं तकनीकी समस्या होगी, कहीं लाइन में फॉल्ट होगा, कहीं मरम्मत का कार्य होगा। लेकिन उपभोक्ता सोचता है कि यदि हर बार कारण इतने ही सम्मानजनक हैं तो समाधान आखिर किस अवकाश पर गया हुआ है?
एक सज्जन कह रहे थे, "पहले लोग मौसम का हाल पूछते थे, अब पूछते हैं—भैया, बिजली है क्या?" दूसरे ने जवाब दिया, "बिजली तो है, बस जनता से मिलने का समय सीमित कर दिया गया है।"
कोटर का आम नागरिक आजकल दो चीजों का इंतजार सबसे अधिक करता है—बरसात और बिजली। फर्क बस इतना है कि बरसात प्रकृति के हाथ में है और बिजली व्यवस्था मनुष्यों के हाथ में। इसलिए बरसात के देर से आने पर शिकायत कम होती है, बिजली के देर से आने पर ज्यादा।
बघेली में कहें तो, "जनता घाम-उमस मा गलान होय जात है अउ बिजली ऐसे रूठी है जइसे गाँव की नाराज बहुरिया। कब आही, कब जाही, कउनौ ठिकाना नाहीं।"
व्यंग्य अपनी जगह है, पर प्रश्न गंभीर है। आधुनिक जीवन में बिजली अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है। यदि अंधेरा ही नियति बन जाए तो विकास के चमकते दावों पर भी प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। आखिर जनता सिर्फ बिल भरने के लिए नहीं, रोशनी पाने के लिए भी उपभोक्ता कहलाती है।
आचार्य प्रताप
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