सिनेमा के विशाल, मायावी और रक्तरंजित कैनवास पर जब कोई ऐसी कथा अवतरित होती है, जिसने पूर्व में डिजिटल माध्यम पर अपनी हिंसक जड़ों से दर्शकों के एक बड़े वर्ग को मंत्रमुग्ध किया हो, तो एक समीक्षक के रूप में अपेक्षाओं और आशंकाओं का द्वंद्व स्वाभाविक है। मैं, आचार्य प्रताप, आज उसी बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित फिल्म 'मिर्ज़ापुर: द मूवी' की विस्तृत, शोधपरक और निष्पक्ष विवेचना करने जा रहा हूँ। यह समीक्षा किसी प्रशस्ति-गान या निंदा-प्रस्ताव का मसौदा मात्र नहीं है, बल्कि उन दृश्य-बिंबों, संवादों, चरित्र-निर्माण और सिनेमैटिक शिल्प की एक गहरी चीर-फाड़ है, जिसे फिल्म निर्माताओं ने इस महाकाव्यात्मक विस्तार में पिरोने का प्रयास किया है। एक अकादमिक औपचारिकता के तहत इस सिनेमाई कृति का परिचय देना आवश्यक है। अपराध, राजनीति और पारिवारिक प्रतिशोध की विधा पर आधारित लगभग सवा तीन घंटे की इस फिल्म में हिंदी, अवधी और भोजपुरी की गमक लिए हुए संवादों का ताना-बाना बुना गया है। अभिनय के मोर्चे पर पंकज त्रिपाठी, रवि किशन, अली फ़ज़ल, दिव्येंदु शर्मा, रसिका दुग्गल, मोहित मलिक और जीतू जैसे नाम शामिल हैं।
दर्शक जब सिनेमाघर के अंधकार में प्रवेश करता है, तो उसके भीतर एक ही आकांक्षा होती है—बीना का कमाल, दिव्येंदु-पंकज का धमाल और रवि किशन का बवाल। फिल्म यह दावा भी करती है कि यह इन तीनों तत्त्वों का एक 'कॉम्पैक्ट पैकेज' है। शिल्प और कथा-संरचना की बात करें तो, सिनेमाघरों के लिए निर्मित यह फिल्म अपने उद्भव के मूल माध्यम की सीमाओं को लांघकर एक वृहद् दृश्य-अनुभव देने का प्रयास करती है। फिल्म का छायांकन पूर्वांचल के उस खुरदरेपन, धूल और बारूद के धुएँ को बड़ी सघनता से पकड़ता है। लेकिन क्या केवल तकनीकी भव्यता और यह कमाल, धमाल और बवाल का फॉर्मूला किसी कथा की आत्मा को जीवित रख सकता है? इस प्रश्न का उत्तर हमें फिल्म के अंतर्विरोधों और पटकथा की उस भूलभुलैया में मिलता है जहाँ कुछ निर्णय अत्यंत सटीक बैठते हैं और कुछ इतने भ्रामक हैं कि वे पूरे सिनेमाई अनुभव को खंडित कर देते हैं।
अभिनय और पात्र-चयन किसी भी फिल्म की प्राणवायु होते हैं। इस दृष्टिकोण से, फिल्म का सबसे कमजोर और दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष अभिनेता जीतू का चयन है। एक समालोचक के रूप में मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मिर्ज़ापुर की वह धरती, जहाँ की हवा में बारूद और रक्त की गंध है, वहाँ एक चॉकलेटी बॉय की छवि वाले अभिनेता को इतने अधिक 'स्क्रीन प्रेजेंस' के साथ स्थापित करना, निर्देशकीय दृष्टि की सबसे बड़ी भूल है। कला और सौंदर्यशास्त्र में एक सिद्धांत है 'रस-भंग'। जब आप खूँखार और यथार्थवादी अभिनेताओं के बीच जीतू को खड़ा करते हैं, तो दृश्य का पूरा गुरुत्वाकर्षण नष्ट हो जाता है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे कबाब में हड्डी या बिरयानी में इलायची का आ जाना, जिनका एकमात्र काम अच्छा-भला मूड खराब करना होता है। फिल्म का मिजाज इतना कठोर है कि यहाँ विक्रांत मैसी जैसा मंझा हुआ अभिनेता भी यदि होता, तो शायद उसे भी इस परिवेश में ढलने में पसीना आ जाता, लेकिन जीतू का अभिनय यहाँ इतना कृत्रिम और सतही है कि वह फिल्म के मूल प्रभाव को ही नष्ट कर देता है।
