"ऐ चाँद तुझे देखूँ" - संवेदना और संस्कार का सहज सृजन
समीक्षक: आचार्य प्रताप
कृति: ऐ चाँद तुझे देखूँ (काव्य-संग्रह)
रचनाकार: अनसूया बडोनी 'अंशी कमल'
पृष्ठ संख्या : 124 पृष्ठ
मूल्य : रु. 200/ - मात्र
प्रकाशक: जिज्ञासा प्रकाशन
साहित्य की सुदीर्घ परंपरा में कविता वह विधा है जो सीधे हृदय से संवाद करती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था कि 'कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक सामान्य भावभूमि पर ले जाती है।' जब कोई रचनाकार अपने प्रथम काव्य-संग्रह के साथ साहित्याकाश में पदार्पण करता है, तो वह एक नई आशा और संभावना का प्रतीक होता है। कवयित्री अनसूया बडोनी 'अंशी कमल' की कृति 'ऐ चाँद तुझे देखूँ' मात्र कविताओं का संग्रह नहीं, अपितु यह एक संवेदनशील मन के विविध भावों—राष्ट्रप्रेम, गुरु-भक्ति और मानवीय वेदना—का सहज प्रकटीकरण है । यह संग्रह भावों की पवित्रता और भारतीय संस्कारों का एक निश्छल उद्घोष है। एक साहित्यकार के नाते, किसी नवोदित पुष्प की इस नैसर्गिक सुगंध को पाठकों तक पहुँचाना मेरे लिए एक सुखद दायित्व है। मैं इस कृति को 'हृदय से निकली और सीधे हृदय तक जाने वाली' रचनाओं का एक ऐसा सुवासित गुलदस्ता मानता हूँ, जो अपनी महक से पाठकों को सराबोर करने की क्षमता रखता है। इस पुस्तक की समीक्षा इसी दायित्व निर्वहन का एक विनम्र प्रयास है, जहाँ हम इस कृति के मर्म को टटोलने का यत्न करेंगे। साहित्य का उद्देश्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि समाज की धड़कन और व्यक्तिगत अनुभूतियों का दस्तावेजीकरण होता है। जब कोई रचनाकार अपनी पहली कृति लेकर आता है, तो उसमें शिल्प की चतुरता से अधिक 'भावों की पवित्रता' देखी जाती है।
इस संग्रह का कैनवास विस्तृत है। कवयित्री ने अपनी लेखनी को किसी एक रस में बाँधने के बजाय जीवन के विविध रंगों को समेटा है। मेरी दृष्टि में इस संग्रह के कथ्य के चार प्रमुख स्तंभ हैं:
प्रखर राष्ट्रप्रेम:
संग्रह की रीढ़ 'राष्ट्रभक्ति' है। कवयित्री के लिए राष्ट्र केवल भूगोल नहीं, बल्कि 'भगवान' है। कविता "ऐ देश मेरे" में वे लिखती हैं:
"मान तू ही सम्मान तू ही, और मेरा अभिमान तू ही।
दिल में बस तू ही रहता है, मेरा तो भगवान तू ही।"यह समर्पण का भाव "नमन शत बार" और "माँ भारती" जैसी रचनाओं में भी परिलक्षित होता है, जहाँ वे शहीदों और देश की मिट्टी को सर्वोपरि मानती हैं।
गुरु-भक्ति
और संस्कार: आधुनिक कविता में
जहाँ 'गुरु' का विमर्श क्षीण हो रहा है, वहीं 'अंशी' जी ने अपनी गुरु माँ (स्व. माया अग्रवाल) को यह कृति समर्पित कर भारतीय
गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह किया है।
"गुरु माँ तव चरणों में, नित शीश झुकाऊँ मैं।
उपकार तुम्हारा माँ, किस भाँति चुकाऊँ मैं।।"
यह पंक्तियाँ सिद्ध करती हैं कि उनकी लेखनी की स्याही में
कृतज्ञता का जल मिला हुआ है।
