‘हिंदी हैं हम’: एक राष्ट्रीय महाकुंभ और अकादमिक उत्कर्ष का उत्सव – एक समालोचनात्मक दृष्टि
१४ सितंबर २०२६ को पी.एच.डी. चैंबर ऑफ़ कॉमर्स, नई दिल्ली में मधुबन एजूकेशनल बुक्स द्वारा आयोजित 'हिंदी हैं हम' समारोह केवल एक सामान्य आयोजन नहीं, बल्कि हिंदी भाषा के प्रति एक राष्ट्रीय महाकुंभ सिद्ध हुआ। संपूर्ण भारतवर्ष से आए २०० से अधिक शिक्षकों की उपस्थिति ने इसे एक अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। पूर्व में बंगाल और बिहार से लेकर, उत्तर में जम्मू-कश्मीर, पश्चिम में राजस्थान और गुजरात, तथा दक्षिण में आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल और कर्नाटक सहित देश के २९ राज्यों से शिक्षकों ने इस समारोह में बढ़-चढ़कर प्रतिभाग किया।
इस भव्य आयोजन का प्रमुख उद्देश्य अकादमिक पुस्तकों का विमोचन रहा। समारोह के दौरान संस्कृत और हिन्दी भाषा की लगभग १० से अधिक उत्कृष्ट अकादमिक पुस्तकों का विमोचन किया गया, जो शिक्षा जगत के लिए मधुबन प्रकाशन का एक स्तुत्य योगदान है।
वैचारिक सत्रों की बात करें तो, कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण भाग 'AI युग में हिंदी : चुनौतियाँ और संभावनाएँ' विषय पर आधारित था, जिसकी विषय स्थापना शिक्षाविद् और भाषाविद् डॉ. प्रदीप कुमार जैन ने की। आदरणीय जैन जी निस्संदेह एक अत्यंत ओजस्वी वक्ता और प्रज्ञावादी पुरुष हैं, किंतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तकनीकी पहलुओं के संदर्भ में वे कुछ अल्पज्ञ या अनभिज्ञ प्रतीत हुए। उन्होंने अपने वक्तव्य में 'राम रस' का AI द्वारा 'जूस ऑफ राम' (Juice of Ram) अनुवाद किए जाने का जो दृष्टांत दिया, उस पर एक समालोचक के रूप में मेरी स्पष्ट मान्यता है कि यह त्रुटि AI की नहीं, अपितु प्रयोक्ता द्वारा दिए गए अपर्याप्त निर्देश (Prompt) की रही होगी। AI उसी दक्षता के साथ कार्य करता है, जिस स्पष्टता के साथ उसे निर्देशित किया जाता है।
समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार एवं समाचार-वाचिका चित्रा त्रिपाठी जी की उपस्थिति ने आयोजन को एक विशेष गरिमा प्रदान की। अपने व्यस्ततम कार्यक्रम से समय निकालकर उन्होंने इस आयोजन में अपनी सहभागिता दर्ज की और सभी को प्रेरित किया। इसके अतिरिक्त, कथाशाला की संस्थापक एवं मास्टर स्टोरीटेलर सिम्मी श्रीवास्तव जी द्वारा प्रस्तुत 'रेलगाड़ी' का प्रसंग पूरे कार्यक्रम में आकर्षण का प्रमुख केंद्र बिंदु रहा, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। साहित्यकार और मीडियाकर्मी जयंती रंगनाथन महोदया ने भी अपनी उत्तम भूमिका का निर्वहन किया, जिससे कार्यक्रम को एक साहित्यिक गहराई और वैचारिकता मिली।
मधुबन टीम की प्रबंधन क्षमता, सुव्यवस्था और आतिथ्य सत्कार वास्तव में हृदयस्पर्शी रहा। शाम ५ बजे के जलपान से लेकर रात ८:३० बजे के रात्रि-भोज तक, उत्कृष्ट भोजन और चाय-नाश्ते की व्यवस्था ने सभी अतिथियों को पूर्णतः संतुष्ट किया। कार्यक्रम के समापन पर फोटोग्राफी का आयोजन भी 'राज्य की वरीयता क्रम' में किया गया, जो कि एक अत्यंत ही सुविचारित, अनुशासित और बेहतरीन व्यवस्था थी। इससे विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों को एक सुव्यवस्थित और सम्मानजनक स्थान मिला।
आयोजन की इस विशालता, अकादमिक विमोचनों और उत्कृष्ट व्यवस्थाओं को देखते हुए, एक समालोचक के नाते मेरा वही पूर्व मत पुनः दृढ़ होता है कि इतने सघन और समृद्ध कार्यक्रम को मात्र एक ही दिन की समयावधि में समेटने का प्रयास किया गया। शिक्षक-सम्मान के लिए केवल दो सत्र (दोपहर ३:३० से ५:०० और शाम ५:३० से ६:३०) निर्धारित किए गए थे। यदि इस पूरे कार्यक्रम को दो सत्रों की बजाय चार सत्रों में विभाजित कर दो दिवसीय आयोजन का रूप दिया जाता, तो यह कहीं अधिक उत्तम होता। इससे विमोचित होने वाली पुस्तकों पर चर्चा, AI जैसे गहन विषयों पर विमर्श और देशभर से आए विद्वान शिक्षकों के आपसी संवाद के लिए एक अधिक सहज और विस्तृत मंच प्राप्त होता।
हिंदी भाषा के संवर्धन, शिक्षकों के सम्मान और अकादमिक पुस्तकों के नवसृजन के लिए मधुबन परिवार का यह प्रयास अत्यंत सराहनीय एवं अनुकरणीय है। यह आयोजन निश्चित रूप से हिंदी के प्रचार-प्रसार और अकादमिक जगत में एक मील का पत्थर है, जिसकी स्मृतियाँ सभी प्रतिभागियों के मानस पटल पर सदैव अंकित रहेंगी।
— आचार्य प्रताप (साहित्यिक समालोचक)