गीत: रणघोष
खत्म हुआ अज्ञातवास अब, टूटा संयम का आधार।
छन्दों की प्रत्यंचा कस ली, गूँजेगी रण में टंकार॥
देने आया हूँ प्रतिकार॥
वर्षों तक वन-वन भटका हूँ, सहा हृदय ने कष्ट अपार।
समझा जग ने निर्बल मुझको, किया निरंतर अत्याचार॥
आज शंख ने नाद किया है, जाग उठा सोया संसार।
कायरता का वेश त्याग कर, रण में उतरा हूँ इस बार॥
खंडित होगा अत्याचार॥
गांडीव बनी है आज लेखनी, शब्द बने हैं तीखे बाण।
कागज की यह रणभूमि है, दाँव लगा है मेरा प्राण॥
रस-छंदों का कवच पहनकर, करने आया हूँ संहार।
सत्य भेदने चला लक्ष्य को, थर्राता मिथ्या दरबार॥
सह न सकोगे मेरा वार॥
नहीं मात्र यह काव्य-कल्पना, यह पीड़ा की है हुँकार।
न्याय माँगते अक्षर मेरे, पन्ने-पन्ने पर अंगार॥
समय लिखेगा गाथा मेरी, बदल रहा जग का व्यवहार।
विजय तिलक माथे पर होगा, गूँज उठेगी जय-जयकार॥
सृजन करेगा नया विचार॥
आचार्य प्रताप
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