विद्या ददाति विनयम् : डिग्रियों के जंगल में खोया विनय
विद्यालय की दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा रहता है— “विद्या ददाति विनयम्” अर्थात विद्या विनय देती है। यह वाक्य इतना पुराना है कि अब विद्यालय की दीवारों पर लिखा-लिखा स्वयं बूढ़ा हो चुका है। मगर उसका दुर्भाग्य देखिए कि आजकल वह जिस-जिस विद्यार्थी को देखता है, उसे स्वयं अपने अर्थ पर संदेह होने लगता है।
कभी विद्या और विनय का संबंध वैसा था जैसा बैलगाड़ी और बैल का। एक के बिना दूसरा अधूरा। आज विद्या और विनय का रिश्ता वैसा हो गया है जैसा चुनावी घोषणापत्र और चुनाव के बाद का व्यवहार। दोनों का नाम साथ लिया जाता है, पर मुलाकात कम ही होती है।
आज का विद्यार्थी जितना अधिक पढ़ा-लिखा होता जा रहा है, उतना ही उसे यह विश्वास होता जा रहा है कि संसार में ज्ञान का अंतिम ठेका उसी ने ले रखा है। उसकी जेब में डिग्री है, हाथ में मोबाइल है और चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास कि यदि न्यूटन आज लौट आएँ तो उनसे भी गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत दोबारा समझाने को कह दे।
हमारे समय में गुरु के सामने विद्यार्थी सिर झुकाता था। अब विद्यार्थी गुरु के सामने मोबाइल झुकाता है और कहता है— “सर, गूगल कुछ और बता रहा है।”
गुरु बेचारा सोचता रह जाता है कि यह विद्या है या वाई-फाई का प्रसाद।
एक दिन एक सज्जन मिले। बड़े गर्व से बोले, “मेरा लड़का एमबीए कर रहा है।”
मैंने पूछा, “बहुत अच्छा! व्यवहार कैसा है?”
वे थोड़ा झेंप गए। बोले, “व्यवहार तो ऐसा है कि घर में किसी की बात नहीं सुनता, लेकिन डिग्री बहुत बड़ी करेगा।”
मैंने कहा, “लगता है विद्या ने विनय को रास्ते में कहीं उतार दिया होगा और अकेली आगे निकल गई।”
अब तो स्थिति यह है कि जितनी बड़ी डिग्री, उतना बड़ा अहंकार। जैसे-जैसे प्रमाणपत्रों की संख्या बढ़ती है, नमस्कार की ऊँचाई घटती जाती है। पीएचडी होते-होते आदमी का सिर इतना ज्ञान से भर जाता है कि झुकने की जगह ही नहीं बचती।
बघेली में एक बुजुर्ग कहत रहिन— “बेटा, पढ़ाई से आदमी बड़ा होय, लेकिन बड़ा होके अगर दूसरन क छोटा समझे लागे त समझो पढ़ाई क कुछ पन्ना उल्टा पढ़ लिहिस।”
बात में दम था। आज ज्ञान का प्रदर्शन अधिक है, आत्मसात कम। लोग किताबें कम पढ़ते हैं, किताबों के साथ फोटो अधिक खिंचवाते हैं। विद्वत्ता अब विचार से नहीं, सोशल मीडिया की पोस्ट से मापी जाती है। कोई पाँच उद्धरण याद कर ले तो स्वयं को दार्शनिक समझने लगता है।
एक काल्पनिक विश्वविद्यालय की कल्पना कीजिए। वहाँ एक नया पाठ्यक्रम शुरू हुआ— “अहंकार प्रबंधन में स्नातकोत्तर”। प्रवेश के लिए योग्यता थी कि अभ्यर्थी कम-से-कम पाँच लोगों को मूर्ख समझता हो। शोध का विषय था— “मैं ही क्यों सही हूँ?” और दीक्षांत समारोह में कुलपति महोदय ने घोषणा की— “इस वर्ष सबसे अधिक विनम्र छात्र को इसलिए अयोग्य घोषित किया जाता है क्योंकि वह अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा नहीं पीट सका।”
सभा में तालियाँ बजीं। क्योंकि वहाँ सबको अपनी-अपनी श्रेष्ठता पर पूरा विश्वास था।
विडंबना यह है कि विद्या का उद्देश्य मनुष्य को बड़ा बनाना था, लेकिन हमने बड़ा होने का अर्थ ऊँचा होना समझ लिया। ऊँचा होने और बड़ा होने में वही अंतर है जो पेड़ और खंभे में होता है। खंभा ऊँचा हो सकता है, पर छाया नहीं देता। पेड़ बड़ा होता है, इसलिए फल और छाया दोनों देता है।
आज समाज में डिग्रियों की भरमार है, किंतु विनय की कमी है। लोग ज्ञान अर्जित कर रहे हैं, पर विवेक खो रहे हैं। जानकारी बढ़ रही है, पर समझ घट रही है। ऐसा लगता है जैसे हमने “विद्या ददाति विनयम्” का आधा भाग ही पढ़ा और बाकी को परीक्षा के बाद भूल गए।
शायद सच्ची विद्या वही है जो मनुष्य को यह एहसास कराए कि अभी बहुत कुछ जानना बाकी है। जो जितना जानता है, वह उतना ही विनम्र होता है। समुद्र इसलिए विशाल है क्योंकि वह नदियों को अपने से नीचे आने देता है। यदि वह भी पहाड़ की तरह ऊँचा बनने की जिद कर बैठता, तो प्यासा ही रह जाता।
इसलिए अगली बार जब किसी विद्यालय की दीवार पर “विद्या ददाति विनयम्” लिखा देखें, तो उसे केवल संस्कृत का वाक्य न समझिए। उसे एक प्रश्न की तरह पढ़िए— क्या हमारी विद्या सचमुच हमें विनम्र बना रही है, या केवल प्रमाणपत्रों का बोझ बढ़ा रही है?
क्योंकि जहाँ विनय नहीं, वहाँ विद्या अक्सर सूचना बनकर रह जाती है; और जहाँ विनय है, वहाँ साधारण ज्ञान भी मनुष्य को असाधारण बना देता है।
आचार्य प्रताप
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