भारतीय समाज का सबसे सफल "समावेशी भर्ती अभियान"

कभी-कभी लगता है कि अरेंज मैरिज की व्यवस्था किसी ऋषि-मुनि ने नहीं, बल्कि पुरुष समाज के किसी दूरदर्शी रणनीतिकार ने बनाई होगी। उद्देश्य बड़ा पवित्र था—समाज के हर प्रकार के पुरुष का गृहस्थ जीवन सुनिश्चित करना। चाहे व्यक्तित्व में बसंत हो या बरसात के बाद कीचड़, विवाह का अवसर सबको मिलना चाहिए।

सोचिए, यदि विवाह की अनिवार्य शर्त प्रेम रख दी जाती, तो स्थिति कितनी भयावह हो सकती थी। तब लड़कियाँ भी चयन समिति बन जातीं। इंटरव्यू होते, व्यक्तित्व परीक्षण होता, संवाद कौशल देखा जाता, संवेदनशीलता की मार्कशीट निकलती। कई महाशय तो आवेदन पत्र भरने की योग्यता तक प्राप्त न कर पाते।

प्रेम बड़ा निर्मम लोकतंत्र है। वह न जाति देखता है, न वेतनमान, न खानदान का इतिहास। वह सीधे व्यक्ति के स्वभाव, व्यवहार और आकर्षण पर मतदान करता है। और मतदान में हारने वालों की संख्या हमेशा जीतने वालों से अधिक होती है।

यहीं अरेंज मैरिज व्यवस्था का महत्व सामने आता है। इसमें व्यक्ति नहीं, परिवार प्रेम करते हैं; दिल नहीं, बायोडाटा मिलते हैं; और कभी-कभी तो दूल्हा-दुल्हन से अधिक बातचीत उनके चाचा, मामा और फूफा कर लेते हैं। प्रेम की कठिन प्रतियोगी परीक्षा की जगह यह एक प्रकार की "प्रत्यक्ष भर्ती प्रक्रिया" है, जिसमें अनुभव, स्थायित्व और सामाजिक प्रमाणपत्रों को वरीयता दी जाती है।

यह कहना भी गलत होगा कि केवल पुरुषों को ही इसका लाभ मिला। समाज ने स्त्रियों के लिए भी अनेक कसौटियाँ गढ़ रखी थीं। इसलिए अरेंज मैरिज वास्तव में उस सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा रही, जहाँ दो व्यक्तियों से अधिक दो परिवारों की चिंताएँ विवाह करती थीं।

फिर भी व्यंग्य का प्रश्न बना रहता है—यदि प्रेम ही एकमात्र योग्यता होता, तो कितने लोगों का विवाह हो पाता? कई सज्जन, जो आज वैवाहिक जीवन में बच्चों की फीस और गैस सिलेंडर के दाम पर गंभीर चर्चा करते दिखाई देते हैं, शायद तब भी किसी चाय की दुकान पर बैठकर प्रेम की संभावनाओं पर शोध कर रहे होते।

इसलिए कहा जा सकता है कि अरेंज मैरिज भारतीय समाज की वह अद्भुत संस्था है जिसने "समान अवसर" के सिद्धांत को विवाह तक पहुँचा दिया। प्रेम जहाँ चयन करता है, वहाँ अरेंज मैरिज समावेशन करती है। और भारतीय समाज ने सदियों से चयन से अधिक समावेशन को महत्व दिया है।

अब यह अलग बात है कि विवाह के बाद बहुत-से दंपति प्रेम भी कर बैठते हैं, जिससे पूरी व्यवस्था का मूल व्यंग्य थोड़ा कमजोर पड़ जाता है। वरना सिद्धांत तो यही कहता है कि जहाँ प्रेम की परीक्षा कठिन हो, वहाँ समाज व्यवस्था का "बैकडोर एंट्री सिस्टम" विकसित कर ही लेता है।

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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