चुल्लू भर पानी की तलाश में सरकार

चुल्लू भर पानी की तलाश में सरकार

लोकतंत्र बड़ा उदार प्राणी है। वह जनता को अपनी बात कहने की पूरी स्वतंत्रता देता है—बस शर्त इतनी-सी होती है कि सत्ता उसे सुनने के लिए बाध्य नहीं होती। जनता सड़क पर बैठ सकती है, धरना दे सकती है, ज्ञापन दे सकती है, दंडवत यात्रा निकाल सकती है, सिर मुंडवा सकती है, रक्त से पत्र लिख सकती है, यहाँ तक कि अर्धनग्न होकर अपनी विवशता का प्रदर्शन भी कर सकती है; पर व्यवस्था की चमड़ी पर यदि संवेदना की जगह सत्ता का कवच चढ़ जाए, तो ये सब दृश्य सरकारी फाइलों के लिए केवल "कार्यवाही हेतु प्रस्तुत" बनकर रह जाते हैं।

मध्य प्रदेश में प्रतीक्षारत शिक्षकों की कहानी भी कुछ ऐसी ही प्रतीत होती है। वे वर्षों से नौकरी की प्रतीक्षा में हैं। वर्ष 2023 की भर्ती में अनेक पद रिक्त हैं, एक बार काउंसलिंग भी हुई, अभ्यर्थियों ने अपने जीवन के सपनों को दस्तावेज़ों में समेटकर जमा कर दिया। उन्हें लगा कि अब नियुक्ति पत्र भी आ जाएगा। पर हुआ यह कि काउंसलिंग मानो किसी सरकारी संग्रहालय की वस्तु बन गई—देखने के लिए है, आगे बढ़ाने के लिए नहीं।

बघेली में कहें तो, "का हो सरकार, कागजवा तो चलाइस, अब कलमवा में स्याही सूख गइन का?"

व्यवस्था का अपना दर्शन होता है। वह मानती है कि यदि किसी समस्या को पर्याप्त समय तक अनदेखा कर दिया जाए, तो या तो समस्या थक जाएगी या फिर समस्या उठाने वाले। इसलिए प्रतीक्षा भी सरकारी नीति का हिस्सा बन जाती है। पहले आश्वासन, फिर समिति, फिर विचार, फिर परीक्षण और अंत में... मौन। यह मौन इतना अनुशासित होता है कि वर्षों तक एक शब्द भी बाहर नहीं निकलता।

विडंबना देखिए कि जो शिक्षक बनने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वही सबसे बड़ा पाठ सीख रहे हैं—धैर्य का। शायद भविष्य में वे विद्यार्थियों को पढ़ाएँगे कि "बच्चो, भारत में लोकतंत्र का सबसे कठिन अध्याय प्रतियोगी परीक्षा नहीं, बल्कि चयन के बाद की प्रतीक्षा है।"

मुख्यमंत्री महोदय स्वयं कभी शिक्षा मंत्री रहे। उस समय अतिथि शिक्षकों और शिक्षा व्यवस्था को लेकर अनेक आश्वासन दिए गए थे। राजनीति में आश्वासन देना उतना ही सहज है, जितना सावन में बादलों का गरजना। अंतर केवल इतना है कि कुछ बादल बरस जाते हैं, कुछ केवल गर्जना करके निकल जाते हैं। जनता हर बार छाता लेकर खड़ी रहती है और अंत में धूल ही उसके हिस्से आती है।

सरकार के प्रवक्ता कहेंगे—"प्रक्रिया चल रही है।" यह 'चल रही है' बड़ा अद्भुत वाक्य है। इसे सुनकर लगता है कि प्रक्रिया पैदल निकल पड़ी है और रास्ते में कहीं पीपल के नीचे सुस्ता रही है। वर्षों बाद भी वही उत्तर—"चल रही है।"

कभी-कभी लगता है कि सरकारें आंदोलनों को भी मनोरंजन की श्रेणी में रखने लगी हैं। आज दंडवत यात्रा, कल मुंडन, परसों रक्त से लिखा पत्र, उसके अगले दिन अर्धनग्न प्रदर्शन। फाइलें सब देखती हैं, कैमरे सब रिकॉर्ड करते हैं, समाचार सब छापते हैं; केवल निर्णय लेने वाली मेज़ शायद छुट्टी पर चली जाती है।

हमारे गाँव में बुज़ुर्ग कहा करते थे—"जउन घर के मुखिया कान बंद कर ले, उहैं आँगन में रोवत बच्चा भी आखिर चुप होइ जात है।" लेकिन लोकतंत्र का दुर्भाग्य यही है कि यहाँ नागरिकों का चुप हो जाना, शासन की सफलता मान लिया जाता है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि नियुक्तियाँ नहीं हुईं। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उम्मीद को लंबित कर दिया गया। युवा अपनी उम्र, अपने परिवार, अपने सपनों और अपनी आर्थिक विवशताओं के साथ प्रतीक्षा की कतार में खड़ा है। उसके लिए हर स्थगित आदेश केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, जीवन का टलता हुआ अध्याय है।

और फिर जनता कभी-कभी क्रोध में कह उठती है—"सरकार को तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।" पर सोचिए, सरकार डूबे भी तो कैसे? पहले तो उसे एक समिति बनानी पड़ेगी कि चुल्लू कितना बड़ा हो, पानी किस विभाग से आए, उसका टेंडर कौन जारी करे, वित्त विभाग से स्वीकृति मिले, फिर उच्चस्तरीय समीक्षा हो, तब कहीं जाकर चुल्लू उपलब्ध होगा। तब तक अगली भर्ती की घोषणा हो चुकी होगी और पुरानी प्रतीक्षा पर नई प्रतीक्षा की धूल जम जाएगी।

व्यंग्य का उद्देश्य किसी का अपमान नहीं, बल्कि आईना दिखाना है। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, उसका पहला धर्म संवेदनशील होना है। यदि योग्य अभ्यर्थी वर्षों तक केवल आश्वासनों के सहारे जीवन बिताएँ, यदि रिक्त पद होने पर भी नियुक्तियाँ फाइलों में कैद रहें, यदि आंदोलन केवल समाचार बनकर रह जाएँ, तो प्रश्न केवल शिक्षकों का नहीं रहता—प्रश्न शासन की प्राथमिकताओं का हो जाता है।

लोकतंत्र में जनता बार-बार दंडवत करने के लिए नहीं होती; वह सिर उठाकर जीने का अधिकार लेकर जन्म लेती है। जिस दिन व्यवस्था इस सरल सत्य को समझ लेगी, उसी दिन शायद किसी शिक्षक को अपना दर्द रक्त से नहीं लिखना पड़ेगा, किसी युवा को अपना सिर मुंडवाकर रोजगार नहीं माँगना पड़ेगा और किसी नागरिक के मुख से यह कटु वाक्य भी नहीं निकलेगा कि "सरकार को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।"

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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