pita पिता घर की वह दीवार है जिसे कभी रंगा नहीं जाता

पिता : घर की वह दीवार, जिसे कभी रंगा नहीं जाता

आज के युग में जब हर चीज़ की ब्रांडिंग होती है, हर भावना का प्रदर्शन सोशल मीडिया पर होता है और हर रिश्ते को लाइक्स और कमेंट्स की तराजू में तौला जाता है, तब पिता एक ऐसे पात्र हैं जिनकी महानता अक्सर चुप्पी के कोने में खड़ी रह जाती है। माँ के आँचल पर कविताएँ लिखी जाती हैं, गीत गाए जाते हैं, चित्र बनाए जाते हैं; और पिता? वे घर की उस पुरानी दीवार की तरह होते हैं, जो पूरी छत का बोझ उठाती है, पर किसी का ध्यान उस पर नहीं जाता।

शरद जोशी होते तो शायद कहते कि पिता इस देश के सबसे बड़े “अनसंग हीरो” हैं। वे सुबह से शाम तक जीवन की कुश्ती लड़ते हैं और घर लौटकर ऐसे बैठ जाते हैं मानो कुछ हुआ ही न हो। उनके चेहरे पर तनाव की सलवटें होती हैं, मगर बच्चों के सामने मुस्कान का इस्त्री किया हुआ संस्करण प्रस्तुत कर देते हैं।

हरिशंकर परसाई की दृष्टि से देखें तो पिता भारतीय लोकतंत्र के सबसे ईमानदार करदाता हैं। वे अपनी इच्छाओं पर टैक्स देते हैं, अपने सपनों पर अधिभार लगाते हैं और बच्चों की खुशियों के लिए स्वयं को घाटे का बजट घोषित कर देते हैं।

पिता बड़ा विचित्र जीव होता है। बचपन में हमें लगता है कि वह बहुत कठोर है। “बत्ती बुझा दो”, “पानी व्यर्थ मत बहाओ”, “पढ़ाई करो”—ये सारे आदेश हमें किसी तानाशाह के फरमान लगते हैं। लेकिन उम्र के दूसरे छोर पर पहुँचकर पता चलता है कि वह आदमी बिजली का बिल नहीं, भविष्य का अंधेरा बचा रहा था; पानी नहीं, जीवन का मूल्य सिखा रहा था; और पढ़ाई नहीं, संघर्ष से लड़ने का हथियार दे रहा था।

हमारे गाँव-कस्बों में तो पिता की स्थिति और भी रोचक है। बघेली में कहें तो “बाबू” अपने लिए चप्पल घिस लेते हैं, लेकिन लइका के लिए नया जूता जरूर खरीद देते हैं। खुद बरसों पुरानी साइकिल चलाते हैं, मगर बेटे की पढ़ाई के लिए शहर तक का किराया जुटा लेते हैं। उनके त्याग का हिसाब किसी सरकारी पोर्टल पर अपलोड नहीं होता, इसलिए उसका कोई डेटा उपलब्ध नहीं है।

एक दिन स्वर्ग में भगवान ने घोषणा की कि पृथ्वी के सबसे बड़े त्यागी को सम्मानित किया जाएगा। नेता लोग अपने भाषणों की फाइलें लेकर पहुँच गए। अधिकारी अपनी ईमानदारी के प्रमाणपत्र लाए। व्यापारी अपने दान-पुण्य की सूची लेकर खड़े हो गए।

तभी एक साधारण पिता आया। उसके हाथ में कोई प्रमाणपत्र नहीं था।

भगवान ने पूछा, “तुम्हारी उपलब्धि क्या है?”

पिता बोला, “कुछ खास नहीं प्रभु। बस अपने बेटे को इंजीनियर बनाया, बेटी को डॉक्टर बनाया और खुद जीवन भर अपनी इच्छाओं को बेरोजगार रखा।”

भगवान मुस्कुराए और बोले, “बाकी सबने जो किया, उसका रिकॉर्ड है। जो तुमने किया, उसका कोई रिकॉर्ड नहीं। इसलिए सबसे बड़ा सम्मान तुम्हारा है।”
सभा में सन्नाटा छा गया।

असल में पिता का प्रेम बैंक के उस फिक्स्ड डिपॉजिट जैसा होता है, जिसका लाभ वर्षों बाद समझ में आता है। वह प्रेम रोज़-रोज़ दिखाई नहीं देता, लेकिन संकट के समय वही सबसे पहले काम आता है।

विडंबना देखिए कि आधुनिक समाज ने पिता को एटीएम मशीन समझ लिया है। जब जरूरत हो कार्ड डालो, राशि निकालो और काम पूरा होने पर मशीन को भूल जाओ। कोई यह नहीं पूछता कि उस मशीन के भीतर भी भावनाओं की बिजली चलती है या नहीं।

कई बार पिता अपनी थकान को हँसी में छिपा लेते हैं। वे अपनी चिंताओं को चाय की चुस्कियों में घोल देते हैं। उनकी आँखों में भी सपने होते हैं, पर वे उन्हें बच्चों की आँखों में स्थानांतरित कर देते हैं। यह ऐसा निवेश है जिसमें लाभांश हमेशा अगली पीढ़ी को मिलता है।

आज जब समाज अधिकारों की चर्चा खूब करता है, तब कर्तव्यों की मूर्ति बने पिता को याद करना आवश्यक है। वह व्यक्ति जो घर की नींव बनकर रहता है, जिसे कोई पुरस्कार नहीं मिलता, कोई मंच नहीं मिलता, कोई समाचार नहीं बनता—वही पिता परिवार की सबसे बड़ी पूँजी है।

पिता की महानता उनके शब्दों में नहीं, उनकी चुप्पियों में छिपी होती है। वे बरगद की उस छाँव की तरह हैं, जिसके नीचे बैठकर हम धूप को भूल जाते हैं। जब तक वह छाँव हमारे सिर पर रहती है, तब तक उसकी कीमत समझ में नहीं आती।

इसलिए समय रहते उनके त्याग को पहचानिए, उनके संघर्ष को प्रणाम कीजिए और उनके साथ कुछ पल बैठकर यह अवश्य कहिए—“पिताजी, जो कुछ हूँ, आपकी वजह से हूँ।”

क्योंकि संसार में बहुत से लोग हमें सलाह दे सकते हैं, बहुत से लोग हमारी प्रशंसा कर सकते हैं, पर निस्वार्थ भाव से अपना सम्पूर्ण जीवन हमारे लिए समर्पित करने का साहस केवल पिता के पास होता है।

और सच तो यह है कि घर का सबसे मजबूत स्तंभ अक्सर वही होता है, जिस पर सबसे कम सजावट की जाती है।
वह स्तंभ—पिता है। ❤️🙏

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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