18. एल्गा-गोरस : कुमार पंकज
समीक्षक: आचार्य प्रतापपुस्तक-परिचय
पुस्तक का नाम: एल्गा-गोरस (भाग 1 और 2)
लेखक: कुमार पंकज
विधा: फैंटेसी, रहस्य और मिथक (गद्य-काव्य एवं महागाथा)
प्रकाशक: पंख प्रकाशन
कुल पृष्ठ: 612
प्रकाशन वर्ष: 21 अप्रैल 2026
ISBN: 978-9394878693
मूल्य: ₹450
मैं, आचार्य प्रताप, आज समकालीन हिंदी साहित्य के उस अछूते और विस्मयकारी प्रभाग में प्रवेश कर रहा हूँ, जहाँ यथार्थ और मिथक की सीमाएँ विलीन हो जाती हैं। हिंदी साहित्य के विशाल प्रांगण में जब भी तिलिस्मी, ऐयारी या रहस्यमयी विधा की बात होती है, तो बाबू देवकीनंदन खत्री द्वारा रचित कालजयी श्रृंखला 'चंद्रकांता' और 'चंद्रकांता संतति' का स्मरण होना अत्यंत स्वाभाविक है। वहीं, यदि हम वैश्विक पटल पर दृष्टिपात करें, तो अंग्रेजी साहित्य में 'ऐलिस इन वंडरलैंड' या 'हैरी पॉटर' जैसी कृतियों ने पाठकों के मानस पर दीर्घकाल तक राज किया है। परंतु, कुमार पंकज द्वारा रचित 'एल्गा-गोरस' ने इन स्थापित मिथकों को तोड़ते हुए हिंदी साहित्य में 'डार्क फैंटेसी' और 'हाई फैंटेसी' का एक ऐसा नवीन प्रतिमान गढ़ा है, जो नितांत मौलिक, शोधपरक और कल्पना के सर्वथा अछूते शिखरों का स्पर्श करता है। यद्यपि यह कृति स्थूल रूप से गद्य और महागाथा के रूप में रचित है, तथापि इसके भीतर प्रवाहित होने वाले दार्शनिक सूत्र, काव्यात्मक बिंब, प्रतीक योजना और गूढ़ मानवीय संवेदनाएँ इसे एक उत्कृष्ट गद्य-काव्य के समकक्ष स्थापित करती हैं। एक अनुभवी और निष्पक्ष समीक्षक के रूप में मेरा यह परम दायित्व है कि मैं इसके कथ्य, शिल्प और उन गद्यात्मक 'कविताओं' अथवा सूक्तियों का अत्यंत गहन, पृथक और पाठ-सापेक्ष आलोचनात्मक विवेचन करूँ, जो इस रहस्यमयी महागाथा की मूल आत्मा हैं।
कृति का आरंभिक सम्मोहन ही पाठक की चेतना को एक नितांत भिन्न और मायावी आयाम में ले जाता है। लेखक की असीमित कल्पनाशीलता का प्रथम और सबसे प्रबल बिंब हमें उस प्राक्कथन में प्राप्त होता है, जो इस पूरे रहस्यमय ब्रह्मांड की सुदृढ़ नींव रखता है। कथा के प्रवेश द्वार पर ही लेखक एक ऐसी दार्शनिक और काव्यात्मक पृष्ठभूमि का निर्माण करते हैं, जो पाठक को सम्मोहित कर लेती है:
"यह दास्ताँ सदियों तक काठ के कुछ संदूकों में क़ैद रही, जिसकी हिफ़ाज़त का ज़िम्मा एक संगतराश को सौंपा गया, जो लगभग तीन सदियों तक इसे नष्ट होने से बचाता रहा।"
इन पंक्तियों का भाव-सौंदर्य और अंतर्निहित संदर्भ अत्यंत गहरा और विचारोत्तेजक है। यहाँ प्रयुक्त 'काठ के संदूक' केवल एक सामान्य भौतिक वस्तु के सूचक नहीं हैं, अपितु वे समय की उस अतल और अंधकारमय गहराई के रूपक हैं, जिसमें मानव सभ्यता के आदिम और निषिद्ध रहस्य दबे हुए हैं। 'संगतराश' का बिंब यहाँ उस स्रष्टा, रक्षक या कालजयी दृष्टा का प्रतीक है जो विलुप्त होते ज्ञान और प्राचीन स्मृतियों को काल के निष्ठुर थपेड़ों से सुरक्षित रखता है। इन पंक्तियों में निहित रहस्यवाद पाठक के मन में तीव्र उत्सुकता जगाता है कि आखिर वह कौन सा सत्य है जिसे तीन सौ वर्षों तक सहेजकर रखा गया। साहित्यिक और शिल्पगत दृष्टि से यह कोई साधारण गद्य नहीं है; यह एक काव्यात्मक रहस्योद्घाटन है जो समय की नश्वरता और ज्ञान की शाश्वतता के मध्य एक दार्शनिक सेतु का निर्माण करता है। यहाँ भाषा अपनी चित्रात्मकता के चरम उत्कर्ष पर है, जहाँ मोम की हज़ारों चौकोर पट्टियों और चाँदी की दहकती सलाइयों से उकेरी गई दंतकथा का दृश्य पाठक के मानस पटल पर अत्यंत सजीव और स्पंदित हो उठता है।
