पार्थ की तलाश में अर्जुन प्राइवेट लिमिटेड

माधव!
तुम्हारी योजनाएँ मेरी बुद्धि से बाहर हैं। पर मेरा विश्वास है कि मेरे लिए कोई खड़ा हो या न हो, तुम मेरा हाथ कभी नहीं छोड़ोगे...

यह पंक्तियाँ पढ़ते ही मन श्रद्धा से भर जाता है। किंतु फिर अचानक मोबाइल पर एक नोटिफिकेशन आ जाता है— "आपकी पोस्ट पर 527 लाइक्स आए हैं।" और श्रद्धा तत्काल सोशल मीडिया के आँकड़ों में रूपांतरित हो जाती है।

आजकल हर व्यक्ति स्वयं को अर्जुन मान बैठा है। फर्क सिर्फ इतना है कि महाभारत के अर्जुन को अपने सारथी पर विश्वास था, जबकि आधुनिक अर्जुन को अपने फॉलोअर्स की संख्या पर।

वह सुबह उठते ही माधव को नहीं, मोबाइल को प्रणाम करता है। फिर बड़ी भावुकता से लिखता है— "हे कृष्ण! तुमने मुझे अपना पार्थ चुना है।" और पोस्ट के नीचे पाँच मिनट बाद स्वयं ही टिप्पणी करता है— "जय श्री कृष्ण!" ताकि एल्गोरिद्म भी उसकी भक्ति को पहचान ले।

विडम्बना देखिए, गीता का अर्जुन युद्धभूमि में खड़ा होकर संशय में था, और आज का अर्जुन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में खड़ा होकर हर विषय का विशेषज्ञ है। उसे अर्थशास्त्र भी आता है, विदेश नीति भी आती है, क्रिकेट चयन भी और मौसम विभाग की भविष्यवाणी भी। बस अपने जीवन का रथ किस दिशा में जा रहा है, यह पूछिए तो नेटवर्क चला जाता है।
हमारे नगर में एक सज्जन हैं। हर तीसरे दिन लिखते हैं— "मुझे किसी का सहारा नहीं चाहिए, मेरे साथ माधव हैं।" और चौथे दिन बैंक के लोन, बिजली बिल और स्कूल फीस के लिए मित्रों को फोन करते दिखाई देते हैं। लगता है माधव ने भी सोच लिया होगा कि "वत्स! थोड़ा परिश्रम भी कर लिया करो, मैं सारथी हूँ, ईएमआई भरने वाला क्लर्क नहीं।"

राजनीति में भी अनेक पार्थ दिखाई देते हैं। चुनाव के समय प्रत्येक नेता स्वयं को अर्जुन और अपनी पार्टी को धर्मयुद्ध घोषित कर देता है। मंच से कहता है— "सत्य की विजय होगी!" और परिणाम आते ही सबसे पहले विजयी सत्य को मंत्रालयों में समायोजित करने लगता है। कृष्ण शायद ऊपर बैठकर मुस्कुरा रहे होंगे कि जिस युद्ध में मैंने धर्म स्थापित करने का प्रयास किया था, उसी के नाम पर आज लोग टिकट स्थापित कर रहे हैं।

शिक्षा जगत भी पीछे नहीं है। परीक्षा के समय विद्यार्थी बड़ी श्रद्धा से लिखता है— "हे माधव! मेरा हाथ मत छोड़ना।" लेकिन पूरे वर्ष उसने पुस्तक का हाथ अवश्य छोड़ रखा होता है। उसे लगता है कि कृष्ण ने यदि सुदर्शन चक्र चला दिया था तो उत्तर-पुस्तिका भी स्वयं भर देंगे।

एक काल्पनिक प्रसंग

कल्पना कीजिए कि एक दिन सचमुच कृष्ण धरती पर आ जाएँ।

उन्होंने देखा कि हजारों लोग उन्हें टैग करके लिख रहे हैं— "माधव, मेरा साथ देना।"

कृष्ण प्रसन्न हुए। सोचा, "चलो, अभी भी लोग मुझ पर विश्वास करते हैं।"

उन्होंने पहले व्यक्ति से पूछा— "वत्स! तुम्हारा गांडीव कहाँ है?"

वह बोला— "प्रभु, गांडीव तो नहीं है, लेकिन तीन सोशल मीडिया अकाउंट हैं।"

दूसरे से पूछा— "तुम्हारा लक्ष्य क्या है?"

उसने कहा— "प्रभु, फिलहाल तो वायरल होना है।"

तीसरे से पूछा— "कर्म क्या करते हो?"

उत्तर मिला— "प्रभु, कर्म तो नहीं, पर टिप्पणियाँ बहुत करता हूँ।"

कृष्ण कुछ देर मौन रहे। फिर मुस्कुराकर बोले— "मैंने अर्जुन को इसलिए चुना था क्योंकि वह युद्ध से भागना नहीं चाहता था, केवल सत्य जानना चाहता था। तुम लोग सत्य से भागना चाहते हो और प्रसिद्धि जानना चाहते हो।"

इतना कहकर वे अदृश्य हो गए। पीछे से किसी ने तुरंत पोस्ट कर दिया— "Exclusive! अभी-अभी कृष्ण जी से मेरी निजी मुलाकात हुई। पूरा वीडियो शाम 7 बजे।"

निष्कर्ष

सच तो यह है कि कृष्ण का हाथ पकड़ने की बात कहना सरल है, पर अर्जुन बनने की तैयारी कठिन। अर्जुन को इसलिए चुना गया था क्योंकि वह प्रश्न पूछता था, सीखता था, अनुशासन रखता था और अंततः कर्म करता था।

आज हम सब चाहते हैं कि कोई माधव हमारे जीवन का सारथी बन जाए, लेकिन रथ की लगाम छोड़ने को तैयार नहीं हैं। हम चाहते हैं कि भगवान हमारा साथ दें, पर अपने अहंकार, आलस्य और भ्रम का साथ छोड़ने को तैयार नहीं।

शायद कृष्ण आज भी मुस्कुरा कर यही कह रहे हैं—

"वत्स! पार्थ चुने नहीं जाते, अपने कर्मों से बनते हैं। और जब कोई सचमुच अर्जुन बन जाता है, तब उसे यह चिंता नहीं रहती कि माधव उसका हाथ छोड़ेंगे या नहीं।"

क्योंकि तब तक वह समझ चुका होता है कि माधव कभी हाथ नहीं छोड़ते, हम ही बार-बार उनका हाथ छोड़कर मोबाइल पकड़ लेते हैं।॥

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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