शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

छंदों के प्रति नेह

कई मुक्त सृजनकर्ताओं को पढ़ने के बाद एक कुंडलियाँ
-----------------------------------------------------------------------
नहीं बरसाता है कहीं , छंदों पर अब नेह।
कविता की ये देह को , कुचल रहें हैं मेह।
कुचल रहें हैं मेह , आज छंदों का जीवन।
छंद  देव  के हेतु  , समर्पित मेरा तन मन।
कविताओं  में  छंद , बहाते सदा सरसता।
छंद बिना अब नेह , कहूँ  मैं नहीं बरसता।

आचार्य प्रताप

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी टिप्पणी से आपकी पसंद के अनुसार सामग्री प्रस्तुत करने में हमें सहयता मिलेगी। टिप्पणी में रचना के कथ्य, भाषा ,टंकण पर भी विचार व्यक्त कर सकते हैं