परीक्षा का शहर: पहले रहस्य, फिर यात्रा और अंत में परीक्षा

परीक्षा का शहर: पहले रहस्य, फिर यात्रा और अंत में परीक्षा

आजकल सरकारी परीक्षाओं का सबसे कठिन प्रश्नपत्र वह नहीं होता जो परीक्षा केंद्र में मिलता है। असली प्रश्नपत्र तो उससे कई दिन पहले शुरू हो जाता है—"आपका परीक्षा शहर कौन-सा होगा?" और उसका उत्तर भी ऐसा कि मानो सरकार किसी जासूसी उपन्यास का अंतिम अध्याय लिख रही हो। पाँच दिन पहले शहर बताएँगे, तीन दिन पहले एडमिट कार्ड देंगे और फिर पूरे आत्मविश्वास से कहेंगे—"समय पर पहुँचिए, देर से आने वाले अभ्यर्थी को प्रवेश नहीं मिलेगा।"
सरकारी व्यवस्था का यह आत्मविश्वास देखकर लगता है कि शायद रेलवे, बस विभाग, निजी कार्यालयों के मालिक और अभ्यर्थियों के घर वाले सब पहले से ही किसी दिव्य दृष्टि से जान लेते होंगे कि परीक्षा किस शहर में पड़ने वाली है। अभ्यर्थी को छोड़कर बाकी सबको सब कुछ पता रहता होगा।

राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियाँ शायद यह मान बैठी हैं कि परीक्षार्थी मनुष्य नहीं, प्रवासी पक्षी हैं। जैसे ही मोबाइल पर परीक्षा शहर का संदेश आएगा, वैसे ही पंख निकल आएँगे और वे उड़ते-उड़ते परीक्षा केंद्र पहुँच जाएँगे। ट्रेन में टिकट मिले या न मिले, बस में जगह हो या न हो, जेब में पैसे हों या न हों—यह सब शायद पाठ्यक्रम के बाहर का विषय है।

बघेली में कहावत है—"जउन दिन बताइन, ओही दिन निकल पड़व, बाकी भगवान मालिक!" बस यही नीति अब प्रतियोगी परीक्षाओं पर भी लागू होती दिख रही है।

सबसे रोचक दृश्य रेलवे स्टेशन पर दिखाई देता है। आधे डिब्बे में यात्री होते हैं और आधे में सपने। कोई इंजीनियर बनने निकला है, कोई डॉक्टर, कोई शिक्षक, कोई प्रशासनिक अधिकारी। सबकी मंज़िल अलग, लेकिन यात्रा एक जैसी—वेटिंग टिकट, जनरल डिब्बा और उम्मीद की गठरी।

रेलवे भी सोचती होगी—"देश का भविष्य आज फिर बिना रिज़र्वेशन के आ रहा है।"

जो निजी नौकरी में हैं, उनकी अलग परीक्षा है। पहले बॉस से छुट्टी माँगो। बॉस पूछे—"इतनी जल्दी कैसे पता चला?" कर्मचारी कहे—"सर, जल्दी कहाँ? सरकार को तो अभी-अभी याद आया है कि मेरी भी परीक्षा है।"

और यदि किसी की परीक्षा दूसरे राज्य में पड़ जाए तो समझिए कि अभ्यर्थी प्रतियोगी परीक्षा कम और 'भारत दर्शन योजना' अधिक कर रहा है। टिकट नहीं, होटल नहीं, समय नहीं; फिर भी परीक्षा केंद्र समय से पहुँचना अनिवार्य है। क्योंकि व्यवस्था को अभ्यर्थी की परिस्थिति नहीं, उसकी समयपालन क्षमता चाहिए।

अब तर्क दिया जाता है कि देर से शहर बताने से प्रश्नपत्र लीक होने की संभावना कम रहती है। यह तर्क अपनी जगह उचित हो सकता है। परीक्षा की गोपनीयता अत्यंत आवश्यक है। किंतु क्या गोपनीयता का पूरा भार केवल अभ्यर्थी ही उठाए? क्या तकनीक के इस युग में इतना भी संभव नहीं कि परीक्षा शहर दो-तीन सप्ताह पहले निर्धारित कर दिया जाए और उसी शहर के भीतर केंद्र अंतिम समय में आवंटित कर दिए जाएँ? इससे सुरक्षा भी बनी रहेगी और लाखों अभ्यर्थियों की यात्रा भी थोड़ी मानवीय हो जाएगी।

हाल ही में मेरे अपने परिवार में भी यही स्थिति सामने आई। मेरी साली एम्स की परीक्षा देने जा रही हैं। परीक्षा की तैयारी से अधिक चिंता इस बात की है कि शहर कब मिलेगा, टिकट कैसे मिलेगी और समय पर पहुँचना कैसे होगा। तब महसूस हुआ कि प्रतियोगी परीक्षा में केवल ज्ञान की परीक्षा नहीं होती, धैर्य, जेब, किस्मत और भारतीय परिवहन व्यवस्था—सबका संयुक्त मूल्यांकन होता है।

सरकारें युवाओं को देश का भविष्य कहती हैं। यह सुनकर अच्छा लगता है। पर भविष्य को वर्तमान में कम-से-कम इतनी सुविधा तो मिलनी चाहिए कि वह परीक्षा देने समय पर पहुँच सके। यदि परीक्षा का पहला चरण ही रेलवे के दरवाज़े पर लटककर पूरा करना पड़े, तो प्रश्नपत्र हल करने से पहले ही आधी ऊर्जा समाप्त हो जाती है।

आशा है कि राज्य सरकारें हों या केंद्र सरकार, तथा राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियाँ—वे इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। परीक्षा की गोपनीयता बनी रहे, पर अभ्यर्थियों की गरिमा भी बनी रहे। क्योंकि परीक्षा केवल अंक देने का माध्यम नहीं, व्यवस्था की संवेदनशीलता की भी परीक्षा होती है।

कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में प्रश्नपत्र का पहला प्रश्न यही हो—
"यदि आपका परीक्षा शहर पाँच दिन पहले बताया जाए और ट्रेन में टिकट न मिले, तो अपने उत्तर का औचित्य सिद्ध कीजिए।"

और मुझे पूरा विश्वास है कि इस प्रश्न का उत्तर देश का हर प्रतियोगी अभ्यर्थी पूरे सौ अंक के साथ लिख देगा—क्योंकि यह प्रश्न उसने किताबों से नहीं, जीवन से पढ़ा है।

आचार्य प्रताप 

#NTA, #ExamCity, #AdmitCard, #acharypratap  #CompetitiveExams, #StudentProblems, #ExamJourney, #RailwayTravel, #YouthVoice, #EducationSystem, #ExamReforms, #GovernmentExams, #AIIMSExam, #StudentsMatter, #व्यंग्य, #हिंदी_व्यंग्य,  #परीक्षार्थी_की_पीड़ा, #शिक्षा_व्यवस्था, #युवा_भारत, #सरकारी_परीक्षा, #परीक्षा_शहर, #रेल_यात्रा, #बदलाव_जरूरी_है, #व्यवस्था_पर_कटाक्ष, #कलम_की_चोट
,
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

Enregistrer un commentaire

आपकी टिप्पणी से आपकी पसंद के अनुसार सामग्री प्रस्तुत करने में हमें सहयता मिलेगी। टिप्पणी में रचना के कथ्य, भाषा ,टंकण पर भी विचार व्यक्त कर सकते हैं

Plus récente Plus ancienne