दान का गारंटी कार्ड

दान का गारंटी कार्ड

हमारे समय ने बड़ी प्रगति की है। पहले मनुष्य दान करता था और भूल जाता था। अब मनुष्य दान करने से पहले पूछता है—“इसका लाभ क्या मिलेगा?”

यह प्रश्न सुनकर धर्म भी कुछ क्षण के लिए मौन हो जाता है।

पहले दान में श्रद्धा होती थी, अब गणना होती है। पहले हाथ जेब में जाता था, अब उँगली पहले दूरभाष के परदे पर चलती है—“देखें, संस्था पंजीकृत है या नहीं? कर में छूट मिलेगी या नहीं? नाम कहाँ लिखा जाएगा? प्रमाणपत्र मिलेगा? चित्र प्रकाशित होगा?”

दानदाता कहता है—“भाई, पुण्य तो चाहिए, पर प्रमाण सहित।”
पुण्य भी अब बिना प्रमाण के मान्य नहीं है। जैसे विद्यालय में बालक कहे कि उसने गृहकार्य किया था, पर अभ्यास-पुस्तिका घर पर भूल आया है। शिक्षक कहेगा—“बेटा, भावना अपनी जगह है, प्रमाण अपनी जगह।”

धर्म और कर-विधान की इस अद्भुत संगति ने दान को भी एक प्रकार की योजनाबद्ध व्यवस्था बना दिया है। कहीं अन्नदान, कहीं वस्त्रदान, कहीं गौसेवा, कहीं वृक्षारोपण। प्रत्येक के साथ चित्र। चित्र ऐसा कि दान से अधिक दानदाता दिखाई दे।

गरीब के हाथ में अन्न पहुँचने से पहले चित्रकार का कैमरा पहुँच जाता है।

अब दान का भी लेखा-जोखा है। कितने रुपये दिए, किस दिन दिए, किसके हाथ से दिए और बदले में कितने आशीर्वाद प्राप्त हुए—सबका हिसाब। ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग के द्वार पर भी कोई लेखाधिकारी बैठा होगा और कहेगा—“आपके खाते में पुण्य के इतने अंक हैं, पर इस वर्ष आपकी नीयत का सत्यापन नहीं हुआ।”

एक सज्जन ने कहा—“मैंने बहुत दान किया है।”

मैंने पूछा—“किसलिए?”

बोले—“पुण्य के लिए।”

मैंने पूछा—“और यदि कोई देख न रहा हो?”

वे कुछ देर चुप रहे। फिर बोले—“तो दान करने की आवश्यकता ही क्या है?”

बस, यहीं से प्रश्न उठता है—दान किसके लिए था? उस व्यक्ति के लिए जिसे सहायता चाहिए थी, या उस व्यक्ति के लिए जिसे अपनी उदारता दिखानी थी?

गाँव में एक बूढ़ी अम्मा थीं। घर में दो रोटियाँ थीं और पड़ोस की विधवा के घर चूल्हा नहीं जला था। अम्मा ने एक रोटी वहाँ पहुँचा दी। न कोई चित्र, न प्रमाणपत्र, न प्रशस्ति। लौटकर चूल्हे के पास बैठ गईं।

किसी ने पूछा—“अम्मा, अपना भोजन क्यों घटा दिया?”

अम्मा बोलीं—“अरे बेटा, भूख तो दोनों की थी।”

बात इतनी-सी थी, पर आज के समय में इतनी सरल बात समझना कठिन हो गया है।

हमने दान को वस्तु बना दिया, पुण्य को अंक बना दिया और करुणा को प्रदर्शन।

दान की सबसे बड़ी पहचान शायद यही है कि देने के बाद भीतर यह विचार न उठे—“लोगों को पता चला या नहीं?”

क्योंकि जिस दिन दान के साथ अपना नाम लिखवाने की इच्छा दान से बड़ी हो जाए, उस दिन हाथ तो दानी रहता है, पर मन व्यापारी हो जाता है।

और तब प्रश्न धन का नहीं रहता।

प्रश्न केवल इतना रह जाता है—आस्था है, सहायता है या निवेश?

-आचार्य प्रताप
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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