कहते हैं कि लोकतंत्र के चार स्तंभ होते हैं। पहले तीन स्तंभों की हालत पर चर्चा बाद में कर लेंगे, फिलहाल चौथे स्तंभ की बात कर लेते हैं, जो आजकल स्तंभ कम और स्टूडियो का स्टंटमैन अधिक दिखाई देता है। कभी वह किसी बाबा के पीछे डंडा लेकर दौड़ता है, तो कभी किसी यूट्यूबर शिक्षक के पीछे कैमरा लेकर। जनता सोचती है कि पत्रकारिता सवाल पूछ रही है, जबकि टीआरपी मुस्कुरा रही होती है कि “वाह रे लोकतंत्र, क्या तमाशा है!”
आजकल दृश्य बड़ा मनोरंजक है। एक ओर चित्रा त्रिपाठी जी हैं, जिनकी वाणी के तीर देश के नामी-गिरामी बाबाओं की ओर प्रस्थान कर चुके हैं। दूसरी ओर अंजना ओम कश्यप जी हैं, जो यूट्यूब के शिक्षा-सम्राटों से दो-दो हाथ कर रही हैं। ऐसा लगता है मानो पत्रकारिता ने जनहित के सारे प्रश्न हल कर लिए हों और अब अखाड़े में उतरकर कुश्ती लड़ना ही उसका परम धर्म बचा हो।
बड़े बुजुर्ग कहते थे कि पत्रकार का काम सत्ता से सवाल पूछना है। आजकल पत्रकार पूछते हैं—“आपने ऐसा क्यों कहा?” फिर सामने वाला जवाब देता है, फिर पत्रकार कहते हैं—“नहीं, आप बच रहे हैं!” और अगले तीस मिनट तक पूरा देश यह जानने में लगा रहता है कि कौन बच रहा है और कौन फँस रहा है। इस बीच महँगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों की समस्याएँ कोने में बैठकर ऐसे प्रतीक्षा करती हैं जैसे रेलवे स्टेशन पर कोई यात्री तीन घंटे लेट ट्रेन का इंतज़ार कर रहा हो।
अब शिक्षकों वाला विवाद ही देख लीजिए। यदि कोई शिक्षक लोकप्रिय हो गया, लाखों छात्र उसे सुनने लगे, तो पत्रकारिता का एक वर्ग अचानक जाग जाता है। उसे लगता है कि शिक्षा व्यवस्था की सारी समस्याओं का मूल कारण वही व्यक्ति है। उधर शिक्षक सोचता है कि वह बच्चों को पढ़ा रहा है, इधर स्टूडियो उसे राष्ट्रीय संकट घोषित करने पर तुला रहता है।
बघेली में कहें तो, “गाँव मा कुआँ सूख गवा है, फेर पंचायत के लोग इस बात मा बहस करत हैं कि रस्सी लाल होय कि नीली!” यही हाल हमारे समाचार विमर्श का हो गया है। देश के असली सवाल कहीं पीछे छूट जाते हैं और कैमरे की रोशनी उन मुद्दों पर पड़ती है जिनमें शोर अधिक और समाधान कम होता है।
पत्रकारिता का एक नया गणित भी विकसित हुआ है। पहले खबर बनाई जाती थी, फिर दिखाई जाती थी। अब पहले बहस बनाई जाती है, फिर उसके लिए खबर खोजी जाती है। यदि खबर न मिले तो विवाद पैदा कर लिया जाता है। आखिर प्राइम टाइम का एक घंटा भी तो भरना है!
एक काल्पनिक दृश्य की कल्पना कीजिए।
एक पत्रकार स्वर्ग के द्वार पर पहुँचता है। चित्रगुप्त जी पूछते हैं— “पुत्र, पृथ्वी पर क्या कार्य करते थे?”
पत्रकार गर्व से कहता है— “मैं राष्ट्रहित में बहस करवाता था।”
चित्रगुप्त पूछते हैं— “किस विषय पर?”
पत्रकार उत्तर देता है— “आज बाबा पर, कल यूट्यूबर पर, परसों अभिनेता पर।”
चित्रगुप्त थोड़ा आश्चर्य से पूछते हैं— “और जनता की समस्याओं पर?”
पत्रकार मुस्कुराकर कहता है— “वो अगले सीज़न में करने वाले थे प्रभु!”
कहते हैं, यह सुनकर यमराज भी कुछ देर के लिए ‘ब्रेक के बाद मिलते हैं’ कहकर चले गए।
विडंबना यह है कि पत्रकारिता और शिक्षा दोनों ही समाज के निर्माण के महत्वपूर्ण साधन हैं। शिक्षक ज्ञान देता है और पत्रकार सूचना। दोनों का उद्देश्य समाज को जागरूक बनाना होना चाहिए। लेकिन जब दोनों के बीच संवाद की जगह दंगल होने लगे, तो लाभ केवल दर्शक संख्या का होता है, समाज का नहीं।
यह भी सच है कि किसी भी शिक्षक, बाबा, नेता या पत्रकार को आलोचना से ऊपर नहीं माना जा सकता। प्रश्न पूछना लोकतंत्र की आत्मा है। परंतु प्रश्न और प्रहार में उतना ही अंतर है जितना चिकित्सक और कसाई में। दोनों के हाथ में धारदार औज़ार होता है, पर उद्देश्य अलग-अलग होता है।
आज पत्रकारिता का संकट यही है कि वह स्वयं को आईना कम और मंच अधिक समझने लगी है। आईना चेहरा दिखाता है, मंच प्रदर्शन कराता है। और जब प्रदर्शन बढ़ जाता है, तब खबर धीरे-धीरे अभिनय में बदल जाती है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि लड़ाई बाबा से है, शिक्षक से है या यूट्यूबर से। प्रश्न यह है कि पत्रकारिता किससे लड़ रही है—असत्य से या केवल टीआरपी की भूख मिटाने के लिए नए-नए प्रतिद्वंद्वी खोज रही है?
क्योंकि याद रखिए, चॉक की धूल उड़ाने वाला शिक्षक और सच की धूल झाड़ने वाला पत्रकार—दोनों समाज की आवश्यकता हैं। लेकिन जब दोनों को अखाड़े का पहलवान बना दिया जाए, तब लोकतंत्र ताली तो बहुत बजाता है, पर भीतर ही भीतर थोड़ा कमजोर भी हो जाता है।
और साहब, इस दौर में खबर कम और मुकाबला ज्यादा बिकता है। इसलिए पत्रकारिता अब कभी बाबा प्रीमियर लीग खेल रही है, तो कभी शिक्षक सुपर लीग। जनता बस दर्शक दीर्घा में बैठी सोच रही है—“हमरे मुद्दा के मैच कब खेला जई?”।
आचार्य प्रताप
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