भूमिका के रूप में यह समझ लीजिए कि हमारे देश में परीक्षा अब केवल परीक्षा नहीं रह गई है, वह लोकतंत्र का लोकनृत्य बन चुकी है। पहले बच्चे परीक्षा देने जाते थे, अब व्यवस्था परीक्षा देने जाती है—और हर बार फेल होकर लौटती है।
नीट का पेपर लीक होना भी कोई साधारण घटना नहीं थी। यह हमारे समय की वह सामूहिक उपलब्धि है जिसमें विद्यार्थी से लेकर व्यवस्था तक सबने अपना-अपना योगदान दिया।
और असली कारण क्या था?
कारण वही पुराना—“जनसंपर्क की कमी”।
कहते हैं पिछली बार सरकार छात्रों को केंद्र तक पहुँचाने के लिए मुफ्त बस और सतुआ का शरबत पिलाने से चूक गई थी। अब भला सोचिए, जिस देश में चुनाव के समय मतदाता को घर से उठाकर बूथ तक पहुँचाने की परंपरा हो, वहाँ विद्यार्थी को परीक्षा केंद्र तक अपने खर्चे से जाना पड़े—यह कैसी असंवैधानिक असुविधा है!
हमारे गाँव में बड़कऊ काका बोले—
“बबुआ, जब नेता जी वोट मांगते हैं त हमरे द्वार तक जीप भेज देत हैं। अउर ई बच्चन से कहत हैं कि ‘एडमिट कार्ड डाउनलोड करो, सेंटर खुद खोजो, पानी की बोतल खुद भरो।’ ई न्याय है का?”
काका की बात में दम था। लोकतंत्र में सुविधा का वितरण समान होना चाहिए। जब राजनीति में ‘मैनेजमेंट’ हो सकता है तो शिक्षा में क्यों नहीं?
अब देखिए, एक गरीब विद्यार्थी तीन-तीन महीने कोचिंग में ऐसा पिसता है जैसे चक्की में गेहूँ। सुबह चार बजे उठकर “ऑर्गेनिक केमिस्ट्री” रटता है, रात में “बायोलॉजी” के डायग्राम बनाते-बनाते उसकी अपनी नसों का डायग्राम बदल जाता है। माँ घर में तुलसी के नीचे दिया जलाती है, पिता जी रिश्तेदारों से नजर बचाकर उधार लेते हैं। और अंत में पता चलता है कि पेपर तो पहले ही व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय से स्नातक हो चुका था।
अब इसमें विद्यार्थी क्या करे?
वह तो बेचारा ईमानदारी की पुरानी किताब लेकर बैठा था, जबकि बाजार में “लीक एडिशन” उपलब्ध था।
आजकल पेपर लीक भी स्टार्टअप संस्कृति का हिस्सा बन गया है। पहले लोग दूध बेचते थे, अब “प्रश्नपत्र” बेचते हैं। पहले गाँव में कोई कहता था—“हमरा लड़का इंजीनियर है।” अब लोग फुसफुसाकर कहते हैं—“हमार भतीजा नेटवर्किंग में है।”
और यह नेटवर्किंग इतनी तेज है कि प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्र से पहले अभ्यर्थी के मोबाइल में पहुँच जाता है। डाक विभाग भी इतनी तत्परता से चिट्ठी नहीं पहुँचाता।
सरकार हर बार बड़ी गंभीर मुद्रा में कहती है—
“दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।”
यह वाक्य अब भारतीय राजनीति का राष्ट्रीय लोरीगीत बन चुका है। इसे सुनते ही जनता को नींद आने लगती है। दोषी इतने वर्षों से “नहीं बख्शे” जा रहे हैं कि अब उन्हें भी अपनापन महसूस होने लगा होगा।
एक मंत्री जी ने कहा—
“पेपर लीक माफिया पर सख्त कार्रवाई होगी।”
सुनकर लगा जैसे बरसों से माफिया लोग सरकार की अनुमति लेकर ही लीक कर रहे थे और अब अनुबंध समाप्त हो गया हो।
हमारे सतना तरफ के एक मास्टर साहब कहत रहे—
“अब पढ़ाई कम, जुड़ाई ज्यादा जरूरी है।”
मैंने पूछा—“का मतलब?”
बोले—
“अरे, किताब से जुड़ो न जुड़ो, लेकिन सही आदमी से जुड़ जाओ। मेडिकल कॉलेज का रास्ता ‘मेरिट’ से कम, ‘मैनेजमेंट’ से ज्यादा खुल रहा है।”
यह सुनकर मुझे लगा कि देश में शिक्षा धीरे-धीरे प्रतियोगिता से निकलकर संपर्क साधना बनती जा रही है। पहले बच्चे “गुड मॉर्निंग टीचर” बोलते थे, अब शायद कहना पड़े—“गुड मॉर्निंग सर, कोई सेटिंग हो तो बताइए।”
और समाज भी बड़ा विचित्र है। जिस बच्चे के नंबर कम आएँ, उसे आलसी घोषित कर देता है; लेकिन जब वही बच्चा सिस्टम से हारकर निराश होता है, तब सब उसे मोटिवेशनल वीडियो भेजने लगते हैं।
जैसे देश में हर समस्या का समाधान दो चीज़ों से हो सकता है—
एक, राष्ट्रभक्ति।
दो, प्रेरणादायक रील।
असल दुख यह नहीं कि पेपर लीक हुआ। असली दुख यह है कि अब मेहनती बच्चे को अपनी मेहनत पर भरोसा कम और व्यवस्था पर शक ज्यादा होने लगा है। वह पढ़ते-पढ़ते अचानक पूछ बैठता है—
“सर, एग्जाम होगा या फिर कोई नया एपिसोड आएगा?”
हमने शिक्षा को ऐसा अखाड़ा बना दिया है जहाँ विद्यार्थी पहलवान कम और प्रयोगशाला के चूहे ज्यादा लगते हैं। हर साल नई नीति, नया पैटर्न, नई जांच समिति। केवल पुरानी चीज़ बची है—अव्यवस्था।
और अंत में, यही कहना है कि यदि व्यवस्था सचमुच विद्यार्थियों को सम्मान देना चाहती है तो उन्हें बस और सतुआ का शरबत नहीं, भरोसा पिलाइए।
क्योंकि जिस देश का युवा अपने परिश्रम पर विश्वास खो देता है, वहाँ केवल पेपर नहीं लीक होते—भविष्य भी रिसने लगता है।
व्यंग्य अपनी जगह है, पर प्रश्न गंभीर है।
यदि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र बिकने लगे और परीक्षा के बाद नैतिकता पर भाषण, तो समझ लीजिए कि शिक्षा मंदिर नहीं रही—मेला बन गई है।
और मेले में सबसे सस्ती चीज़ होती है—ईमानदारी।
आचार्य प्रताप
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