सभ्यता की धोती और भाषा की बनियान
समाज बड़ा विचित्र जीव है। दिन में संस्कारों की चादर ओढ़े घूमता है और रात होते ही अपनी भाषा की अलमारी से वही शब्द निकाल लाता है जिन्हें दिन भर "असभ्य" कहकर कोसता रहा। जैसे घर का वह पुराना स्टूल, जिसे मेहमानों के सामने छिपा दिया जाता है, लेकिन बल्ब बदलने से लेकर छत पर अचार रखने तक उसी का सहारा लिया जाता है।
हमारी भाषा भी कुछ ऐसी ही है। एक ओर संस्कृतनिष्ठ शब्द हैं—"अनुनय", "विनय", "आदर", "सम्मान", "प्रस्ताव"—जो सरकारी फाइलों में पंखा झलते रहते हैं। दूसरी ओर लोक-भाषा है, जो खेत की मेड़, बस-स्टैंड, हॉस्टल, बैरक, चाय की गुमटी और सोशल मीडिया के कमेंट बॉक्स में पसीना बहाती है। वहीं भाषा साँस लेती है, झगड़ती है, हँसती है और सत्ता का नकाब भी नोचती है।
बड़ी मज़ेदार बात है कि समाज जिन शब्दों को सबसे अधिक छिपाता है, उन्हीं के सहारे सबसे अधिक सच बोलता है। सभ्य समाज कहेगा—"वे अत्यधिक चापलूस हैं।" लोक-भाषा उसी बात को दो शब्दों में ऐसा कह देगी कि सुनने वाला शब्दकोश नहीं, अपना चरित्र देखने लगे। यही लोक-भाषा की ताकत है।
हमारे यहाँ समस्या शब्दों से नहीं, आईनों से है। शब्द तो केवल प्रतिबिंब दिखाते हैं। दरअसल डर इस बात का है कि कहीं प्रतिबिंब असली चेहरा न दिखा दे।
आज का लोकतंत्र भी भाषा का बड़ा खिलाड़ी है। चुनाव से पहले नेता जनता के चरणों में बैठते हैं, चुनाव के बाद जनता उनकी प्रतीक्षा में बैठी रह जाती है। अधिकारी फ़ाइलों में विनम्रता लिखते हैं और व्यवहार में ऐसी दूरी बना लेते हैं कि नागरिक को लगता है, शायद आवेदन नहीं, विवाह-प्रस्ताव लेकर आया था। उधर समर्थक अपने नेता की ऐसी रक्षा करते हैं कि विचार पीछे छूट जाता है और व्यक्तिपूजा आगे निकल जाती है। फिर लोक-भाषा अपने सबसे तीखे मुहावरे निकालती है और एक ही वाक्य में पूरा राजनीतिक विज्ञान पढ़ा देती है।
परसाई जी होते तो शायद कहते—"लोकतंत्र में जनता राजा है, बस राजमहल का पता अभी तक उसे नहीं मिला।"
और शरद जोशी मुस्कराकर जोड़ देते—"हमारे यहाँ सच बोलने से पहले शब्दों का चरित्र प्रमाणपत्र माँगा जाता है।"
भाषा का यह भूमिगत संसार किसी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से नहीं चलता। इसे जीवन पढ़ाता है। रिक्शावाला, किसान, सैनिक, छात्र, मज़दूर, मैकेनिक—इन सबने मिलकर ऐसे मुहावरे गढ़े हैं जिनमें पूरा समाज साँस लेता है। वहाँ व्याकरण कम, अनुभव अधिक होता है।
हाँ, इसका अर्थ यह नहीं कि हर जगह वही भाषा उचित है। अदालत में वही शब्द अनुपयुक्त होंगे जो दोस्तों की महफ़िल में हँसी का कारण बनते हैं। विद्यालय में शिक्षक का संयम और सड़क की तात्कालिक प्रतिक्रिया एक नहीं हो सकती। भाषा की गरिमा शब्दों से कम, संदर्भ से अधिक तय होती है। हथौड़ा मंदिर की घंटी भी बजा सकता है और काँच भी तोड़ सकता है; दोष हथौड़े का नहीं, उपयोग का है।
हमारे बघेलखंड में बुज़ुर्ग हँसते हुए कहते हैं—"बेटवा, बोली म मीठास रहै त झगड़ा आधे रस्ते म निबट जात है, अउ कटास रहै त अपनइया भी पराया होइ जात है।" लोक यही सिखाता है कि शब्दों का स्वाद पहचानो। नमक जितना हो, उतना ही अच्छा लगता है; पूरा भोजन नमक का हो जाए तो कोई नहीं खा सकता।
इसलिए भाषा की तथाकथित "अंडरबेली" से डरने की नहीं, उसे समझने की आवश्यकता है। वह समाज की एक्स-रे रिपोर्ट है। वहाँ शिष्टाचार नहीं, यथार्थ बोलता है। वहाँ व्याकरण की कम और अनुभव की अधिक सत्ता है।
