पुष्पक साहित्यिकी: एक युग का समापन और वैचारिक विरासत

पुष्पक साहित्यिकी: एक युग का समापन और वैचारिक विरासत


हिंदी साहित्य जगत के लिए 'पुष्पक साहित्यिकी' का यह 32वाँ अंक केवल एक त्रैमासिक प्रकाशन नहीं, अपितु डॉ. अहिल्या मिश्र जी की उस अटूट जिजीविषा का प्रमाण है, जिसने दक्षिण भारत में हिंदी की अलख जगाए रखी। पत्रिका के इस अंक को देखते हुए मन गहरी संवेदना और शोक से भर जाता है कि इसकी सूत्रधार अब हमारे बीच नहीं रहीं।

1. शोक संवेदना और कृतित्व का स्मरण:
यह अत्यंत पीड़ादायक है कि जिस पत्रिका को डॉ. अहिल्या मिश्र ने अपने रक्त और पसीने से सींचा, आज उसकी समीक्षा उनके 'अंतिम अंक' के रूप में करनी पड़ रही है। उनका जाना हिंदी पत्रकारिता के एक सशक्त स्तंभ का ढह जाना है। इस अंक में उनका 'चिन्तन के क्षण' स्तंभ अब उनकी अंतिम वैचारिक वसीयत जैसा प्रतीत होता है, जहाँ वे साहित्य को समाज का सजग प्रहरी मानती हैं।

2. संपादकीय दृष्टि और वैचारिक प्रखरता:
पत्रिका का कलेवर हमेशा की तरह गरिमापूर्ण है। डॉ. आशा मिश्र 'मुक्ता' का संपादकीय 'स्त्री' के बहुआयामी संघर्षों को जिस प्रखरता से उठाता है, वह पत्रिका की वैचारिक स्पष्टता को दर्शाता है। यह अंक यह स्पष्ट करता है कि संपादक मंडल ने गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं किया।

3. सृजनात्मक वैविध्य:
कहानी संकलन: प्रदीप गुप्ता की 'कड़वा सच' और नीरजा हेमेन्द्र की 'डॉक्टर की पत्नी' जैसी कहानियाँ मध्यमवर्गीय समाज के अंतर्विरोधों को बखूबी उकेरती हैं।
सांस्कृतिक चेतना: 'हैदराबाद रियासत' पर संतोष बंसल का आलेख और 'श्री रामानुजाचार्य' पर डॉ. संगीता का लेखन पत्रिका के शोधपरक दृष्टिकोण को प्रमाणित करता है।
धरोहर और वैश्विक जुड़ाव: रघुवीर सहाय और निदा फ़ाज़ली को याद करना अपनी साहित्यिक परंपरा के प्रति सम्मान प्रकट करता है, वहीं नाग़ीब महफूज़ का अनुवाद इसे विश्व-साहित्य के समकक्ष खड़ा करता है।

4. शिल्प और प्रस्तुति:
पत्रिका का मुद्रण, पृष्ठ संयोजन और स्तंभों का वर्गीकरण एक वरिष्ठ संपादक की सूक्ष्म दृष्टि का परिणाम है। 96 पृष्ठों का यह अंक कविता, ग़ज़ल, संस्मरण और समीक्षाओं के माध्यम से एक संपूर्ण साहित्यिक रस का संचार करता है।

'पुष्पक साहित्यिकी' का यह अंक डॉ. अहिल्या मिश्र की स्मृतियों को समर्पित एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। एक समीक्षक के रूप में मुझे गहरा खेद है कि भविष्य में हमें उनके तीक्ष्ण और दूरदर्शी संपादन का लाभ नहीं मिल पाएगा। उनकी अनुपस्थिति हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
यह पत्रिका उनके उन सपनों का प्रतीक है, जिन्हें वे आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ गई हैं। उन्हें कोटि-कोटि नमन और विनम्र श्रद्धांजलि।

आचार्य प्रताप
(समीक्षक एवं साहित्यकार)
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

Enregistrer un commentaire

आपकी टिप्पणी से आपकी पसंद के अनुसार सामग्री प्रस्तुत करने में हमें सहयता मिलेगी। टिप्पणी में रचना के कथ्य, भाषा ,टंकण पर भी विचार व्यक्त कर सकते हैं

Plus récente Plus ancienne