सामाजिक चेतना और सुधार: कवयित्री समाज की विसंगतियों पर मौन नहीं रहतीं। "मम हृदय की वेदना" और "इंसानियत" जैसी रचनाओं में वे बलात्कार, गरीबी और गिरते नैतिक मूल्यों पर प्रहार करती हैं। विशेष रूप से "सुन ऐ सुता माँ भारती की" में वे पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण के विरुद्ध भारतीय नारी को अपनी गरिमा ("नग्नता जिसमें झलकती, छोड़ ऐसे तू वसन") याद दिलाती हैं। यह एक साहसिक और विचारणीय दृष्टिकोण है।
प्रकृति
और प्रेम: शीर्षक कविता "ऐ
चाँद तुझे देखूँ" एक रोमानियत और विरह का पुट लिए हुए है, जहाँ चाँद एक बिम्ब बनकर आता है। वहीं "ऋतुराज आने पर धरा" में
प्रकृति का मानवीकरण अत्यंत सुंदर बन पड़ा है।
एक गीतकार के रूप में, मैं इस संग्रह में 'गेयता' को इसका सबसे सशक्त पक्ष मानता हूँ।
कवयित्री
ने क्लिष्ठ हिंदी के बजाय 'सहज हिंदी' (आम बोलचाल की खड़ी बोली) का प्रयोग किया है। यह भाषा पाठक से सीधे संवाद करती
है। "हिन्दी" कविता में वे स्वयं लिखती हैं- "हिन्दी अपनी जान है, हिन्दी है पहचान", जो उनकी भाषाई प्रतिबद्धता को दर्शाता है। अधिकांश रचनाएँ तुकांत हैं और गीत/ग़ज़ल की शैली में लिखी गई हैं। 'मात्रिक छंदों' का कठोर पालन न होते हुए भी, इनमें एक नैसर्गिक लय है जो इन्हें मंच पर गाने योग्य बनाती है।
उदाहरण के लिए, "कलम और तलवार" में द्वंद्व का सुंदर चित्रण है:
यदि साथ दोनों का मिले, फिर ज़िन्दगी में ग़म नहीं।।"
यहाँ तुकबंदी और प्रवाह प्रशंसनीय है। यदि मैं तुलना करूँ, तो 'अंशी' जी की राष्ट्रभक्ति की कविताओं में सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी 'सीधी और स्पष्ट' ललकार की झलक मिलती है। वहीं, उनकी सामाजिक रचनाएँ मुझे मैथिलीशरण गुप्त जी के सुधारवादी स्वरों की याद दिलाती हैं, जहाँ समाज को नैतिकता का पाठ पढ़ाना कवि का धर्म माना जाता था। "सोशल मीडिया" जैसी कविताएँ उन्हें समकालीन 'हास्य-व्यंग्य' या 'नई कविता' के कवियों की कतार में भी खड़ा करती हैं जो आधुनिक समस्याओं पर बेबाक लिखते हैं। चूँकि यह प्रथम संग्रह है, इसलिए कहीं-कहीं भावों के अतिरेक में शिल्प थोड़ा शिथिल हुआ है। ग़ज़ल नुमा रचनाओं में 'बहर' का कठोर अनुशासन कहीं-कहीं छूटता प्रतीत होता है। भविष्य में छंद-शास्त्र के गहन अध्ययन से उनकी लेखनी और अधिक प्रखर हो सकती है। भावों की पुनरावृत्ति: कुछ उपमान और भावनाएँ (जैसे देशप्रेम में समर्पण) कई कविताओं में दोहराई गई हैं। कथ्य में और अधिक विविधता लाई जा सकती थी। किंतु, ये तकनीकी सीमाएँ इस संग्रह की 'आत्मा' को खंडित नहीं करतीं।
"ऐ चाँद तुझे देखूँ" एक संभावनाशील कवयित्री का ईमानदार प्रयास है। यह
पुस्तक सिद्ध करती है कि 'अंशी कमल' के पास एक संवेदनशील हृदय और जागरूक मस्तिष्क दोनों हैं। वे कलम को तलवार के
बराबर महत्व देती हैं और यही उनकी ताकत है। यह संग्रह उन पाठकों के लिए एक उपहार है जो
साहित्य में जटिल बौद्धिकता के बजाय 'सरल संवेदना' और 'भारतीय मूल्यों' की तलाश करते हैं।
मैं
कवयित्री के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ और साहित्य जगत में उनके इस प्रथम
कदम का स्वागत करता हूँ।
- आचार्य प्रताप