“अच्छा कौन है?” — आईनों का महापंचायत
यह बड़ा विचित्र समय है। यहाँ हर व्यक्ति अपने साथ एक अदृश्य प्रमाणपत्र लेकर घूम रहा है, जिस पर मोटे अक्षरों में लिखा है— “मैं अच्छा हूँ।” बस समस्या यह है कि यह प्रमाणपत्र किसी और को दिखाई नहीं देता।
पुलिस वाले का कहना है कि यदि समाज में शांति है तो उसके कारण, और यदि अशांति है तो जनता के कारण। वकील साहब का विश्वास है कि उनकी दलीलें इतनी पवित्र हैं कि सत्य भी कभी-कभी उनके सामने सलाह लेने चला आता होगा। जज का फैसला अंतिम है, पत्रकार की खबर निष्पक्ष है, नेता का वादा जनहित में है और अफसर की फाइल राष्ट्रनिर्माण का दस्तावेज़।
अभिनेता को लगता है कि वह समाज का दर्पण है। इन्फ्लुएंसर को विश्वास है कि उसके बिना जनता का ज्ञान अधूरा है। कवि अपनी कविता में सत्य खोजता है और पाठक उसकी कविता में अपनी-अपनी सुविधा का सत्य।
खिलाड़ी जीत जाए तो मेहनत का परिणाम, हार जाए तो परिस्थितियों का षड्यंत्र। सरकारी कर्मचारी नियमों का ऐसा पाठ पढ़ाते हैं मानो नियमावली स्वयं उनके घर की वंशावली हो। और आम आदमी? वह तो सबसे बड़ा संत है। उसे अपने सारे पाप परिस्थितियों की देन लगते हैं और दूसरों की सारी भूलें चरित्र दोष।
धर्म अपना सबसे महान लगता है, जात अपनी सबसे प्रामाणिक। मोहल्ले का आदमी अपने मोहल्ले को श्रेष्ठ मानता है, गाँव वाला गाँव को और शहर वाला शहर को। मानो ईश्वर ने पूरी सृष्टि बनाई ही इसलिए हो कि हर व्यक्ति अपने-अपने हिस्से को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर सके।
बघेली में कहें तो, “सब्बो अपने-अपने ढोल मा मस्त हैं, अउ दूसर के सुर बेसुरा लगत हैं।”
असल में दुनिया का सबसे बड़ा उद्योग आजकल वस्तुओं का नहीं, आत्म-औचित्य का उत्पादन है। हर कोई अपने लिए तर्क गढ़ रहा है। जिसने अच्छा किया, वह अपनी अच्छाई का विज्ञापन कर रहा है। जिसने बुरा किया, वह उसके समर्थन में शोधपत्र लिख रहा है।
जिसके साथ बुरा हुआ, वह रोता है। जिसके साथ अच्छा हुआ, वह हँसता है। दोनों को लगता है कि न्याय उनके पक्ष में होना चाहिए। लेकिन जीवन की अदालत में न कोई स्थायी अभियुक्त है, न कोई स्थायी न्यायाधीश। समय कभी गवाह बन जाता है, कभी वकील, और कभी फैसला सुनाने वाला जज।
शायद प्रश्न यह नहीं है कि “अच्छा कौन है?”
प्रश्न यह है कि “अपने आपको अच्छा मानने के बावजूद हम दूसरों के लिए कितने अच्छे हैं?”
क्योंकि आईना कभी झूठ नहीं बोलता, पर दुर्भाग्य यह है कि हममें से अधिकांश लोग आईना देखने नहीं, आईने को समझाने में लगे हुए हैं कि असली चेहरा कौन-सा है।
और यही इस युग का सबसे बड़ा व्यंग्य है।
आचार्य प्रताप
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