धुरंधर: राष्ट्र-आराधना का एक चलचित्रित महाकाव्य
चलचित्र: धुरंधर (२०२५)
मैं कहता हूँ कि यह फिल्म मनोरंजन नहीं, राष्ट्र का दर्पण है।
प्रिय भारतवासियों और सिनेमा प्रेमियों,
सिनेमा केवल तीन घंटे का मनोरंजन नहीं होता; यह समाज की चेतना को झकझोरने वाला, इतिहास को पुनः जीवित करने वाला और भविष्य की दिशा तय करने वाला एक सशक्त माध्यम है। जब मैंने आदित्य धर की नवीनतम कृति 'धुरंधर' को देखा, तो मुझे यह आभास हुआ कि हम भारतीय सिनेमा के उस स्वर्ण काल में प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ 'हीरो' वह नहीं है जो नायिका के पल्लू के पीछे छिपकर गीत गाता है, बल्कि 'हीरो' वह है जो राष्ट्र की रक्षा के लिए अंधेरों में विलीन हो जाता है।
एक शिक्षक और साहित्यकार के रूप में, मैं शब्दों का चयन बहुत सावधानी से करता हूँ। परन्तु, इस फिल्म के लिए यदि मैं कहूँ कि यह केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि 'सैनिकों के मौन बलिदान का एक दस्तावेज' है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज की इस समीक्षा में, मैं इस फिल्म की परतों को उधेड़ूँगा और आपको बताऊंगा कि क्यों यह फिल्म देखना प्रत्येक भारतीय का नैतिक दायित्व है।
खंड १
सबसे पहले फिल्म के शीर्षक पर गौर करें—'धुरंधर'। हिंदी शब्दकोश में इसका अर्थ होता है—वह व्यक्ति जो 'धुर' अर्थात् 'भार' को धारण करने में समर्थ हो। यह शब्द उस श्रेष्ठता का प्रतीक है जो सामान्य से परे है। फिल्म यह सिद्ध करती है कि राष्ट्र की सुरक्षा का भार किसी एक सरकार या एक मंत्री के कंधों पर नहीं, बल्कि उन अज्ञात 'धुरंधरों' के कंधों पर होता है, जिनके नाम कभी अखबारों की सुर्खियों में नहीं आते।
यह फिल्म 'चाणक्य नीति' के सूत्र
(गुप्तचरैः समन्वितं राज्यं न कदाचित् विनश्यति।
गुप्तचरप्रहीणं तु राज्यं शीघ्रं विनश्यति॥
अर्थ —
जिस राज्य में गुप्तचरों की सुदृढ़ व्यवस्था होती है, वह कभी नष्ट नहीं होता;
और जिस राज्य में गुप्तचर नहीं होते, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।) को चरितार्थ करती है—"जिस राष्ट्र की गुप्तचर व्यवस्था सुदृढ़ है, उसे कोई भी शत्रु परास्त नहीं कर सकता।" फिल्म का वैचारिक अधिष्ठान (Ideological Foundation) स्पष्ट है—राष्ट्र प्रथम (Nation First)। यहाँ कोई मध्यम मार्ग नहीं है। यहाँ शांति कबूतर उड़ाकर नहीं, बल्कि शत्रु के मन में भय उत्पन्न करके स्थापित की जाती है। यह फिल्म उस भ्रम को तोड़ती है कि अहिंसा परमो धर्मः ही एकमात्र सत्य है; यह याद दिलाती है कि "धर्म हिंसा तथैव च" (धर्म की रक्षा के लिए की गई हिंसा भी धर्म है) भी उतना ही बड़ा सत्य है।
खंड २
फिल्म की कथावस्तु हमें 2000 के दशक के उस कालखंड में ले जाती है जब भारत रक्त रंजित था। संसद पर हमला, कश्मीर में उग्रवाद का चरम, और कंधार जैसे अपमानजनक अध्याय—फिल्म इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में एक काल्पनिक किन्तु अत्यंत विश्वसनीय कहानी बुनती है।