कुमार पंकज का यह निर्मित संसार केवल मायावी जीवों, विलक्षण प्राणियों, बौनों, दानवों या रहस्यमयी शक्तियों के चमत्कार तक सीमित नहीं रहता। यह अस्तित्व, कर्म, नियति और मानव जीवन के जटिल प्रश्नों से भी सीधे तौर पर टकराता है। जीवन और उत्तरदायित्व के मर्म को अत्यंत सूक्ष्मता से समझाती हुई निम्नलिखित पंक्तियाँ इस कृति के वैचारिक और दार्शनिक उत्कर्ष का अकाट्य प्रमाण हैं:
"ज़िम्मेदारी कभी किसी के सीखने से पूरी नहीं होती, किसी के स्वीकारने से अंजाम तक पहुंचती है।"
यह सूक्ति, जो अपने आप में एक संपूर्ण और परिपक्व कविता का भार वहन करती है, कर्मयोग के विशुद्ध भारतीय दर्शन को उद्घाटित करती है। इस काव्य-पंक्ति का गूढ़ अर्थ यह है कि ज्ञान, कौशल या विद्या प्राप्त कर लेना मात्र ही मनुष्य के कर्तव्यों की इतिश्री नहीं है। जब तक उस अर्जित ज्ञान के साथ आत्मिक स्वीकृति, दायित्व-बोध और दृढ़ संकल्प नहीं जुड़ता, तब तक कोई भी कार्य या दायित्व अपनी पूर्णता अथवा 'अंजाम' तक नहीं पहुँचता। इसका सीधा संदर्भ उन तीन नौजवानों और मुख्य पात्रों की रहस्यमयी यात्रा से जुड़ता है, जो किसी अनजान और अलिखित ऋण को चुकाने के लिए एक रहस्यमयी कीमिया से गुजरते हैं और 'गीलापन विहीन जल' की खोज में निकलते हैं। यहाँ लेखक ने भाषा की मितव्ययता के साथ दार्शनिक गहराई का अद्भुत और विरल तालमेल बिठाया है। शिल्प की दृष्टि से यह सूत्रवाक्य इतना सुगठित, धारदार और प्रभावोत्पादक है कि यह सीधे पाठक की मानवीय संवेदना को झकझोरता है और उसे अपने स्वयं के जीवन-संघर्षों और उत्तरदायित्वों का कठोर मूल्यांकन करने के लिए विवश कर देता है।
'एल्गा-गोरस' में मानवीय जिजीविषा और प्रकृति के साथ मनुष्य के सनातन द्वंद्व को जिस कलात्मक और दार्शनिक रूप में चित्रित किया गया है, वह इसे केवल एक रहस्य-कथा न रखकर एक मनोवैज्ञानिक महाकाव्य का दर्जा प्रदान करता है। मनुष्य के अस्तित्व, उसकी आंतरिक शक्ति और प्राकृतिक नियति का तटस्थ मूल्यांकन करती हुई यह पंक्ति विशेष रूप से दृष्टव्य है:
"कुदरत की दी हुई चुनौतियां बहुत पारंपरिक और साधारण होती हैं, जो लगभग सभी को थोड़े-बहुत फ़र्क के साथ एक जैसी ही मिलती हैं। तुम्हारे होने के मायने इस बात पर निर्भर हैं कि तुम खुद अपने लिए कितनी बड़ी चुनौतियां पैदा करके, उन पर फतह हासिल करते हो।"
इन पंक्तियों का विश्लेषण यदि हम एक दार्शनिक कविता या महाकाव्यात्मक उद्घोष के रूप में करें, तो हम पाते हैं कि इसमें ज्यां-पॉल सार्त्र के 'अस्तित्ववाद' (Existentialism) और विशुद्ध भारतीय दर्शन के 'पुरुषार्थ' का अपूर्व और नैसर्गिक समन्वय दृष्टिगोचर होता है। प्रथम दो पंक्तियों में प्रकृति की समरूपता और उसकी चुनौतियों की सार्वभौमिकता का अत्यंत यथार्थवादी वर्णन है। लेखक का स्पष्ट मंतव्य है कि जन्म, मृत्यु, रोग, शोक और प्राकृतिक आपदाएँ तो विश्व के सभी प्राणियों के लिए समान रूप से उपस्थित हैं, किंतु मनुष्य का वास्तविक मूल्यांकन और उसकी श्रेष्ठता इस बात से निर्धारित होती है कि वह अपने जीवन के लक्ष्य कितने उच्च, दुर्गम और असाधारण निर्धारित करता है। 