पंजीकरण का द्वार और लोकतंत्र का ताला
लोकतंत्र बड़ा विचित्र प्राणी है। चुनाव के दिनों में यह घर-घर जाकर मतदाता के चरण स्पर्श करता है, पर चुनाव बीतते ही वही लोकतंत्र अपने ही नागरिकों से मिलने के लिए ऐसा समय माँगता है, मानो किसी राजा के दरबार में प्रवेश का आग्रह किया जा रहा हो। बेरोज़गार युवक यदि अपनी बात कह दे तो उसे धैर्य का उपदेश मिलता है, और यदि चुप रहे तो उसकी चुप्पी को संतोष का प्रमाणपत्र मान लिया जाता है।
अभी-अभी उच्च शिक्षा विभाग का एक आदेश आया। उसमें कार्यरत अथवा पूर्व से पंजीकृत अतिथि विद्वानों को अपने प्रोफ़ाइल अद्यतन करने का अवसर दिया गया है। आदेश पढ़ते ही एक बेरोज़गार युवक मुस्कराया। वह प्रसन्नता की मुस्कान नहीं थी; वह उस किसान की मुस्कान थी जो सूखे खेत में बादल देखकर भी जानता है कि बरसात उसके गाँव तक नहीं आएगी।
उसने धीरे से कहा—"सरकार! यदि नया पंजीकरण भी खोल देती, तो हम जैसे लोग भी अपनी योग्यता का परिचय दे पाते।"
सरकार शायद सुन रही थी, किंतु उत्तर नहीं आया। लगता है उसने सुनने की कला को भी विभागों में बाँट दिया है। एक विभाग सुनता है, दूसरा देखता है और तीसरा निर्णय करता है। जब तक बात तीनों विभागों की यात्रा पूरी करती है, तब तक बेरोज़गार की आयु सीमा ही पूरी हो जाती है। कहते हैं, "ऊँट के मुँह में जीरा" जितना अवसर देकर व्यवस्था अपने दायित्व की इतिश्री मान लेती है।
हमारे यहाँ बेरोज़गारी अब समस्या नहीं रही; यह तो प्रशासनिक परंपरा बन गई है। रिक्त पद वर्षों तक रिक्त रहेंगे, परीक्षाएँ वर्षों तक प्रतीक्षा करेंगी और योग्य युवक अपने प्रमाणपत्रों को ऐसे सँभालकर रखेंगे जैसे गाँव का किसान बरसों पुराने बीज को इस आशा में बचाकर रखता है कि शायद अगला मौसम मेहरबान हो जाए।
विचित्र बात यह है कि सरकार को अनुभवी लोगों की चिंता बहुत रहती है। जो पहले से व्यवस्था में हैं, उनके लिए पोर्टल खुल जाता है, सत्यापन की तिथियाँ घोषित हो जाती हैं और निर्देशों की वर्षा होने लगती है। पर जो अब तक बाहर खड़े हैं, उनके लिए द्वार बंद रहता है। मानो यह व्यवस्था कह रही हो—"पहले भीतर आने वालों का सम्मान होगा, बाहर खड़े लोग अगली सूचना तक धूप सेंकें।"
एक गाँव का प्रसंग याद आता है। ठाकुर साहब ने अपने आम के बगीचे की रखवाली के लिए ऊँची दीवार बनवा दी। गाँव के बच्चों ने पूछा—"साहब! हम भी कभी आम खा पाएँगे?" ठाकुर बोले—"दीवार के भीतर जो हैं, वे पहले अपने टोकरे भर लें। यदि कुछ बच गया तो बाहर वालों पर भी कृपा हो जाएगी।"
आज सरकारी पंजीकरण की दशा भी कुछ ऐसी ही प्रतीत होती है। भीतर वालों के लिए अद्यतन, बाहर वालों के लिए प्रतीक्षा। यह कैसी समानता है जिसमें अवसर जन्मतिथि नहीं, पंजीकरण तिथि देखकर मिलता है?
सरकार कहती है—"युवा राष्ट्र की शक्ति हैं।" यह वाक्य हर मंच पर तालियाँ बटोर लेता है। किंतु वही युवा जब अवसर माँगता है तो फ़ाइलों का ऐसा जंगल सामने खड़ा कर दिया जाता है कि वह सोचने लगता है—शक्ति होना और उपयोग में आना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। बैल में भी बहुत शक्ति होती है, पर यदि उसे हल से ही न जोड़ा जाए तो खेत कैसे जोते जाएँ?
बघेली अंचल में एक कहावत है—"बिन बोए खेतवा कहाँ लहराई?" यदि नए युवाओं को पंजीकरण का अवसर ही नहीं मिलेगा, तो कल योग्य शिक्षक कहाँ से आएँगे? केवल पुराने नामों की सूची सँवारते रहने से शिक्षा का भविष्य नहीं सँवरता। नदी का जल तभी निर्मल रहता है जब उसमें नया प्रवाह निरंतर आता रहे। ठहरा हुआ जल अंततः दुर्गंध ही फैलाता है।
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब बेरोज़गार को उसकी योग्यता नहीं, उसकी प्रतीक्षा परखा जाने लगता है। जैसे धैर्य ही अब सबसे बड़ी शैक्षणिक उपाधि हो। जिसने दस वर्ष प्रतीक्षा कर ली, वही सबसे योग्य अभ्यर्थी घोषित होने का अधिकारी है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी सुंदरता यही है कि उसके द्वार सबके लिए खुले रहें। यदि पंजीकरण का द्वार केवल पुराने अभ्यर्थियों के लिए खुले और नए युवाओं के लिए बंद रहे, तो यह अवसर नहीं, परंपरा का संरक्षण भर रह जाएगा। व्यवस्था को यह समझना होगा कि योग्यता किसी सूची की मोहताज नहीं होती; उसे केवल एक निष्पक्ष अवसर चाहिए।
अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ यही कहेंगी—इस देश में रोजगार से अधिक कठिन काम रोजगार के लिए पंजीकरण कर पाना था। और तब इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितने पोर्टल खुले थे; वह केवल इतना पूछेगा कि क्या अवसर सचमुच सबके लिए समान था?
आचार्य प्रताप
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