टूटे बटन की गुरु और टूटते समाज की अंतिम गाँठ
कहावत है—"घर के खंभे गिने नहीं जाते, उन्हीं पर पूरा छप्पर टिका रहता है।" हमारे सतना अंचल के बुजुर्ग भी कहा करते हैं कि —"जउने घर मा नारी के हँसी गूँजत ही, वहै घर मा बरकत ड्यारा डारत ही।" पर आज का समाज बड़ा विचित्र हो गया है। वह बरकत तो चाहता है, पर बरकत की जड़ को पानी देने में उसकी मुट्ठी काँप जाती है।
हम बड़े गर्व से कहते हैं कि विज्ञान बहुत आगे बढ़ गया है। सच ही तो है—लोहे के पक्षी आकाश नाप रहे हैं, यंत्र मनुष्य की बोली समझने लगे हैं, और एक बटन दबाते ही संसार हथेली पर उतर आता है। किंतु अभी तक ऐसा कोई यंत्र नहीं बन सका जो किसी थके हुए मनुष्य के कंधे पर हाथ रखकर कह सके—"घबराओ मत, सब ठीक हो जाएगा।" यह कला आज भी एक स्त्री के पास है। वही शर्ट का टूटा बटन भी टाँक देती है और जीवन का टूटा हुआ साहस भी।
बड़े आश्चर्य की बात है कि समाज ने स्त्री के इस कौशल को कभी विद्या माना ही नहीं। जो काम प्रतिदिन होता है, उसे लोग साधारण समझ लेते हैं। सूरज रोज उगता है, इसलिए उसके उगने पर ताली नहीं बजती। नदी निरंतर बहती है, इसलिए उसका गुणगान नहीं होता। उसी प्रकार स्त्री प्रतिदिन घर सँभालती है, इसलिए लोग मान बैठे हैं कि यह तो उसका सहज काम है। अरे भइया, सहज वही होता है जिसके पीछे असाधारण धैर्य छिपा हो।
गाँव में एक बुज़ुर्ग कहा करते थे—"मड़ई बनाउब कठिन नाहिं आय, वोही चउमासे के बाद टिकाउब कठिन हय।" घर भी ऐसा ही होता है। ईंट और सीमेंट से मकान बन जाता है, पर घर तब बनता है जब कोई बिना शोर किए सबके सुख-दुःख की गाँठ बाँधता रहे। कोई रूठ जाए तो उसे मनाए, कोई हार जाए तो उसका मन बढ़ाए, कोई टूट जाए तो उसे फिर खड़ा कर दे। यह काम आदेश से नहीं होता, अपनत्व से होता है।
समाज की गिनती भी बड़ी निराली है। यदि पुत्र सफल हो जाए तो लोग कहते हैं—"देखो, पिता ने कितना अच्छा संस्कार दिया।" यदि घर समृद्ध हो जाए तो कहते हैं—"पुरुष बड़ा कर्मठ निकला।" पर उसी घर की रसोई की आँच, बच्चों की सीख, वृद्धों की सेवा, संबंधों की डोर और विपत्ति के दिनों की ढाढ़स किसने सँभाली—इसका लेखा किसी बही-खाते में नहीं मिलता। लगता है जैसे घर अपने आप चल पड़ता हो। मानो बैलगाड़ी बिना बैलों के खेत पार कर ले।
हमारे समय की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि जिसने सबसे अधिक जोड़ा, उसी को सबसे कम जोड़ा गया। जिसके हाथों ने बिखरते जीवन को सी दिया, उसके अपने मन के टाँके कितनी बार उधड़ गए, यह पूछने का अवकाश किसी के पास नहीं। लोग उसके हाथ का बना भोजन पहचान लेते हैं, पर उसके मन की थकान नहीं पहचानते। यह वैसा ही है जैसे कुएँ से रोज पानी भर लें, पर कभी यह न देखें कि कुएँ का जल घट भी रहा है या नहीं।
यही प्रगति है जिसमें मनुष्य ने चंद्रमा तक पहुँचने का उपाय खोज लिया, पर अपने ही घर में मौन बैठी स्त्री की आँखों की भाषा पढ़ना नहीं सीखा? बड़े-बड़े व्याख्यानों में समानता की बात होती है, पर घर लौटते ही वही पुरानी तराजू निकाल ली जाती है। एक पलड़े में अधिकार रख दिए जाते हैं और दूसरे पलड़े में केवल कर्तव्य। आश्चर्य यह कि तराजू को सीधा भी घोषित कर दिया जाता है।