'तुम्हारे होने के मायने' का सीधा अर्थ मनुष्य की 'अस्मिता' (Identity), उसके 'स्वत्व' और उसकी सार्थकता से है। इन पंक्तियों में ओज गुण और वीर रस का एक सूक्ष्म किंतु अत्यंत प्रखर प्रवाह है, जो कथा के उन नायकों को निरंतर प्रेरित करता है जो अज्ञात और अकल्पनीय मार्गों, रहस्यों और जादुई यात्राओं पर निकले हैं। यह मानवीय सरोकार की वह चरम और उदात्त अवस्था है जहाँ मनुष्य परिस्थितियों का विवश दास नहीं रहता, अपितु उन जटिल परिस्थितियों का सामना वह कितने ठंडे और ताकतवर दिमाग़ के साथ करता है, यही शह और मात का खेल मानव जीवन का 'सर्वाइवल' है। कठोपनिषद में यमदेव से आँखें मिलाकर प्रश्न करने वाले नचिकेता के अदम्य साहस की भांति ही यह पंक्ति मृत्यु-भय से मुक्त होने और जूझारूपन के चरम इंस्टिंक्ट की काव्यात्मक उद्घोषणा है।
कथाक्रम के विस्तार में, लेखक ने पाठकों के मनोविज्ञान और उनकी पठन-प्रक्रिया को भी बड़ी चतुराई से अपनी दार्शनिक कथा का अभिन्न हिस्सा बनाया है। ज्ञान के सापेक्ष सत्य (Relative Truth) और बोध की सीमाओं पर सटीक टिप्पणी करती हुई यह पंक्ति समीक्षक के रूप में मेरा विशेष ध्यानाकर्षण करती है:
"किसी किताब में चाहे जो लिखा हो, पढ़ने वाला वही पढ़ता है जो वह पढ़ना चाहता है।"
साहित्य सिद्धांत (Literary Theory) में जिसे 'रीडर-रिस्पॉन्स थ्योरी' (पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत) कहकर परिभाषित किया जाता है, कुमार पंकज ने उसे अत्यंत सहजता, सरलता और मारक क्षमता के साथ इस एक छोटे से वाक्य में पिरो दिया है। इसका गूढ़ अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी मानसिक अवस्था, अपने पूर्वाग्रहों, अपनी बौद्धिक क्षमता और अपने सीमित जीवनानुभवों के आलोक में ही सत्य की व्याख्या करता है। यह पंक्ति भाषा के उस मायावी छलावे और सत्य के शाश्वत मौन की ओर भी स्पष्ट संकेत करती है, जहाँ यह दार्शनिक मान्यता स्थापित की गई है कि समझाया हुआ सत्य अंततः अर्थ का घाव ही होता है, क्योंकि भाषा सत्य की जीभ का छाला है। मेहर बाबा के आजीवन मौन के दृष्टांत को पुष्ट करती हुई यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति इस महागाथा में एक ऐसा गहरा बौद्धिक और मनोवैज्ञानिक आयाम जोड़ती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि 'एल्गा-गोरस' केवल एक स्थूल तिलिस्म या जादुई दुनिया का कच्चा चिट्ठा नहीं है, बल्कि यह मानव मस्तिष्क की असीम जटिलताओं, उसकी बोध-क्षमता और सत्य के बहुआयामी स्वरूप का एक अत्यंत प्रामाणिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी है।
स्मृति, चेतना, आत्मा और ज्ञान की शाश्वतता पर गहरा प्रहार करती हुई एक अन्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण काव्यात्मक पंक्ति कृति के गहन दार्शनिक सरोकारों को पूर्णतः अनावृत कर देती है:
"जो तुमने अपनी आत्मा पर अंकित नहीं किया वो तुम्हारी स्मृति में भी दर्ज नहीं किया जाएगा..."