इसके ठीक विपरीत, यदि इस फिल्म में कोई ऊर्जा का प्रखर केंद्र है, जो अपने अभिनय से पूरे पर्दे को लील जाता है और असल मायनों में 'बवाल' पैदा करता है, तो वह हैं रवि किशन। रवि किशन, जो फिल्म में बब्बन यादव के रूप में अवतरित हुए हैं, उनका प्रवेश इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि वे केवल मीम या सतही मनोरंजन के लिए नहीं बने हैं। उनका चरित्र-चित्रण इतना सघन, क्रूर और प्रभावशाली है कि वे पहली ही बार में कालीन भैया यानी अखंडानंद त्रिपाठी के स्थापित वजूद को निगल जाते हैं। एक-एक दृश्य में उनका एकाधिकार दिखाई देता है। उनका यह संवाद कि—"हम जिस खानदान से आते हैं वहीं माँगते नहीं छीन लेते हैं"—केवल एक वाक्य नहीं है, बल्कि पूर्वांचल के उस सामंती और बाहुबली यथार्थ का दार्शनिक घोषणापत्र है जहाँ सत्ता, अधिकार और सम्मान कभी भी याचना से नहीं मिलते, वे बाहुबल से अधिग्रहित किए जाते हैं। रवि किशन ने इस संवाद को जिस शारीरिक भाषा, आँखों की क्रूरता और संवाद-अदायगी के साथ जीवंत किया है, वह उन्हें एक महान अभिनेता की श्रेणी में ला खड़ा करता है।
बब्बन यादव के इसी वर्चस्व को और अधिक धारदार बनाने के लिए कथा में एक नए चरित्र का प्रवेश होता है, बिरजू लोहार, जिसे मोहित मलिक ने निभाया है। टेलीविजन के पारिवारिक दायरों से निकलकर मिर्ज़ापुर के बारूदी यथार्थ में मोहित मलिक का यह पदार्पण उनके अभिनय-विस्तार की एक गंभीर परीक्षा है। लोहार जैसे कठोर उपनाम के साथ मोहित मलिक का यह दमदार अवतार फिल्म के खुरदरेपन के साथ पूर्ण न्याय करता है। बिरजू लोहार, बब्बन यादव का एक बेहद वफादार साथी है, जो अपने खास अंदाज में दुश्मनों से निपटता है। यह गठजोड़ पूर्वांचल के बाहुबली सिंडिकेट में शक्ति-संतुलन के उस यथार्थ को दर्शाता है, जहाँ कोई भी नेता बिना अपने वफादार सिपहसालारों के अधूरा है।
वहीं दूसरी ओर, मिर्ज़ापुर के पर्याय बन चुके पंकज त्रिपाठी इस फिल्म में अपनी ही परछाईं के शिकार नज़र आते हैं। जिस चरित्र ने खामोशी और आँखों की सुस्त हरकतों से खौफ का साम्राज्य स्थापित किया था, वह यहाँ अपनी उस चमक को खोता हुआ प्रतीत होता है। ऐसा लगता है जैसे पंकज त्रिपाठी अपने ही गढ़े हुए कालीन भैया के खोल में कैद हो गए हैं। जब रवि किशन जैसा कोई अभिनेता सामने एक प्रचंड ऊर्जा के साथ खड़ा हो, तो कालीन भैया की यह सुस्ती चरित्र की गहराई कम, और अभिनेता की थकान अधिक लगती है। पटकथा के अंतर्विरोधों को समझने के लिए फिल्म के एक अन्य महत्त्वपूर्ण संवाद की गहराई में उतरना आवश्यक है। नेता यादव जब कहते हैं कि, "चूतिया है तुम्हारा लड़का," तो इसके प्रत्युत्तर में त्रिपाठी का संवाद, "चूतिया है ये इंपोर्टेंट नहीं है; हमारा लड़का है ये इंपोर्टेंट हैं," भारतीय राजनीति, वंशवाद और पितृसत्तात्मक अंधविश्वास का नग्न चित्रण है। यह केवल दो अपराधियों के बीच की बातचीत नहीं है; यह उस सामंती व्यवस्था का क्रूर सत्य है जहाँ योग्यता का कोई मोल नहीं है। सत्ता का हस्तांतरण केवल रक्त के आधार पर होता है।