कथानक की सबसे बड़ी शक्ति उसका 'कच्चापन' (Rawness) है। आदित्य धर ने बॉलीवुड की पुरानी बीमारी—'अति-नाटकीयता' (Melodrama)—का त्याग किया है। यहाँ जासूस रातों-रात दुनिया नहीं बचाते। वे योजनाएं बनाते हैं, वे असफल होते हैं, वे अपने साथियों को अपनी आँखों के सामने मरते हुए देखते हैं, और फिर भी अपने मिशन पर डटे रहते हैं। फिल्म की लंबाई (लगभग साढ़े तीन घंटे) को लेकर कुछ आलोचनाएं हो सकती हैं, परन्तु मेरा मानना है कि किसी महाकाव्य को संक्षिप्त नहीं किया जा सकता। यह फिल्म एक T-20 मैच नहीं, बल्कि एक टेस्ट मैच है, जहाँ धैर्य ही जीत की कुंजी है।
लेखक ने बहुत बारीकी से दिखाया है कि कैसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (ISI) और आतंकवादी संगठन केवल बंदूकों से नहीं लड़ते, बल्कि वे हमारे देश के भीतर ही 'जयचंदों' की फौज तैयार करते हैं। यह नरेटिव (Narrative) बहुत साहसिक है और इसके लिए रीढ़ की हड्डी चाहिए।
खंड ३
रणवीर सिंह, जिन्हें हम अक्सर उनकी ऊर्जा और चंचलता के लिए जानते हैं, यहाँ एक 'तपस्वी' के रूप में उभरते हैं। उनका चरित्र एक ऐसे गुप्तचर का है जिसने अपनी पहचान, अपनी भावनाएं और अपना अस्तित्व देश के हवन कुंड में स्वाहा कर दिया है। उनकी आँखों में एक अजीब सा खालीपन है—वही खालीपन जो उस सैनिक की आँखों में होता है जिसने बहुत अधिक मृत्यु देखी हो। उन्होंने संवादों से कम और अपनी देहभाषा (Body Language) से अधिक अभिनय किया है। एक दृश्य है जहाँ वह अपने परिवार से फोन पर बात कर रहे हैं, झूठ बोल रहे हैं कि वे सुरक्षित हैं, जबकि वे मौत के मुहाने पर खड़े हैं—यह दृश्य किसी भी पत्थर दिल को पिघलाने के लिए काफी है।
फिल्म का खलनायक कोई आम गुंडा नहीं है। अक्षय खन्ना ने जिस चरित्र को निभाया है, वह 'अधर्म' का प्रतीक है, किन्तु वह मूर्ख नहीं है। वह जानता है कि भारत को कैसे चोट पहुंचानी है। आचार्य प्रताप के रूप में, मैं इसे एक उत्कृष्ट चित्रण मानता हूँ क्योंकि जब तक हम शत्रु की बुद्धिमत्ता को नहीं समझेंगे, हम उसे हरा नहीं पाएंगे। अक्षय खन्ना की शांत और क्रूर मुस्कान यह दर्शाती है कि विचारधारा का युद्ध कितना खतरनाक हो सकता है।
सह-कलाकार: व्यवस्था के स्तंभ
संजय दत्त और आर. माधवन के चरित्र हमें 'ब्यूरोक्रेसी' (नौकरशाही) का वह चेहरा दिखाते हैं जो फाइलों के पीछे नहीं छिपता, बल्कि निर्णय लेता है। अर्जुन रामपाल का एक्शन यह याद दिलाता है कि जब कूटनीति विफल होती है, तो भुजाओं का बल ही काम आता है।
खंड ४:
फिल्म की सिनेमेटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर पर विशेष चर्चा आवश्यक है। फिल्म के दृश्य 'ग्लॉसी' या 'चमकदार' नहीं हैं; वे 'ग्रे' (धूसर) और अंधकारमय हैं, जो जासूसी की दुनिया की वास्तविकता को दर्शाते हैं। संगीत ऐसा है जो रोंगटे खड़े कर देता है। जब परदे पर तनाव बढ़ता है, तो संगीत का मौन हो जाना और केवल साँसों की आवाज़ सुनाई देना—यह निर्देशन की उच्च कोटि की कला है।
एक्शन दृश्यों में 'गुरुत्वाकर्षण के नियमों' (Laws of Physics) का उल्लंघन नहीं किया गया है। यहाँ गोलियां लगने पर हीरो उड़ता नहीं है, बल्कि गिरता है, तड़पता है, और फिर देश के लिए उठता है। रक्त का रंग गहरा लाल है, जो बताता है कि आजादी की कीमत सस्ती नहीं है।
खंड ५
