“सूर्पणखा अभी जीवित है, बस चेहरे बदल गए हैं”
इतिहास बड़ा विचित्र जीव है। वह कभी मरता नहीं, केवल कपड़े बदलता रहता है। रामायण के पात्र भी शायद इसी सिद्धांत पर चलते हैं। रावण मर गया, लंका जल गई, धनुष टूट गए, सेतु बन गए, पर कुछ चरित्र ऐसे हैं जो अमर हो गए। वे हर युग में नए नाम, नए वस्त्र और नए संबंधों के साथ उपस्थित हो जाते हैं।
इन दिनों एक कथन खूब सुनने को मिलता है—“रावण तो सौ बरस मस्त जी रहा था, जब तक उसकी बहन ने नाटक नहीं किए।” यह कथन सुनकर पहले तो हँसी आती है, फिर थोड़ा विचार करने पर समाज का एक दूसरा चेहरा भी दिखाई देता है।
हमारे यहाँ हर घर में एक छोटा-मोटा लंका-कांड चल रहा है। कहीं भाई-भाई में बोलचाल बंद है, कहीं खेत की मेड़ रिश्तों से ऊँची हो गई है, कहीं पुश्तैनी मकान अदालत में पड़ा है और परिवार व्हाट्सएप के अलग-अलग समूहों में बँट चुका है। आश्चर्य की बात यह है कि इन झगड़ों में वास्तविक कारण अक्सर बहुत छोटा होता है, लेकिन उसे हवा देने वाले लोग बड़े कुशल होते हैं।
परसाई जी होते तो शायद कहते कि भारत में रिश्तेदार दो प्रकार के होते हैं—एक वे जो दुःख में साथ खड़े होते हैं और दूसरे वे जो सुख देखकर दुःखी हो जाते हैं।
आज की सूर्पणखा किसी जंगल में नहीं घूमती। वह वातानुकूलित कमरों में बैठती है, मोबाइल पर सलाह देती है और परिवारों के बीच ऐसी कूटनीति चलाती है कि बड़े-बड़े विदेश मंत्री भी शरमा जाएँ। वह सीधे युद्ध नहीं कराती, बस इतना भर कह देती है—
“तुम तो बड़े सीधे हो, तुम्हारा हक कोई और ले जाएगा।”
बस, इसके बाद घर में महाभारत का ट्रेलर शुरू हो जाता है।
बघेली में कहें तो, “जेतना नुकसान दुश्मन नइ कर पावत, ओतना कुछ लोग अपन कहिके कर देथें।”
समस्या यह नहीं कि कोई सलाह देता है। समस्या तब शुरू होती है जब सलाह का उद्देश्य परिवार नहीं, अहंकार का पोषण हो। कुछ लोग दूसरों के घर की शांति देखकर ऐसे बेचैन हो जाते हैं जैसे किसी विद्यार्थी को परीक्षा के समय बिजली चली जाने पर होती है।
एक प्रसंग के माध्यम समझिए।
गाँव के रामसेवक और श्यामसेवक दो भाई थे। दोनों साथ रहते थे। खेत भी साझा, कुआँ भी साझा, सुख-दुःख भी साझा। गाँव वाले उदाहरण देते थे।
तभी एक शुभचिंतक रिश्तेदार का आगमन हुआ।
उन्होंने पहले दिन पूछा— “का हो, बड़ा भाई जादा खेत जोतत है कि तुम?”
