फेसबुकिया फकीर और किताबों के अनाथ
चेहरे की खूबसूरती समय के साथ ढल जाती है, लेकिन ज्ञान की चमक उम्रभर रहती है" — यह वाक्य आजकल विद्यालयों के नोटिस बोर्ड पर उसी तरह टंगा रहता है जैसे सरकारी कार्यालयों में "रिश्वत लेना और देना दोनों अपराध हैं" लिखा रहता है। दोनों को सब पढ़ते हैं, मानता कोई नहीं।
आज का छात्र बड़ा कर्मयोगी है। वह सुबह उठते ही दर्पण में अपना दर्शन करता है। पहले ऋषि-मुनि आत्मा का साक्षात्कार करते थे, अब विद्यार्थी हेयरस्टाइल का साक्षात्कार करते हैं। पढ़ाई का अध्याय भले अधूरा रह जाए, लेकिन बालों की एक भी लट संविधान के अनुच्छेद की तरह अपनी जगह से इधर-उधर नहीं होनी चाहिए।
हमारे समय में विद्यार्थी स्कूल जाने से पहले बस्ता देखते थे कि किताबें पूरी हैं या नहीं। आज का विद्यार्थी मोबाइल का कैमरा खोलकर देखता है कि चेहरा "फुल एचडी" दिख रहा है या नहीं। गणित का सूत्र भूल जाए तो कोई बात नहीं, लेकिन सेल्फी का एंगल बिगड़ गया तो मानो राष्ट्रीय आपदा आ गई।
एक विद्यालय में मैंने एक छात्र से पूछा, "बेटा, न्यूटन का तीसरा नियम जानते हो?"
वह बोला, "सर, न्यूटन कौन-सा इन्फ्लुएंसर है? इंस्टाग्राम पर है क्या?"
मैंने कहा, "नहीं बेटा, वैज्ञानिक था।"
लड़का बोला, "अच्छा! तभी तो मैं नहीं जानता।"
उसकी ईमानदारी देखकर मुझे शिक्षा व्यवस्था पर गर्व हुआ।
आजकल बच्चों के बैग में किताबें कम और व्यक्तित्व निखारने के उपकरण ज्यादा मिलते हैं। कंघी, फेसवॉश, हेयर जेल, परफ्यूम, सनस्क्रीन — मानो पढ़ने नहीं, किसी फैशन शो की रैंप पर जा रहे हों। किताबें बैग में ऐसे पड़ी रहती हैं जैसे किसी संयुक्त परिवार में बूढ़े दादा — सम्मानित अवश्य, उपयोग में कम।
बघेली में कहें तो, "लइका किताब खोले से पहिले आईना खोले है।" उसे यह चिंता नहीं कि परीक्षा में क्या लिखेगा, चिंता यह है कि फोटो में क्या दिखेगा।
एक काल्पनिक विद्यालय की कल्पना कीजिए।
वहाँ "मिस्टर स्मार्ट फेस प्रतियोगिता" आयोजित हुई। छात्रों की भीड़ उमड़ पड़ी। सबने अपने-अपने बालों को ऐसी श्रद्धा से सजाया मानो मंदिर में भगवान की मूर्ति स्थापित कर रहे हों।
उसी दिन विद्यालय में "सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता" भी रखी गई।
वहाँ कुर्सियाँ खाली थीं।
प्रधानाचार्य ने कारण पूछा।
एक छात्र बोला, "सर, ज्ञान से लाइक्स नहीं मिलते।"
प्रधानाचार्य कुछ देर तक उसे देखते रहे। शायद उन्हें पहली बार समझ आया कि शिक्षा का संकट पाठ्यक्रम में नहीं, प्राथमिकताओं में है।
समाज भी कम दोषी नहीं है। माता-पिता बच्चे से पूछते हैं — "बेटा, स्कूल में सब तुम्हें पहचानते हैं न?"
बच्चा कहता है — "हाँ, मेरी रील वायरल हो गई है।"
कोई यह नहीं पूछता कि शिक्षक पहचानते हैं या नहीं। ज्ञान पहचान का विषय नहीं रहा, प्रचार पहचान का विषय बन गया है।
परसाई जी होते तो शायद कहते कि हम ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ विद्यार्थी परीक्षा में कम और प्रदर्शन में अधिक उत्तीर्ण होना चाहते हैं। और शरद जोशी जी शायद लिखते कि अब विद्यालय ज्ञान का केंद्र कम, व्यक्तित्व प्रसाधन केंद्र अधिक प्रतीत होने लगा है।
विडंबना यह है कि चेहरा प्रकृति का उपहार है और ज्ञान स्वयं अर्जित संपत्ति। फिर भी लोग उपहार को सँवारने में लगे हैं और संपत्ति को उपेक्षित छोड़ रहे हैं। जबकि इतिहास गवाह है कि दुनिया ने सुंदर चेहरों की सूची कम बनाई है, लेकिन विद्वानों के नाम सदियों तक याद रखे हैं।
समय बड़ा निर्मम परीक्षक है। वह चेहरे की चमक पर कभी अंक नहीं देता। उसकी उत्तरपुस्तिका में केवल ज्ञान, चरित्र और कर्म के अंक जुड़ते हैं। जवानी का सौंदर्य तो सावन की हरियाली की तरह कुछ दिन रहता है, लेकिन ज्ञान का प्रकाश दीपक की लौ की तरह जीवनभर दिशा देता है।
इसलिए विद्यार्थियों से विनम्र निवेदन है कि आईना देखिए, अवश्य देखिए; किंतु कभी-कभी किताब भी खोल लीजिए। क्योंकि चेहरा आपको भीड़ में दिखा सकता है, पर ज्ञान आपको भीड़ से अलग पहचान देता है। बालों की शैली बदलते देर नहीं लगती, किंतु विचारों की ऊँचाई बनाने में वर्षों लगते हैं।
अंततः याद रखिए—
चेहरा समय के साथ बूढ़ा होता है,
ज्ञान समय के साथ परिपक्व होता है।
और संसार में पहचान उसी की टिकती है जो परिपक्व होता है, केवल आकर्षक नहीं।
आचार्य प्रताप
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