माँ कामाख्या देवी: 'रजस्वला' होने की मान्यता और उसका आध्यात्मिक रहस्य
माँ कामाख्या धाम, असम के में स्थित 51 शक्तिपीठों में अत्यंत प्रमुख माना जाता है। यहाँ देवी की प्रतिमा नहीं, बल्कि प्राकृतिक शैल-रूप में स्थित योनि-पीठ की पूजा होती है, जो सृष्टि, शक्ति और सृजन का प्रतीक है।
हर वर्ष आषाढ़ मास में अंबुबाची मेला आयोजित होता है। धार्मिक मान्यता है कि इन तीन दिनों में माँ कामाख्या रजस्वला होती हैं। इस अवधि में मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और चौथे दिन विशेष पूजा के बाद दर्शन प्रारंभ होते हैं। श्रद्धालुओं को अंगोदक तथा अम्बुबाची वस्त्र प्रसाद स्वरूप प्रदान किए जाते हैं।
मान्यता है कि जब भगवान विष्णु ने सती के शरीर को सुदर्शन चक्र से खंडित किया, तब माता सती का योनि-भाग नीलाचल पर्वत पर गिरा। यही स्थान आगे चलकर कामाख्या शक्तिपीठ के रूप में विख्यात हुआ।
लाल जल का रहस्य:
लोकमान्यता के अनुसार इन दिनों गर्भगृह का जल लाल दिखाई देता है, जिसे माँ के रजस्वला होने का दिव्य संकेत माना जाता है। वहीं कुछ भूवैज्ञानिकों ने यह संभावना व्यक्त की है कि क्षेत्र की मिट्टी, खनिजों तथा मानसूनी परिस्थितियों के कारण जल के रंग में परिवर्तन हो सकता है। हालांकि, इस विषय में कोई सर्वमान्य वैज्ञानिक निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है।
कामाख्या धाम स्त्री के मासिक धर्म को अपवित्र नहीं, बल्कि सृजन-शक्ति, उर्वरता और प्रकृति के चक्र का प्रतीक मानता है। यह परंपरा हमें स्मरण कराती है कि जीवन की उत्पत्ति स्त्री-शक्ति से ही संभव है, इसलिए उसका सम्मान सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग है।
जय माँ कामाख्या! 🚩🙏