राजनीति के इस विराट मंचीय मेले में एक ऐसा खिलाड़ी भी है,
जो हर चुनाव के बाद “अकेला” घोषित कर दिया जाता है,
पर उसके अकेलेपन का हिसाब लगाइए तो
कई राज्यों के सिंहासन उसके रास्ते में पड़े मिलते हैं।
किसी ने बंगाल की चौखट संभाली,
किसी ने उत्तर प्रदेश की सियासत की साइकिल थामी,
कोई बिहार की सत्ता के पलंग पर करवट बदलता रहा,
तो कोई दक्षिण में द्रविड़ राजनीति का ध्वज उठाए रहा।
किसी ने दिल्ली की कुर्सी पर बैठकर क्रांति का झाड़ू चलाया,
तो किसी ने महाराष्ट्र की राजनीति में विरासत का दीप जलाए रखा।
कुछ लोग राष्ट्रवाद की ढाल ओढ़े रहे,
कुछ समाजवाद की रजाई में दुबके रहे।
पर इतिहास बड़ा निर्दयी मुनीम होता है बाबू…
वह गिनती चेहरे नहीं, परिणाम की करता है।
और कमाल देखिए—
जिसे रोज़ “असफल” कहकर चौराहे पर नापा गया,
उसने बिना शोर मचाए
राजनीति के कितने महारथियों को
समय के संग्रहालय में रखवा दिया।
पर घमंड?
वह तो आजकल छोटे-मोटे प्रवक्ताओं तक में कूट-कूटकर भरा है।
जिसने सचमुच बड़े-बड़े सूरमाओं को
राजनीतिक संन्यास की ओर धकेला,
वह आज भी मुस्कराकर बस इतना कहता है—
“लड़ाई विचारों की है, व्यक्तियों की नहीं…”
बाकी जनता है…
वह आज भी टीवी की बहस में
हारने वाले को “शेर”
और बच जाने वाले को “कमज़ोर” मानकर ताली बजा रही है।
आचार्य प्रताप