मन महाराज का लोकतंत्र
मन बड़ा लोकतांत्रिक जीव है। उसे किसी संविधान, नियमावली या आचार संहिता से कोई विशेष लगाव नहीं। वह अवसर देखकर अपना मतदान करता है और अक्सर परिणाम ऐसा आता है कि बुद्धि विपक्ष में बैठी रह जाती है तथा वासना पूर्ण बहुमत से सरकार बना लेती है।
हम सब अपने-अपने भीतर एक कण्डु मुनि लिये घूम रहे हैं। अंतर केवल इतना है कि उन्हें प्रम्लोचा मिली थी और हमें मोबाइल, सोशल मीडिया, विज्ञापन, दिखावा और इच्छाओं का अनंत बाज़ार मिला हुआ है। पहले इन्द्र को तपस्वियों से डर लगता था, अब बाज़ार को संयमी लोगों से डर लगता है। क्योंकि जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण कर ले, उसे बेचने के लिए कुछ बचता ही नहीं।
कण्डु मुनि तप कर रहे थे। गर्मी में पंचाग्नि, वर्षा में खुले आकाश के नीचे और शीत में जल के भीतर। आज का मनुष्य भी तप कर रहा है। वह गर्मी में बिजली बिल भरता है, वर्षा में सड़क के गड्ढों से जूझता है और शीत में गैस सिलेंडर की कीमतें देखता है। अंतर केवल इतना है कि मुनि मोक्ष चाहते थे और हम ईएमआई-मुक्ति।
कहते हैं, इन्द्र ने प्रम्लोचा को भेजा। अब इन्द्र को इतना कष्ट करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आज प्रम्लोचा हर जेब में रहती है। कभी मोबाइल स्क्रीन बनकर, कभी "बस पाँच मिनट और" वाले वीडियो बनकर, तो कभी "सेल आज अंतिम दिन" के विज्ञापन बनकर। मनुष्य सोचता है कि वह उपकरण चला रहा है, जबकि वस्तुतः उपकरण ही उसे चला रहे होते हैं।
कण्डु मुनि को लगा कि अभी सुबह हुई है, जबकि नौ सौ सात वर्ष बीत चुके थे। आज किसी युवक से पूछिए—"बेटा, कितना समय हुआ?" वह कहेगा—"अभी तो रील देखना शुरू किया था।" और उधर माता-पिता को लगता है कि उनका बालक अभी-अभी स्कूल गया था, जबकि उसके सिर पर नौकरी और विवाह की चर्चा होने लगती है।
समय की सबसे बड़ी चोरी जेबकतरे नहीं करते, मोह करता है।
व्यंग्य यह है कि जब तक सब कुछ अच्छा लगता है, तब तक हम अपने पतन का श्रेय भी आनंद को देते हैं। और जब आँख खुलती है, तब किसी प्रम्लोचा, किसी व्यवस्था, किसी मित्र, किसी समाज या किसी ग्रह-नक्षत्र को दोष देने लगते हैं। कण्डु मुनि की महानता यही थी कि उन्होंने अंततः कहा—"दोष उसका नहीं, मेरा है। मैं ही इन्द्रियों का दास बन गया।"
आज यह स्वीकार करने का साहस कितनों में है?
हमारे यहाँ हर असफलता के लिए कोई न कोई दोषी मिल जाता है। विद्यार्थी कहता है—पेपर कठिन था। कर्मचारी कहता है—बॉस खराब था। नेता कहता है—पिछली सरकार जिम्मेदार है। और जनता कहती है—किस्मत खराब है। पर कोई यह नहीं कहता कि "मन महाराज" को हमने बिना लगाम के खुला छोड़ रखा था।
बघेली में कहें तो मन बड़ा "अड़ियल बछेरू" है। जइसे खेत के मेड़ टूट जाएँ, वैसे ही यह इच्छाओं के खेत में घुसकर पूरी फसल चर जाता है। बाद में हम खड़े होकर आकाश की ओर देखते हैं और पूछते हैं—"हे प्रभु, यह क्या हो गया?" प्रभु मुस्कुराकर शायद यही कहते होंगे—"बेटा, मेड़ तो तुमने ही नहीं बाँधी थी।"
कण्डु मुनि की कथा का सबसे सुंदर भाग उनका पतन नहीं, उनका पश्चात्ताप है। गिरना मनुष्य की प्रकृति हो सकता है, पर उठना उसकी साधना है। जब तक मनुष्य अपने दोषों को बाहरी दुनिया पर टाँगता रहेगा, तब तक वह उसी चक्कर में घूमता रहेगा जिसमें कण्डु मुनि नौ सौ सात वर्ष घूमते रहे।
अंततः उन्होंने भगवान की शरण ली। इसका अर्थ केवल धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि अपने अहंकार की सीमा को स्वीकार करना है। मनुष्य जब यह समझ लेता है कि केवल अपनी शक्ति से सब कुछ सम्भव नहीं, तभी भीतर विनम्रता का जन्म होता है। और जहाँ विनम्रता आती है, वहीं से वास्तविक संयम का आरम्भ होता है।
आज का मनुष्य चाँद पर पहुँच गया है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता बना ली है, समुद्र की गहराइयाँ नाप ली हैं; पर यदि वह अपने मन की गहराई नहीं नाप पाया, तो उसकी सारी उपलब्धियाँ उसी कण्डु मुनि की भाँति एक क्षण में बह सकती हैं।
इसलिए प्रश्न प्रम्लोचा का नहीं है, प्रश्न मन का है। संसार तो कल भी आकर्षक था, आज भी है और कल भी रहेगा। किंतु जो व्यक्ति अपने भीतर भगवान, विवेक और संयम की छोटी-सी ज्योति जला लेता है, उसके लिए नौ सौ सात वर्ष का मोह भी एक दिन का स्वप्न बन जाता है।
कथा का निष्कर्ष यही है—मन को अपना सेवक बनाइए, स्वामी नहीं। क्योंकि जब मन राजा बन जाता है, तब तपस्वी भी भटक जाता है; और जब भगवान का स्मरण सारथी बन जाता है, तब भटका हुआ मनुष्य भी परम पद पा लेता है।
🌷 जय जय श्री राम कृष्ण हरि विठ्ठल केशव 🌷🙏⚜️
आचार्य प्रताप
#मन_महाराज, #आत्ममंथन, #भारतीय_दर्शन, #सनातन_चिंतन, #भक्ति_और_वैराग्य, #श्रीहरि_की_शरण, #संयम_का_महत्व, #आध्यात्मिक_व्यंग्य, #कण्डु_मुनि, #पुराण_प्रेरणा, #मन_पर_विजय, #जीवन_दर्शन, #विवेक_और_वैराग्य, #हिंदी_साहित्य, #सत्संग_विचार, #जयश्रीहरि, #रामकृष्णहरिविठ्ठल, #सनातन_संस्कृति, #जय_जय_श्री_राम_कृष्ण_हरि_विठ्ठल_केशव 🌷🙏⚜️