दूसरे दिन बोले— “तुम्हार हिस्सा तो कम लागत है।”
तीसरे दिन समझाया— “हम तो तुम्हार भलाई खातिर कहत हन।”
और चौथे दिन दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया।
छह महीने बाद खेत बँट गया। एक साल बाद घर बँट गया। दो साल बाद माँ-बाप बँट गए। और तीन साल बाद वही शुभचिंतक किसी दूसरे परिवार की सेवा में लग गए।
यह सेवा-कार्य हमारे समाज में निरंतर चल रहा है।
शरद जोशी जी की शैली में कहें तो कुछ लोग परिवारों में ऐसे प्रवेश करते हैं जैसे सरकारी समिति किसी समस्या के समाधान के लिए गठित की जाती है। समस्या हल हो या न हो, समस्या बड़ी अवश्य हो जाती है।
लेकिन यहाँ एक बात और समझनी होगी।
हर विवाद का दोष किसी एक व्यक्ति पर डाल देना भी उचित नहीं है। यदि घर मजबूत हो, विश्वास गहरा हो और संवाद जीवित हो तो कोई बाहरी व्यक्ति उसे तोड़ नहीं सकता।
सूर्पणखा ने रावण को उकसाया था, पर निर्णय तो रावण ने ही लिया था।
आज भी ऐसा ही है।
कोई यदि कान भरता है और हम बिना सोचे मान लेते हैं, तो दोष केवल कान भरने वाले का नहीं है। दोष उन कानों का भी है जो विवेक की जगह चापलूसी सुनना पसंद करते हैं।
समाज में एक नई प्रजाति पैदा हो गई है—“भावनात्मक सलाहकार”।
इनकी विशेषता यह है कि ये स्वयं अपने घर की समस्याएँ हल नहीं कर पाते, लेकिन दूसरे के घर का नक्शा बदलने की पूर्ण क्षमता रखते हैं।
इनके पास हर समस्या का एक ही समाधान होता है— “अपना हक माँगो।”
अब हक माँगना बुरा नहीं है, पर यदि हक के साथ रिश्ते भी नीलाम हो जाएँ तो लाभ किसका हुआ?
आज अदालतों में वर्षों से चल रहे अनेक पारिवारिक मुकदमों की फाइलें देखकर लगता है कि संपत्ति का मूल्य शायद जमीन से कम और अहंकार से अधिक जुड़ा हुआ है।
बघेली अंचल में बुजुर्ग कहा करते थे— “घर बनाय मा बरिस लगत है, बिगाड़े मा एक दिन।”
यही बात आज और भी सच लगती है।
विडंबना देखिए कि जो लोग परिवारों को जोड़ते हैं, उनका नाम कोई याद नहीं रखता; लेकिन जो लोग तोड़ते हैं, उनकी चर्चा पीढ़ियों तक चलती है।
इसलिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि सूर्पणखा जीवित है या नहीं।
वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारे भीतर का विवेक जीवित है?
क्या हम हर बात पर भड़कने के बजाय समझने का प्रयास करते हैं?
क्या हम रिश्तों को संपत्ति से बड़ा मानते हैं?
क्या हम किसी तीसरे व्यक्ति की राय को अंतिम सत्य मानने के बजाय अपने परिवार से सीधे बात करते हैं?
क्योंकि सच तो यह है कि आज के अधिकांश लंका-कांड सोने की लंका के कारण नहीं, बल्कि मन के भीतर बैठे छोटे-छोटे अहंकारों के कारण होते हैं।
अंततः इतिहास हमें यह नहीं सिखाता कि सूर्पणखा से घृणा करो। इतिहास यह सिखाता है कि किसी के बहकावे में आकर अपने ही घर को आग मत लगाओ।
घर टूटते समय आवाज बहुत कम होती है, लेकिन उसका प्रतिध्वनि वर्षों तक सुनाई देती है।
और जब रिश्ते राख हो जाते हैं, तब अक्सर पता चलता है कि युद्ध जिस “हक” के लिए लड़ा गया था, वह हक तो बच गया, पर अपना कोई बचा ही नहीं।
तब आदमी चुपचाप बैठकर सोचता है—
“काश, उस दिन किसी की बात सुनने के बजाय अपने लोगों की बात सुन ली होती।”
यही वह क्षण है जहाँ रामायण इतिहास नहीं रहती, बल्कि हमारे अपने घर का आईना बन जाती है।
आचार्य प्रताप
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