यहाँ लेखक ने 'स्मृति' को केवल मस्तिष्क की एक यांत्रिक और जैविक प्रक्रिया न मानकर उसे सीधे 'आत्मा' के शाश्वत अनुभव से जोड़ दिया है। इस पंक्ति का गहरा संदर्भ उस आध्यात्मिक चेतना और बोध से है, जहाँ ज्ञान को केवल रट लेना या बौद्धिक स्तर पर समझ लेना सर्वथा अपर्याप्त है। जब तक कोई विचार, ज्ञान या अनुभव हमारी चेतना अर्थात हमारी आत्मा का अभिन्न अंग नहीं बन जाता, तब तक वह समय की अथाह धुंध में विलीन हो जाने के लिए अभिशप्त है। शिल्प और अलंकार-योजना की दृष्टि से यहाँ 'आत्मा पर अंकित करना' एक अत्यंत सशक्त, अमूर्त और नवीन बिंब है। यह पंक्ति पाठक की चेतना को विचारों के उस एकांत चबूतरे पर ले जाती है, जहाँ खड़ा होकर वह यह अनुभव करता है कि वह अब वही व्यक्ति नहीं रह गया है जो इस पंक्ति को पढ़ने से पूर्व था।
अब, इस महत्त्वाकांक्षी कृति का निष्पक्ष, तटस्थ और निर्मम मूल्यांकन भी परम आवश्यक है। एक सच्चा समालोचक केवल प्रशंसा के व्यर्थ पुल बांधने में विश्वास नहीं रखता। यद्यपि 'एल्गा-गोरस' की कल्पनाशीलता, उसका मिथकीय ढांचा और भाषा-शैली अत्यंत समृद्ध तथा चमत्कृत करने वाली है, तथापि इसमें कुछ संरचनात्मक, शिल्पगत और विवरणात्मक सीमाएँ स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती हैं, जिनकी समीक्षा आवश्यक है।
प्रथमतः, लेखक द्वारा अत्यंत परिश्रम से निर्मित नया शब्द-संसार (Word Building) इस कृति की सबसे बड़ी शक्ति होने के साथ-साथ कई स्थानों पर इसकी सबसे बड़ी दुर्बलता भी सिद्ध होता है। स्ट्रासोल, सेण्टीड्राफ़, मैडीसोर जैसी अनगिनत रहस्यमयी प्रजातियों, प्राचीन लिपियों और अनेक दुर्लभ एवं मौलिक शब्दों का अत्यधिक और सघन प्रयोग कथा के स्वाभाविक प्रवाह को कई स्थानों पर बाधित करता है। यद्यपि लेखक ने इन जटिल शब्दों की विस्तृत शब्दावली उपलब्ध कराई है, परंतु पढ़ते समय पाठक को बार-बार उस शब्दावली का सहारा लेना पड़ता है, जिससे पठन-प्रक्रिया की निरंतरता और कथा का सम्मोहन बार-बार टूटता है। एक कुशल गद्यकार और कथा-शिल्पी को सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि भाषा मूलतः संप्रेषण का माध्यम है; उसे अपने अलंकरण और मौलिकता के व्यामोह में इतना क्लिष्ट या अपरिचित नहीं हो जाना चाहिए कि वह कथा को आगे बढ़ाने के स्थान पर स्वयं ही एक जटिल पहेली बनकर मार्ग में खड़ी हो जाए।
द्वितीयतः, कथानक के विस्तार में कई स्थानों पर अति-वर्णनात्मकता (Over-description) का भारी दोष आ गया है। घने अंधकारमय जंगल, शापित नीला रेगिस्तान, रहस्यमयी गुफाएँ, प्राचीन काठघर और तिलिस्मी वातावरण का चित्रात्मक वर्णन यद्यपि आरंभ में सिनेमाई प्रतीत होता है, परंतु कुछ अध्यायों में यह वर्णन इतना प्रदीर्घ और बोझिल हो गया है कि मूल रहस्य और कथा का मुख्य तंतु कहीं पीछे छूटता हुआ प्रतीत होता है। रहस्य और रोमांच (Mystery and Adventure) की कथाओं का सबसे महत्त्वपूर्ण और प्राणवान तत्व उनकी गति (Pacing) होता है। 'एल्गा-गोरस' के कुछ विशेष वर्णनात्मक अध्यायों में यह गति अत्यधिक शिथिल पड़ जाती है, जो त्वरित आनंद खोजने वाले पाठकों के लिए चुनौतीपूर्ण और किंचित उबाऊ लग सकती है।
