गीत: छद्म-जगत की न्याय-प्रणाली

गीत: छद्म-जगत की न्याय-प्रणाली

लाख हलाला करके भी वो, शुद्ध-विमल जग में कहलाता।

न्यून दक्षिणा लेकर देखो, विप्र कलंकित ही हो जाता।।

​छद्म जगत की न्याय-प्रणाली।।

लाख हलाला करके भी वो....


शोभा-यात्रा देख राम की, शासन-तंत्र कँपा-सा जाता।

घंटा, शंख, मृदंग-नाद से, निज अधिकार हनन हो जाता।।

कर्कश-यंत्रों का कोलाहल, केवल 'पाक-अज़ान' कहाता।।

​तुष्टिकरण की रीत निराली!

लाख हलाला करके भी वो....॥०१॥


'शिरस्त्राण' धर गर्वित विचरण, गौरव-बोध बढ़ाता जाता।

भाल-तिलक को देख किंतु क्यों, न्यायालय विचलित हो जाता?

'सूत्र-शिखा' से वैर ठना नित, कैसा दोष मढ़ा यह जाता?

निज पहचान मिटा देने को, 'भाईचारा ही' माना जाता।।

​कैसी यह चिंतन-कंगाली?

लाख हलाला करके भी वो....॥०२॥


'सहन-शक्ति' तो 'एक-पक्ष' की, उसका अंत हुआ ही जाता।

'आत्म-बोध' का दीप न बाले, तो फिर 'तम' बढ़ता ही जाता।।

उठो पार्थ! गांडीव सँभालो, 'महा-शंख' अब गूँजा जाता।

'क्लीव-वृत्ति' तज 'रण-कौशल', रक्षक 'सच्चा' माना जाता।।

​मिटे तभी यह रीत कुचाली।

लाख हलाला करके भी वो....॥०३॥

​- आचार्य प्रताप


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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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