अब मैं उस पहलू पर आता हूँ जो कि मेरे और आपके लिए महत्वपूर्ण है संदेश।
लंबे समय तक भारतीय सिनेमा ने 'अमन की आशा' के नाम पर हमारे शत्रुओं के पापों पर पर्दा डाला। 'धुरंधर' उस पर्दे को फाड़ देती है। यह फिल्म साफ शब्दों में कहती है कि आतंकवाद का कोई मानवाधिकार नहीं होता। जो हाथ निर्दोषों का रक्त बहाते हैं, उन्हें काटने में ही मानवता का कल्याण है। फिल्म का सबसे कड़वा सच यह है कि बाहर के दुश्मन से ज्यादा खतरनाक घर का भेदी होता है। फिल्म में स्लीपर सेल्स, बिकाऊ मीडिया के कुछ अंश और भ्रष्ट अधिकारियों का चित्रण यह चेतावनी देता है कि हमें अपनी आँखें खुली रखनी होंगी। यह एक ऐसा सत्य है जिसे पचाना कठिन है, लेकिन यह आवश्यक है। फिल्म के अंत में कोई परेड नहीं होती, कोई मेडल नहीं मिलता। यह 'गुमनाम नायकों' (Unsung Heroes) की कहानी है। यह हमें यह सोचने पर विवश करती है कि जब हम अपने घरों में सो रहे होते हैं, तो कोई कहीं बर्फीली चोटियों पर या दुश्मन की मांद में बैठकर जाग रहा होता है। यह फिल्म हमारे भीतर 'कृतज्ञता' (Gratitude) का भाव जगाती है।
खंड ६:
क्या फिल्म में कोई कमी है?
आचार्य होने के नाते मैं कमियों को अनदेखा नहीं कर सकता। फिल्म में हिंसा का स्तर बहुत ऊँचा है। यह कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। इसमें 'सौंदर्यीकरण' नहीं है, बल्कि 'वीभत्सता' है। हालाँकि, युद्ध सुंदर नहीं होता, इसलिए यह कमी भी यथार्थवाद का हिस्सा बन जाती है फिल्म का मध्य भाग (Interval के बाद) थोड़ा खिंचा हुआ प्रतीत हो सकता है। आज के 'रील्स' (Reels) देखने वाले युवाओं को ३.५ घंटे का धैर्य रखना कठिन लग सकता है। कुछ दृश्यों की एडिटिंग और कसी जा सकती थी। कहानी में इतने सारे मोड़ (Twists) और कूटनीतिक संदर्भ (Geopolitical references) हैं कि यदि आपको इतिहास और राजनीति की समझ नहीं है, तो आप भटक सकते हैं। यह फिल्म आपसे आपके दिमाग की उपस्थिति की मांग करती है।
खंड ७
अंत में, मेरा निर्णय (Verdict) स्पष्ट है। 'धुरंधर' केवल एक फिल्म नहीं है, यह एक 'अनुष्ठान' है। यह उन लोगों के मुँह पर तमाचा है जो भारत की संप्रभुता को चुनौती देते हैं, और उन लोगों के लिए एक मरहम है जिन्होंने देश के लिए अपने प्रियजनों को खोया है। यह फिल्म हमें सिखाती है कि राष्ट्रवाद कोई चुनावी मुद्दा नहीं है; यह हमारे रक्त में बहने वाली धारा है। यह फिल्म हमें यह विश्वास दिलाती है कि 'नया भारत' मार खाने के लिए नहीं, बल्कि मारने के लिए तैयार है।
मैं, आचार्य प्रताप, आप सभी से—विशेषकर युवाओं से—आग्रह करता हूँ कि इस फिल्म को थिएटर में जाकर देखें। इसे इसलिए न देखें कि इसमें बड़े सितारे हैं, बल्कि इसलिए देखें ताकि आप जान सकें कि 'तिरंगा हवा से नहीं लहराता, बल्कि यह उन वीर सपूतों की आखिरी सांसों से लहराता है जिन्होंने इसकी रक्षा में अपने प्राण त्याग दिए।'
यदि आप भारत को अपनी माँ मानते हैं, तो यह फिल्म आपकी आँखों में गर्व के आँसू और हृदय में संकल्प की अग्नि जला देगी।
जय हिन्द। जय भारत। वन्दे मातरम।
-आचार्य प्रताप
मौलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित