आंदोलन, आरती और बेरोज़गारी का राष्ट्रीय उत्सव

आंदोलन, आरती और बेरोज़गारी का राष्ट्रीय उत्सव

हमारा देश बड़ा लोकतांत्रिक है। यहाँ हर आदमी को अधिकार है कि वह अपने ही भविष्य के खिलाफ खड़ा हो जाए। और यदि वह ऐसा करते हुए गर्व महसूस करे, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र परिपक्व हो चुका है।

13 मई का आंदोलन भी कुछ ऐसा ही था। कुछ लोग सड़क पर थे, कुछ लोग घर पर थे, और कुछ लोग इस इंतज़ार में थे कि कौन जीते ताकि बाद में उसी के साथ फोटो डाल सकें। आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि उसे कमजोर करने वालों ने पूरा नैतिक समर्थन दिया। वे आंदोलन में नहीं आए, ताकि आंदोलन की पवित्रता बनी रहे। त्याग देखिए!

हमारे समाज में एक अद्भुत परंपरा है—जो व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ता, उसे सबसे समझदार माना जाता है। और जिसकी वेटिंग कम हो, जो चयन सूची से दूर हो, वह तो सीधे “राष्ट्र ऋषि” घोषित कर दिया जाता है। ऐसे लोगों की आरती उतारनी चाहिए। वे बेरोज़गारी की तपस्या कर रहे हैं।
किसी मंदिर के बाहर लिखा होना चाहिए—

“यहाँ वही प्रवेश करें जिन्होंने अपने ही भविष्य के विरुद्ध कार्य किया हो।”

आज का बेरोज़गार युवा बड़ा आध्यात्मिक हो गया है। नौकरी नहीं मिली तो उसने इसे “भाग्य” मान लिया। आंदोलन नहीं किया तो उसे “संस्कार” कह दिया। और जो आंदोलन में गए, उन्हें समाज ने ऐसे देखा जैसे वे देश का बजट लेकर भाग गए हों।

मध्यप्रदेश का भोला समाज तो विशेष बधाई का पात्र है। यहाँ आदमी अपनी नाव में खुद छेद करता है और फिर गर्व से कहता है—
“देखो, मैं कितना निष्पक्ष हूँ, सबको डूबने का समान अवसर दे रहा हूँ।”

कुछ लोग आंदोलन में इसलिए नहीं गए क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं नौकरी मिल गई तो वर्षों से संजोई बेरोज़गारी की विरासत टूट जाएगी। घरवालों को भी आदत पड़ चुकी है—
“बेटा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है।”
यह वाक्य भारतीय परिवारों का राष्ट्रीय लोरी गीत बन चुका है।

नेताओं ने भी जनता को खूब समझाया—
“शांत रहिए, संयम रखिए।”
क्योंकि इतिहास गवाह है, शांत जनता से ज्यादा सुविधाजनक कुछ नहीं होता।

आख़िर में यही कहना है कि इस देश में आंदोलन से ज्यादा शक्तिशाली चीज़ है—आंदोलन से दूरी बनाकर उस पर ज्ञान देना।
और बेरोज़गारी अब समस्या नहीं, सामूहिक सांस्कृतिक उत्सव बन चुकी है।

धन्य हैं वे लोग जो हर बार अपने ही हक़ के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।
इतिहास उन्हें याद न रखे, पर भर्ती बोर्ड ज़रूर रखेगा—
“अनुपस्थित अभ्यर्थी” लिखकर।

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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