अपने भीतर गाँव ज़िंदा रखना

अपने भीतर गाँव ज़िंदा रखना

"अपने भीतर गाँव ज़िंदा रखना,
नीम, पीपल और बरगद की छाँव ज़िंदा रखना।"

आजकल लोग गाँव छोड़ने में उतनी जल्दी नहीं करते, जितनी जल्दी गाँव को अपने भीतर से बेदखल कर देते हैं। शहर पहुँचते-पहुँचते सबसे पहले उनकी बोली बदलती है, फिर चाल बदलती है, फिर हाल बदलता है, और अंत में ख़याल भी। बचता है तो बस आधार कार्ड पर लिखा हुआ गाँव।

गाँव केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं होता; वह मन का भूगोल होता है। वहाँ नीम की कड़वाहट भी दवा होती है, पीपल की छाँव भी पाठशाला होती है और बरगद की जड़ें बताती हैं कि जितना ऊपर उठो, उतना ही धरती से जुड़े रहो।

आज शहरों में वातानुकूलित कमरों की ठंडक तो है, पर बरगद जैसी आत्मीय छाँव नहीं। फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप में पाँच हजार मित्र हैं, पर चौपाल पर बैठकर हाल पूछने वाला एक भी नहीं। रिश्ते अब "ऑनलाइन" हैं, इसलिए मन अक्सर "ऑफ़लाइन" रहता है।

विडंबना यह है कि हम बच्चों को अंग्रेज़ी के महीनों के नाम तो रटा देते हैं, पर यह नहीं बता पाते कि आम पर बौर कब आता है, कोयल किस मौसम में गाती है, या पहली बारिश के बाद मिट्टी क्यों महकती है। उन्हें स्क्रीन का उजाला मिल गया, पर जुगनुओं की रोशनी नहीं मिली।

गाँव को बचाना केवल खेत बचाना नहीं है; वह विश्वास, अपनापन, साझा सुख-दुःख और मनुष्यता को बचाना है। गाँव की सबसे बड़ी पूँजी उसकी ज़मीन नहीं, उसका ज़मीर होता है। जब तक वह भीतर जीवित है, तब तक आदमी भी पूरी तरह जीवित है।

इसलिए यदि समय की दौड़ में बहुत आगे निकल भी जाओ, तो इतना ध्यान रखना कि भीतर कहीं एक पगडंडी बची रहे; जहाँ दादी की कहानी सुनाई दे, कुएँ का पानी मीठा लगे, और कोई बुज़ुर्ग मुस्कुराकर पूछे—"का हय बेटा, सब कुशल-मंगल त हय न?"

क्योंकि जिस दिन मन से गाँव चला जाएगा, उस दिन शहर में रहते हुए भी आदमी केवल मकानों का निवासी रह जाएगा, घरों का नहीं।

अपने भीतर गाँव ज़िंदा रखिए—क्योंकि नीम, पीपल और बरगद की छाँव केवल पेड़ों की नहीं, मनुष्य की पहचान की छाँव है।

आचार्य प्रताप

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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