लोकतंत्र का अचार और जनादेश का बर्तन

लोकतंत्र बड़ा विचित्र जीव है। यह न तो पूरी तरह गाय है कि हर कोई दुह ले, न पूरी तरह शेर है कि सब उससे डरें। यह तो उस गाँव के कुएँ जैसा है, जिसमें हर व्यक्ति अपनी परछाई देखकर स्वयं को सबसे सुंदर समझता है। चुनाव जीतने वाला उसे अपना प्रेमपत्र मानता है और हारने वाला उसे जनता की भूल।

हाल ही में दो सज्जनों के बीच संवाद पढ़ने का सौभाग्य मिला। एक पक्ष ने लोकतंत्र को समझाने के लिए अचार, गदहे, नंदी और आँखों की ज्योति का सहारा लिया। दूसरे पक्ष ने उसी अचार को वापस लोकतंत्र की थाली में परोस दिया। पढ़कर लगा कि हमारे यहाँ राजनीति कम और उपमाओं का कृषि विश्वविद्यालय अधिक चल रहा है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यहाँ हर व्यक्ति स्वयं को जनता का प्रियतम और विरोधी को जनता की भूल मानता है। सत्ता में रहने वाला कहता है—"मेरे विकास को देखने के लिए आँखों में ज्योति चाहिए।" और सत्ता से बाहर करने वाली जनता सोचती है—"ज्योति तो थी, तभी तो सब दिख गया।"

अब अचार का प्रसंग बड़ा रोचक है। भारतीय राजनीति और अचार में कई समानताएँ हैं। दोनों को बनाने में समय लगता है, दोनों में मसाले खूब पड़ते हैं और दोनों को लोग वर्षों तक सँभालकर रखते हैं। अंतर केवल इतना है कि अचार में जब दुर्गंध आने लगे तो लोग उसे फेंक देते हैं, लेकिन राजनीति में दुर्गंध आने पर नेता पहले जनता की नाक पर ही प्रश्नचिह्न लगा देता है।

कोटर हो, दिल्ली हो या भोपाल—लोकतंत्र का नियम बड़ा सरल है। जनता किसी को स्थायी पट्टा नहीं देती। वह पाँच वर्ष के लिए किरायेदारी देती है। लेकिन हमारे यहाँ कुर्सी पर बैठते ही कई लोग उसे पैतृक संपत्ति समझ बैठते हैं। फिर जब जनता किरायानामा रद्द करती है तो उन्हें आश्चर्य होता है कि "इतना विकास किया, फिर भी हार गए!"

अरे भैया, लोकतंत्र में विकास उतना ही महत्वपूर्ण है जितना विवाह में प्रेम। लेकिन केवल प्रेम से विवाह नहीं चलता और केवल सड़क-नाली से जनादेश नहीं मिलता। जनता सड़क भी देखती है, व्यवहार भी देखती है और सबसे अधिक अहंकार का तापमान नापती है।

हमारे गाँव में एक बुजुर्ग कहा करते थे—"बेटा, जनता बड़ी सयानी होती है। वह पाँच साल तक चुप रहती है और छठवें साल ईवीएम से कविता लिख देती है।" उस कविता में कहीं प्रशंसा होती है, कहीं तिरस्कार और कहीं सीधा विस्मयादिबोधक चिह्न।

संवाद में 'गदहे' और 'नंदी' का भी उल्लेख आया। यह भी लोकतंत्र का पुराना रोग है। जब तर्क कमजोर पड़ जाते हैं तो पशु-पक्षियों को राजनीति में भर्ती कर लिया जाता है। कभी कोई शेर बन जाता है, कोई हाथी, कोई कमल, कोई साइकिल और अंततः बहस गदहे तक पहुँच जाती है। बेचारा गदहा भी सोचता होगा कि "मैंने तो केवल बोझ ढोया था, राजनीतिक उपमा बनने का अपराध कब कर दिया?"

सच तो यह है कि लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं, जनादेश बड़ा होता है। कल जिसे जनता ने सिर पर बैठाया था, आज उसे नीचे उतार सकती है। और जिसे कल कोई नहीं पूछता था, उसे आज मंच का केंद्र बना सकती है। यही लोकतंत्र का सौंदर्य है और यही उसकी क्रूरता भी।

#बघेली में कहें तो—"जनता कउनौ के सगा नइ होय। जउन दिन मन भा गओ, सिर चढ़ाय लेथै; जउन दिन मन बिगड़ गओ, उहै सिर से उतार फेंकथै।"

विडंबना यह है कि नेता हारने के बाद जनता को समझाने लगते हैं कि उसने गलत निर्णय लिया है। यह वैसा ही है जैसे परीक्षा में अनुत्तीर्ण छात्र शिक्षक को समझाए कि उत्तरपुस्तिका ही गलत जाँची गई है। लोकतंत्र में जनता अंतिम परीक्षक है। उसके निर्णय पर अपील तो हो सकती है, पुनर्मूल्यांकन नहीं।

इस पूरे संवाद ने एक बात स्पष्ट कर दी कि हमारे यहाँ लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अहंकार और जनादेश के बीच चलने वाला सतत संवाद है। कभी जनता नेता को आईना दिखाती है, कभी नेता जनता को दृष्टिदोष का प्रमाणपत्र बाँटता है। लेकिन अंततः फैसला उसी जनता का चलता है, जिसे चुनाव के समय "जनार्दन" और परिणाम के बाद कभी-कभी "भ्रमित" कहा जाता है।

लोकतंत्र का असली सौंदर्य इसी में है कि यहाँ अचार भी बोलता है, बर्तन भी और खाने वाला भी। किंतु अंतिम निर्णय स्वाद का होता है। जनता यदि किसी अचार को बर्तन से निकाल दे, तो बुद्धिमानी इसी में है कि वह अपने मसालों की समीक्षा करे, जनता की जीभ को दोष न दे।

क्योंकि लोकतंत्र में कुर्सियाँ स्थायी नहीं होतीं, केवल जनता स्थायी होती है। और जनता, भैया, बड़ी शांत दिखती है—पर जब फैसला करती है तो बड़े-बड़े विकास पुरुषों को भी यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि आखिर अचार में नमक कम था या अहंकार ज्यादा।

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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