“क्षमाशस्त्रं करे यस्य दुर्जनः किं करिष्यति।”
हमारे देश में शस्त्रों की बड़ी महिमा रही है। किसी के पास तलवार है, किसी के पास लाठी है, किसी के पास सत्ता है और आजकल कुछ लोगों के पास सोशल मीडिया का कमेंट बॉक्स है। किंतु शास्त्रकारों ने बड़ी दूरदर्शिता से एक ऐसा शस्त्र भी बताया था जो बिना लाइसेंस के चलता है, बिना धार के काटता है और बिना आवाज़ के दुर्जनों की पूरी दुकान बंद कर देता है—वह है क्षमा का शस्त्र।
दुर्जन का पूरा व्यवसाय ही इस बात पर टिका होता है कि सामने वाला तिलमिला जाए। वह अपमान की गेंद फेंकता है और उम्मीद करता है कि आप क्रोध का छक्का मारेंगे। लेकिन यदि आपने गेंद उठाकर उसे ही लौटा दी और मुस्कुराकर कहा—“कोई बात नहीं भाई, क्षमा किया”—तो बेचारा दुर्जन उसी प्रकार निराश हो जाता है जैसे चुनाव के मौसम में नेता बिना भीड़ की सभा देखकर।
आजकल क्षमा करना भी एक प्रकार की सामाजिक क्रांति है। लोग अपशब्द सुनकर क्षमा नहीं करते, बल्कि स्क्रीनशॉट लेते हैं। फिर उसे दस ग्रुपों में भेजते हैं, पाँच स्टेटस लगाते हैं और तीन दिन तक इस बात का शोक मनाते हैं कि उनका अपमान हुआ है। मानो अपमान कोई राष्ट्रीय आपदा हो जिसका राहत पैकेज मिलना चाहिए।
एक सज्जन मिले। बोले—“मैंने पड़ोसी को पाँच साल से माफ़ नहीं किया है।”
मैंने पूछा—“उसने ऐसा क्या अपराध कर दिया?”
बोले—“अभी तक तो कुछ नहीं, लेकिन संभावना बनी हुई है।”
यह हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है। लोग अपराध से कम और उसकी कल्पना से अधिक दुखी हैं। क्षमा की जगह संदेह ने ले ली है। जैसे घर में राशन जमा किया जाता है, वैसे ही लोग मन में शिकायतें जमा करते रहते हैं।
हमारे कस्बे के एक बाबूजी बड़े सिद्धांतवादी थे। एक बार बाजार में किसी ने उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित कर दिया। सबको लगा अब महाभारत छिड़ेगा। पर बाबूजी मुस्कुराए और बोले—“भइया, तुम्हारा काम था गाली देना, मेरा काम है क्षमा करना। दोनों अपना-अपना काम करें।”
गाली देने वाला व्यक्ति पहले तो चकराया, फिर उदास हो गया। अगले कई दिनों तक वह लोगों से शिकायत करता फिरा—“यार, आदमी में ज़रा भी प्रतिक्रिया नहीं थी। पूरी मेहनत बेकार चली गई।”
वास्तव में दुर्जन की सबसे बड़ी पूँजी हमारी प्रतिक्रिया है। वह हमारे क्रोध के ब्याज पर जीता है। जैसे कुछ व्यापारी ग्राहक के बिना नहीं चल सकते, वैसे ही दुर्जन झगड़े के बिना नहीं चल सकता। क्षमा उसके व्यापार पर नोटबंदी की तरह गिरती है।
आज राजनीति से लेकर पारिवारिक व्हाट्सऐप समूहों तक, हर जगह लोग युद्ध की मुद्रा में खड़े हैं। कोई विचार से आहत है, कोई टिप्पणी से आहत है, कोई इमोजी से आहत है। ऐसा लगता है मानो पूरा समाज एक विशाल बारूदखाना बन गया हो और हर व्यक्ति अपने भीतर माचिस लेकर घूम रहा हो।
ऐसे समय में क्षमा का अर्थ कायरता नहीं, बल्कि आत्मबल है। क्रोध करना आसान है; उसके लिए बुद्धि की आवश्यकता नहीं पड़ती। क्षमा करना कठिन है, क्योंकि उसके लिए मनुष्य को अपने अहंकार पर विजय प्राप्त करनी पड़ती है। तलवार चलाना सरल है, स्वयं पर नियंत्रण रखना कठिन।
हमारी बघेली में बुजुर्ग कहा करते थे—“जउन मनई हर बात मा भभक जाय, उ चूल्हा त हो सकत है, दीपक नहीं।” अर्थात जो हर बात पर भड़क जाए, वह चूल्हा तो हो सकता है, प्रकाश देने वाला दीपक नहीं।
अंततः प्रश्न दुर्जन का नहीं, हमारे मन का है। दुर्जन तो अपना स्वभाव निभाएगा। कीचड़ का काम छींटे उड़ाना है। किंतु यदि हम हर छींटे पर युद्ध छेड़ देंगे तो जीवन का अधिकांश समय कपड़े धोने में ही निकल जाएगा।
इसलिए क्षमा का शस्त्र केवल दुर्जन को परास्त नहीं करता, वह हमें भी मुक्त करता है। और जब मनुष्य भीतर से मुक्त हो जाता है, तब दुर्जन सचमुच असहाय हो जाता है। आखिर जिस व्यक्ति ने अपमान को स्वीकार ही नहीं किया, उसका अपमान कौन कर सकता है?
शायद इसी कारण कहा गया—“क्षमाशस्त्रं करे यस्य दुर्जनः किं करिष्यति।” क्षमा वह कवच है जिसमें प्रहार करने वाला ही सबसे पहले थक जाता है।
आचार्य प्रताप