हमारे बघेलखण्ड में कहा जाता है—"धान केर बाली जेतना भरत ही, ओतना झुकत जात ही।" स्त्री भी वैसी ही होती है। जितना अधिक उत्तरदायित्व निभाती है, उतनी ही अधिक विनम्र होती जाती है। किंतु समाज उसकी विनम्रता को उसकी विवशता समझ बैठता है। यही भूल सबसे भारी पड़ती है। सहनशीलता को दुर्बलता मान लेना वैसा ही है जैसे पीपल की छाया देखकर यह समझ लेना कि उसकी जड़ें भी हल्की होंगी।
सच पूछा जाए तो स्त्री केवल परिवार नहीं सँभालती, वह पीढ़ियाँ गढ़ती है। वह बच्चे को बोलना ही नहीं सिखाती, बोलने की मर्यादा भी सिखाती है। वह अन्न परोसती ही नहीं, परिश्रम का मूल्य भी परोसती है। वह दीपक जलाती ही नहीं, मन में आशा की बाती भी रखती है। जब पूरा परिवार विपत्ति में डगमगा जाता है, तब वही सबसे पहले अपने आँसू भीतर रखकर दूसरों की आँखें पोंछती है। यह तप है, साधना है; इसका कोई वेतन नहीं, कोई पुरस्कार नहीं।
यह भी सत्य है कि स्त्री कोई देवप्रतिमा नहीं। वह भी मनुष्य है। उसे भी विश्राम चाहिए, सम्मान चाहिए, अपने मन की बात कहने का अधिकार चाहिए। हर समय उसे त्याग की मूर्ति बनाकर खड़ा कर देना भी अन्याय है। बैल से दिन-रात हल चलवाकर यदि किसान यह कहे कि "यह तो इसका धर्म है", तो खेत भी एक दिन उत्तर देना बंद कर देगा। मनुष्य का मन भी ऐसा ही होता है।
अब समय आ गया है कि समाज केवल स्त्री का गुणगान करना छोड़ दे और उसके श्रम को पहचानना सीखे। सम्मान का अर्थ केवल उत्सव के दिन पुष्प अर्पित करना नहीं होता। सम्मान तब होता है जब घर के निर्णय में उसकी वाणी का भी उतना ही मान हो, जब उसके श्रम को अदृश्य मानकर टाल न दिया जाए, जब उसके सपनों को भी परिवार के सपनों जितना ही मूल्य मिले। जउन घर मँय सबके लिए जगह होय, उहै घर सच्चा घर कहावत है।
अंत में बस इतना ही। यदि कभी किसी घर में एक स्त्री शर्ट का टूटा बटन टाँकती दिखाई दे, तो केवल सुई और धागा मत देखिए। वह उसी क्षण शायद किसी टूटते हुए मन को भी जोड़ रही होती है। उसके हाथ वस्त्र पर चलते हैं, पर उसकी ममता जीवन की सिलाई कर रही होती है। यही कारण है कि घर की सबसे बड़ी शिल्पकार वही है, सबसे मौन गुरु वही है और समाज की अंतिम आशा भी वही।
जिस दिन हम उसके श्रम को "कर्तव्य" कहकर टालना छोड़ देंगे और उसे जीवन-निर्माण की सबसे बड़ी साधना मानकर सम्मान देंगे, उसी दिन हमारा समाज सचमुच आगे बढ़ेगा। नहीं तो हम चाहे जितनी ऊँची अट्टालिकाएँ खड़ी कर लें, भीतर से उधड़ते ही रहेंगे। क्योंकि टूटे बटन तो बाज़ार का दर्जी भी जोड़ देगा, पर टूटे मन और बिखरते संबंधों की सिलाई आज भी उसी स्त्री के हाथ में है, जो बिना शोर किए, बिना यश माँगे, जीवन को प्रतिदिन फिर से बुनती रहती है।
आचार्य प्रताप
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