गीत: महाविश्राम : आचार्य प्रताप

गीत: महाविश्राम

नश्वर काया का यह अंतिम, तीरथ है शमशान।
राख बनेगी माटी सबकी, तज झूठा अभिमान।।

राजा हो या रंक यहाँ पर , सोते एक समान।
जलती चिता सुनाती सबको, जीवन का अवसान।
मोह पाश के बंधन सारे , यहाँ टूटते आप।
अग्नि शिखा में धुल जाते हैं, जीवन भर के पाप।
शिव का डेरा यहीं बसा है, गूंजे अनहद तान।।

चार दिनों का यह मेला है , झूठी है जागीर।
अंत समय में काम न आती, महलों की प्राचीर।
सूखी लकड़ी कफ़न सफ़ेदी, बस इतना है साथ।
खाली मुट्ठी आया बंदे , जाता खाली हाथ।
पंचतत्व में हुई समाहित , नश्वर देह महान॥

क्यों डरता है मौत देख कर, यह तो है विश्राम।
जीवन की हर थकन मिटाता, यह पावन सा धाम।
यहीं शांति है यहीं मुक्ति हैं , यहीं सत्य का वास।
मत रोना तुम देख चिता को, रखना मन विश्वास।
आत्मा अजर अमर है भाई , कहते वेद पुरान॥

आचार्य प्रताप



































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Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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