कृपाशास्त्र और लोकतंत्र

तुलसी तुलसी सब कहैं,तुलसी वन की घास।
हुई कृपा जो राम की, बन गए तुलसीदास।।

कई लोग कृपा से "तुलसीदास" बन जाते हैं, भले ही उनके भीतर न तुलसी की सुगंध हो, न दास की विनम्रता।

कृपाशास्त्र और लोकतंत्र

आज राजनीति में योग्यता का पौधा कम और कृपा का खाद-पानी अधिक दिखाई देता है। कोई कल तक पार्टी कार्यालय के बाहर पोस्टर चिपका रहा था, आज निगम-मंडल का अध्यक्ष है। कोई चुनाव में जनता को पहचानता नहीं था, पर सत्ता की कृपा-दृष्टि पड़ते ही जनता उसे "जननायक" कहने लगी। लगता है जैसे लोकतंत्र का नया संस्करण आ गया हो—"जनता द्वारा, जनता के लिए" नहीं, बल्कि "कृपा द्वारा, कृपापात्र के लिए"।
तुलसीदास बनने के लिए तुलसी को राम की कृपा मिली थी। आज के राजनीतिक तुलसीदासों को किसी "राम" की नहीं, किसी "हाईकमान" की कृपा मिल जाती है। अंतर बस इतना है कि वहाँ कृपा से रामचरितमानस लिखी गई थी, यहाँ कृपा से चरित्र का मानस ही बदल जाता है।

सत्ता के गलियारों में एक विचित्र वनस्पति उगती है। चुनाव से पहले वह सामान्य घास होती है। जैसे ही परिणाम आते हैं, उस पर कृपा की वर्षा होती है और वह रातों-रात "विशिष्ट प्रजाति" घोषित हो जाती है। फिर वही घास जनता को बताती है कि देश कैसे चलाना चाहिए, नैतिकता क्या होती है और त्याग किसे कहते हैं।

एक नेता जी से किसी ने पूछा—"आपकी सबसे बड़ी योग्यता क्या है?"

वे मुस्कराए—"योग्यता? अरे भैया, वह तो विपक्ष पूछता है। हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि कृपायोग्यता है।"

सच भी है। आजकल राजनीति में डिग्री से अधिक उपयोगी "निकटता प्रमाणपत्र" हो गया है। जिसने सही समय पर सही व्यक्ति की जय-जयकार कर दी, उसके लिए सत्ता का स्वर्ग खुल जाता है। और जिसने प्रश्न पूछ लिया, वह लोकतंत्र का नहीं, अनुशासनहीनता का प्रतीक घोषित कर दिया जाता है।

बघेली में कहें तो, "जेकरे ऊपर सरकारी छाँह पड़ि गय, उहे नीम के डार मा आम खोजे लाग।" अर्थात कृपा मिलते ही आदमी अपने को प्रकृति के नियमों से भी ऊपर समझने लगता है।

विडंबना यह है कि जनता हर चुनाव में नई तुलसी खोजती है, लेकिन चुनाव बाद पता चलता है कि पौधा तो वही पुरानी घास निकला। सुगंध की जगह बयानबाज़ी, सेवा की जगह सेल्फी और त्याग की जगह तामझाम उग आया है।

तुलसीदास इसलिए महान नहीं हुए कि उन पर कृपा हुई थी; वे इसलिए महान हुए कि कृपा को साधना में बदल दिया। आज राजनीति में कृपा मिलते ही साधना समाप्त और साधन शुरू हो जाते हैं। कुर्सी मिलते ही जनसेवा का संकल्प सरकारी गाड़ी की पिछली सीट में कहीं खो जाता है।

अंततः दोहा आज भी सच है। फर्क केवल इतना है कि तब कृपा ने घास को महाकवि बनाया था, अब कृपा कई बार घास को बरगद घोषित कर देती है। किंतु जनता की आँधी जब चलती है, तब उसे पता चल ही जाता है कि कौन सचमुच तुलसीदास है और कौन केवल वन की घास।

क्योंकि सत्ता की कृपा पद दिला सकती है, पर इतिहास में स्थान नहीं। यही बात राजनीति बार-बार भूलती है और जनता बार-बार याद दिलाती है।

आचार्य प्रताप 

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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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