अब आते हैं फिल्म के उस हिस्से पर जो दर्शकों के लिए 'धमाल' भी है और कथ्य के स्तर पर सबसे बड़ा अंतर्विरोध भी—मुन्ना भैया का पुनर्जीवित होना। यह तथ्य गहराई से अंकित था कि मुन्ना भैया मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, किंतु इस फिल्म में यह दिखाना कि वह अभी भी जीवित है, व्यावसायिक लाभ के लिए लिया गया एक कृत्रिम निर्णय प्रतीत होता है। मुन्ना भैया का चरित्र मिर्ज़ापुर की उस अराजकता का प्रतीक है जिसे किसी भी नियम से नहीं बांधा जा सकता। फिल्म में उनका संवाद—"जो भरोसे वाले होते हैं वहीं भोसडी वाले होते हैं"—यद्यपि सुनने में घोर आपत्तिजनक लग सकता है, किंतु यह मुन्ना भैया के दर्शन और मिर्ज़ापुर की दुनिया का परम सत्य है। मुन्ना यह भली-भांति जानता है कि इस हिंसक दुनिया में 'विश्वास' सबसे बड़ा भ्रम है। यह संवाद केवल भाषा का विद्रूपीकरण नहीं है, बल्कि उस समाज के चारित्रिक पतन का सबसे बड़ा साक्ष्य है। लेकिन इसी मुन्ना भैया के इर्द-गिर्द बुनी गई उप-कथा, जहाँ यह दर्शाया गया है कि उनके संबंध अपनी प्रेमिका के साथ-साथ गुड्डू पंडित की प्रेमिका से भी हैं, फिल्म की मूल आत्मा से भटककर इसे एक सस्ते धारावाहिक के स्तर पर ले आती है। वर्चस्व की लड़ाई के बीच इस तरह की अपरिपक्व प्रेम-कहानियों का घालमेल फिल्म की गंभीरता को नष्ट कर देता है।
कथा में जो सबसे चौंकाने वाला और 'कमाल' का तत्त्व है, वह है बीना त्रिपाठी के चरित्र का नया आयाम। बीना त्रिपाठी के अतीत का यह रहस्योद्घाटन कि त्रिपाठी खानदान की बहू बनने से पूर्व बिरजू लोहार उसका प्रेमी था, बीना को एक शोषित महिला से एक खतरनाक रणनीतिकार में बदल देता है। फिल्म का सबसे क्रूर, रूह कंपा देने वाला और दार्शनिक रूप से मारक दृश्य वह है जब अखंडानंद त्रिपाठी के पिता (बाबूजी), बिरजू लोहार को बेरहमी से मार रहे होते हैं। उस पाशविक हिंसा के बीच बीना त्रिपाठी का यह संवाद—"Love ही तो है, Life time थोड़ी ही रहता है"—भारतीय सिनेमा में प्रेम के चिरंतन और शाश्वत होने के उस पारंपरिक आदर्शवाद का सबसे निर्मम विखंडन है। एक ओर जहाँ बाबूजी की यह हिंसा सर्वोच्च पितृसत्ता का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर बीना का यह ठंडा और संवेदनहीन संवाद उसे एक ऐसी निष्ठुर उत्तरजीवी बना देता है, जिसके लिए प्रेम केवल एक तात्कालिक आवश्यकता है। यह संवाद मिर्ज़ापुर की उस अंधकारमय ज़मीन का परम सत्य है, जहाँ मृत्यु और सत्ता ही एकमात्र शाश्वत तत्त्व हैं।
फिल्म का अंत जिस सस्पेंस के साथ किया गया है, वह भी कोई कलात्मक परिणति नहीं है। केवल इस गारंटी के बिना कि आगे क्या होगा, दर्शकों को बीच मँझधार में छोड़ देना, कला के प्रति बेईमानी है। निष्कर्षतः, आचार्य प्रताप के रूप में मेरा यह स्पष्ट मूल्यांकन है कि यह सिनेमाई महाकाव्य एक खंडित अनुभव है। यह फिल्म वाकई बीना के कमाल, दिव्येंदु-पंकज के धमाल और रवि किशन के बवाल का एक कॉम्पैक्ट पैकेज है। इसकी उपलब्धियाँ इसके शानदार दृश्य-संयोजन, बीना की निष्ठुर व्यावहारिकता, मुन्ना के अराजक दर्शन, मोहित मलिक के सधे हुए पदार्पण और रवि किशन के उस तूफानी अभिनय में निहित हैं जिसने इस फिल्म को एक नई ऊर्जा दी है। वहीं दूसरी ओर, इसकी सीमाएँ जीतू जैसे अयोग्य कास्टिंग निर्णय, पंकज त्रिपाठी के दोहराव, और मुन्ना भैया को वापस लाकर रचे गए फूहड़ प्रेम-प्रसंगों में स्पष्ट झलकती हैं। इसे बड़े पर्दे पर देखिए, इसके संवादों की गूँज को महसूस कीजिए, लेकिन इससे किसी तार्किक पूर्णता की अपेक्षा मत रखिए, क्योंकि यह सत्ता और रक्त के नशे में धुत एक ऐसी कथा है, जो अपने ही रचे चक्रव्यूह में भटक गई है।