अंततः प्रश्न यह नहीं कि कोई शब्द सभ्य है या असभ्य। प्रश्न यह है कि वह किस सत्य को उजागर कर रहा है। समाज यदि केवल शब्दों को सेंसर करता रहेगा और व्यवहार को नहीं, तो शब्द बदलते रहेंगे, व्यंग्य नहीं। भाषा फिर किसी नए मुहावरे का जन्म दे देगी, क्योंकि जनता की ज़ुबान पर ताला लगाने का आविष्कार अभी तक किसी सरकार ने नहीं किया।
और यही भाषा का सबसे बड़ा लोकतंत्र है—वह किसी राजपत्र से नहीं, जनता की साँसों से चलती है।
हमने लोक-प्रयोगों का एक रोचक संकलन प्रस्तुत किया है, उन्हें व्यवस्थित रूप में वर्गीकृत किया गया है।
१. प्रचलित कहावतें और उनका अर्थ
कहावत अर्थ
गाँड़ फट जाए, मगर चूतड़ न हटे। हठी व्यक्ति भारी नुकसान उठाने के बाद भी अपनी ज़िद नहीं छोड़ता।
जी चाहे बैराग और कुनबा फाड़े गाँड़। मन में त्याग की इच्छा हो, लेकिन जिम्मेदारियाँ आड़े आ जाएँ।
दूल्हा ने दुल्हन पाई, शहबाले ने गाँड़ मराई। लाभ किसी और को मिले और नुकसान किसी तीसरे को उठाना पड़े।
कल फेर गाँड़ धुलना पड़ेगा, तो आज शौच ही न करो। भविष्य के डर से वर्तमान का काम छोड़ देना।
गाँड़ बची तो लाखों पाए। संकट से बच निकलना ही सबसे बड़ा लाभ है।
गाँड़ पर पड़ी तो अक्ल आई। मुसीबत आने पर ही समझ आती है।
जिसकी गाँड़ जली हो, वही राख पहचानता है। जिसने कष्ट सहा हो, वही उसकी पीड़ा समझता है।
२. मुहावरे और उनके अर्थ
(क) डर, संकट और समर्पण
1. गाँड़ फटना — बहुत डर जाना।
2. गाँड़ आगे करना — समर्पण कर देना।
3. गाँड़ दिखाना — संकट से भाग जाना।
4. गाँड़ के नीचे ज़मीन खिसकना — होश उड़ जाना।
5. गाँड़ में डंडा होना — काम अटक जाना।
(ख) मेहनत और संघर्ष
6. गाँड़ घिसना — कड़ी मेहनत करना।
7. गाँड़ का ज़ोर लगाना — पूरी ताकत लगा देना।
8. गाँड़ गीली होना — पसीना बहाना।
9. गाँड़ दुखना — थक जाना या आलस्य करना।
(ग) ईर्ष्या, क्रोध और अपमान
10. गाँड़ जलना — ईर्ष्या करना।
11. गाँड़ फाड़ना — बुरी तरह हराना या अपमानित करना।
12. गाँड़ लाल होना — मार खाना।
13. गाँड़ फुलाना — नाराज़ होना या अकड़ दिखाना।
(घ) चापलूसी और संबंध
14. गाँड़ चाटना — चमचागिरी करना।
15. गाँड़ में घुसना — किसी के पीछे पड़ जाना।
16. गाँड़ सटाना — अत्यधिक निकटता बढ़ाना।
17. गाँड़ पे हाथ फेरना — पुचकारना।
(ङ) शरारत और दखल
18. गाँड़ में उँगली करना — जानबूझकर समस्या खड़ी करना।
19. गाँड़ खुजाना — बेवजह चिंता या परेशानी मोल लेना।
20. गाँड़ सूँघना — जासूसी करना।
21. गाँड़ टटोलना — तस्दीक करना।
(च) व्यवहार और स्वभाव
22. गाँड़ उचकाना — ज़्यादा उछलना-कूदना।
23. गाँड़ हिलाना — नखरे करना।
24. गाँड़ टिकाना — कहीं स्थायी रूप से बैठ जाना।
25. गाँड़ में तीतर का बाल होना — अत्यधिक सक्रिय या बेचैन होना
३. भाषावैज्ञानिक टिप्पणी
भाषा-विज्ञान की दृष्टि से इनमें से सभी अभिव्यक्तियाँ शुद्ध मुहावरे नहीं हैं। इन्हें चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है—
मुहावरे — जैसे गाँड़ घिसना, गाँड़ जलना, गाँड़ फटना।
लोकोक्तियाँ — जैसे दूल्हा ने दुल्हन पाई, शहबाले ने गाँड़ मराई।
गालियाँ और अपमानसूचक पद — जैसे रांड की गाँड़।
लोक-व्यंग्यात्मक वाक्य — जैसे गाँड़ मार, बाप का नाम पूछे।
इन अभिव्यक्तियों का प्रयोग मुख्यतः ग्रामीण बोलियों, छात्रावासों, सैनिक जीवन, श्रमिक समुदायों और अनौपचारिक मित्र-मंडलियों में मिलता है। औपचारिक या शैक्षणिक वातावरण में इनका प्रयोग सामान्यतः अनुचित माना जाता है।
आचार्य प्रताप
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