युवा और राष्ट्रीय चिंता का विश्वकप

हमारे देश का युवा बड़ा जिम्मेदार प्राणी है। उसे अपने भविष्य की नहीं, अपने पसंदीदा खिलाड़ी के स्ट्राइक रेट की चिंता रहती है। वह रात भर जागकर मैच देख सकता है, लेकिन किताब खोलते ही उसे राष्ट्रहित में नींद आ जाती है।

आजकल युवा दो प्रकार के होते हैं—एक जो फिल्म के पहले दिन का पहला शो देख लेते हैं और दूसरे जो टिकट न मिलने पर दुखी हो जाते हैं। दोनों ही राष्ट्रनिर्माण में समान रूप से व्यस्त हैं।

उधर कोई परीक्षा का पेपर लीक हो जाए, लाखों विद्यार्थियों की मेहनत नाले में बह जाए, भर्ती परीक्षाएँ वर्षों तक लटकी रहें—तो यह विषय उतना रोमांचक नहीं होता। आखिर इसमें चौके-छक्के कहाँ लगते हैं? इसमें तो केवल भविष्य आउट होता है, और भविष्य के आउट होने पर स्टेडियम में तालियाँ नहीं बजतीं।

मुझे आज तक याद नहीं पड़ता कि किसी महान बल्लेबाज़ ने शतक पूरा करते ही पूछा हो—"भाइयों, पहले यह बताइए कि पेपर लीक किसने किया?" या किसी सुपरस्टार ने पुरस्कार लेते समय कहा हो—"यह ट्रॉफी मैं उन युवाओं को समर्पित करता हूँ जिनकी परीक्षाएँ बार-बार रद्द हो रही हैं।"

लेकिन युवा बड़ा उदार है। वह अपने नायकों के लिए लड़ सकता है, सोशल मीडिया पर युद्ध छेड़ सकता है, मित्रता तोड़ सकता है, पर अपने ही भविष्य के लिए शायद ही कभी एकजुट होता है।

व्यवस्था भी मुस्कुरा रही है। जिस पीढ़ी की निगाहें स्कोरबोर्ड पर टिकी हों, उसे परिणाम-पत्र से दूर रखना बहुत आसान होता है।

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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