डिग्री की अलमारी और शिक्षा का आईना
आजकल शिक्षा बड़ी विचित्र वस्तु हो गई है। पहले लोग ज्ञान प्राप्त करने के लिए पढ़ते थे, अब प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए पढ़ते हैं। घर की दीवारों पर डिग्रियों के इतने फ्रेम टंगे मिल जाते हैं कि लगता है मानो बैठक नहीं, विश्वविद्यालय का संग्रहालय हो। किंतु आश्चर्य यह है कि जितनी डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, उतनी ही मनुष्यता सिकुड़ती दिखाई दे रही है।
हमारे समाज में "पढ़ा-लिखा" होने की परिभाषा बड़ी सरल बना दी गई है—अच्छी नौकरी मिल जाए, मोटा वेतन आने लगे, अंग्रेज़ी में दो-चार वाक्य फटाफट बोल दे, तो समझिए व्यक्ति शिक्षित घोषित। अब कोई यह नहीं पूछता कि उसकी सोच कितनी विकसित हुई, उसका व्यवहार कितना मानवीय हुआ, और वह समाज को कितना बेहतर बनाने में योगदान दे रहा है।
एक गाँव में बाबू साहब रहते थे। नाम के आगे पाँच अक्षर और पीछे सात डिग्रियाँ लगी थीं। गाँव वाले उन्हें चलता-फिरता विश्वविद्यालय कहते थे। लेकिन घर में बेटी के जन्म पर उनका चेहरा ऐसा लटक जाता था जैसे किसी ने शेयर बाज़ार में उनकी पूँजी डुबो दी हो। बहू से कहते, "तुम्हारा काम बस घर संभालना है।" और मंच पर जाकर महिला सशक्तिकरण पर भाषण भी देते थे।
मैंने पूछा, "बाबू साहब, शिक्षा का लाभ क्या हुआ?"
वे बोले, "हम बहुत पढ़े-लिखे हैं।"
मैंने कहा, "हाँ, डिग्री तो बहुत हैं, पर सोच अभी भी प्राथमिक कक्षा में बैठी दिखाई दे रही है।"
बघेली में कहें तो, "कागज मा लिखाय विद्या अउ मन मा बैठाय भेदभाव, ई त उहै बात भई जइसे कुआँ भर पानी होय अउ पियास न बुझे।"
आज भी हम जाति के नाम पर मनुष्य को बाँटते हैं। धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी करते हैं। स्त्री और पुरुष के बीच बराबरी की बात करते हुए भी मन ही मन तराजू लेकर बैठे रहते हैं। फिर गर्व से कहते हैं—"हम शिक्षित हैं।"
शिक्षा यदि केवल नौकरी दिलाने का साधन है, तो वह प्रशिक्षण है; शिक्षा नहीं। शिक्षा तो वह है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है। जो सिखाती है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी जाति, धर्म, भाषा या लिंग से नहीं, उसके चरित्र और कर्म से होती है।
बड़ा मज़ेदार दृश्य है। कुछ लोग संविधान की प्रस्तावना सोशल मीडिया पर साझा करते हैं और उसी दिन किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। कुछ लोग समानता पर लंबी पोस्ट लिखते हैं, लेकिन घर में काम करने वाले व्यक्ति के लिए अलग गिलास रखते हैं। ऐसे लोगों को देखकर लगता है कि शिक्षा उनके सिर तक पहुँची है, हृदय तक नहीं।
शरद जोशी जी शायद होते तो कहते कि हमारे यहाँ शिक्षा का सबसे बड़ा उपयोग यही है कि अब पूर्वाग्रह भी विद्वत्तापूर्ण भाषा में व्यक्त किए जाते हैं। और परसाई जी मुस्कराकर जोड़ देते कि समाज की सबसे बड़ी त्रासदी अशिक्षित व्यक्ति नहीं, बल्कि वह शिक्षित व्यक्ति है जो अपनी शिक्षा का उपयोग भेदभाव को सजाने-सँवारने में करता है।
सच्ची शिक्षा तब दिखाई देती है जब कोई युवक अपनी बहन और भाई के लिए समान अवसर चाहता है। जब कोई शिक्षक कक्षा में सभी बच्चों को एक ही दृष्टि से देखता है। जब कोई व्यक्ति किसी के नाम या उपनाम से पहले उसके व्यक्तित्व को पहचानता है। जब किसी की सफलता देखकर ईर्ष्या नहीं, प्रेरणा उत्पन्न होती है।
बराबरी का अर्थ सबको एक जैसा बना देना नहीं है। बराबरी का अर्थ है सबको समान सम्मान देना। यह समझ लेना कि विविधता कोई समस्या नहीं, बल्कि समाज की शक्ति है।
बघेली में बुजुर्ग अक्सर कहते हैं—"मनखे के मोल ओकर मन से होय, जात-पात के ठप्पा से नाहीं।" यही बात शायद आधुनिक शिक्षा की सबसे बड़ी परीक्षा भी है।
डिग्री अलमारी में सज सकती है, लेकिन शिक्षा व्यवहार में दिखाई देती है। नौकरी आपको सफल बना सकती है, पर समानता का भाव आपको श्रेष्ठ बनाता है। वेतन आपकी आवश्यकताएँ पूरी कर सकता है, लेकिन संवेदनशीलता समाज को बेहतर बना सकती है।
इसलिए यदि आपकी पढ़ाई ने आपको यह सिखा दिया है कि स्त्री-पुरुष बराबर हैं, हर धर्म सम्मान के योग्य है, हर जाति का व्यक्ति समान गरिमा का अधिकारी है, और किसी मनुष्य का मूल्य उसके जन्म से नहीं बल्कि उसके कर्म से तय होता है—तो निश्चय ही आप शिक्षित हैं।
अन्यथा डिग्रियाँ तो दीवार पर टंगी रहती हैं, और अज्ञान मन के भीतर आराम से कुर्सी डालकर बैठा रहता है।
शिक्षा का वास्तविक प्रमाणपत्र विश्वविद्यालय नहीं देता, समाज देता है; और उस प्रमाणपत्र पर अंक नहीं, आपका व्यवहार लिखा होता है।
आचार्य प्रताप
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