तृतीयतः, प्रथम भाग के अंत में लेखक ने कथा और उसके मुख्य रहस्य को जिस अनिर्णायक और अधूरे मोड़ (Cliffhanger) पर लाकर छोड़ा है, वह यद्यपि व्यावसायिक और प्रकाशकीय दृष्टि से द्वितीय भाग की उत्सुकता जगाने के लिए सर्वथा उचित और सफल युक्ति प्रतीत हो सकती है, परंतु एक विशुद्ध साहित्यिक प्रतिमान की दृष्टि से यह पाठक के मन में एक प्रकार की अपूर्णता और हताशा का बोध कराता है। एक श्रेष्ठ महागाथा के प्रत्येक खंड की अपनी एक स्वतंत्र, तार्किक और संतोषजनक परिणति भी होनी चाहिए, जिसका यहाँ सर्वथा अभाव खटकता है।
निष्कर्षतः, यह कहा जा सकता है कि कुमार पंकज द्वारा रचित 'एल्गा-गोरस' (भाग एक एवं दो) समकालीन हिंदी साहित्य के इतिहास में एक अत्यंत साहसिक, विलक्षण और महत्वाकांक्षी हस्तक्षेप है। अपनी कुछ संरचनात्मक जटिलताओं, भाषायी क्लिष्टताओं और अति-विस्तार के बावजूद, यह कृति हिंदी साहित्य में 'हाई फैंटेसी' और 'डार्क मिथोलॉजी' के उस विशाल रिक्त स्थान को भरती है जो दशकों से सूना पड़ा था। लेखक का विराट विश्व-निर्माण (World Building), अकल्पनीय सृजन-क्षमता, दार्शनिक गहनता और मानवीय जिजीविषा का सर्वांगीण चित्रण इसे बाज़ार में उपलब्ध सामान्य रहस्य-रोमांच की लुगदी पुस्तकों से बहुत ऊँचा उठा देता है। इसमें यम से संवाद करते नचिकेता सा निर्भीक साहस है, और अपने वजूद की रक्षा का वह अदम्य, सनातन संघर्ष है जो इसे एक कालजयी स्वरूप प्रदान करता है। हिंदी साहित्य जगत और उसके सुधी पाठकों को ऐसी मौलिक, शोधपरक और विस्मयकारी रचनाओं का अत्यंत उदार और खुले हृदय से स्वागत करना चाहिए। यह कृति न केवल अपने वर्तमान समय के पाठकों को सम्मोहित करेगी, अपितु आगामी कई पीढ़ियों के लिए भी रहस्य, मिथक और कल्पना के एक अमूल्य, ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में सुरक्षित रहेगी।
आचार्य प्रताप
आचार्य प्रताप जी द्वारा लिखित समालोचना पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे पुस्तक को सुनार के तराजू पर तौला जा रहा हो - रत्ती , माशा का भी पूरा हिसाब । प्रताप जी की मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक और भाषायी पकड़ उन्हें पुस्तक को हरे दृष्टिकोण को बिना पक्षपात के गूढ़ता से समझने और उसकी समीक्षा लिखने में सहायक होती है। यदि मैं कहूँ कि इस समीक्षा के बात लेखकीय क्षमता पर एक मोहर लग जाती है जो पाठक को पुस्तक पढ़ने की ओर प्रेरित करती है। साधुवाद ।
RépondreSupprimerआदरणीय 🙏
RépondreSupprimerआपके स्नेहपूर्ण शब्दों और सूक्ष्म अवलोकन के लिए हृदय से आभार। पुस्तक के प्रत्येक पक्ष को यथासंभव निष्पक्षता और गहनता से समझना तथा उसके गुण-दोषों को पाठकों के समक्ष रखना, एक समीक्षक का कर्तव्य है।
आप जैसे सहृदय पाठक जब समीक्षा में अपना विश्वास और प्रोत्साहन व्यक्त करते हैं, तो लेखनी को और अधिक सजग एवं उत्तरदायी होने की प्रेरणा मिलती है।
सादर साधुवाद एवं प्रणाम। 🙏