'एक राधा गीत गाती है' - एक विहंगम और गहन अनुशीलन :: प्रशांत मिश्र 'मन'

विरह की चिरंतन वेदी पर एक आधुनिक 'राधा' का आर्तनाद: 'एक राधा गीत गाती है' - एक विहंगम और गहन अनुशीलन

कृति: एक राधा गीत गाती है (गीत-संग्रह)
रचनाकार: प्रशांत मिश्र 'मन'
विधा: समालोचनात्मक समीक्षा
प्रकाशक: [ पेन टुडे प्रकाशन, इंदौर (म.प्र.)]
प्रकाशन वर्ष: 2022
मूल्य: [ रुपये 180/-]
ISBN: [9788195690817]
पृष्ठ संख्या: 104 (पांडुलिपि आधार पर)

परंपरा के वातायन से झांकती आधुनिक वेदना

    साहित्य के विस्तृत और अनंत गगन में जब भी कोई कृति 'राधा' के नाम का आश्रय लेकर उपस्थित होती है, तो एक साहित्य के साधक के रूप में मेरे मन में उत्सुकता और आशंकादोनों के भाव एक साथ उमड़ते हैं। उत्सुकता इस बात की कि क्या कवि उस चिरंतन, द्वापर-युगीन प्रेम-आख्यान में कोई नया अध्याय, कोई नया दृष्टिकोण जोड़ पाया है? और आशंका इस बात की कि कहीं यह प्रयास केवल परंपरा के पिष्टपेषण और भावुकता के अतिरेक तक ही सीमित न रह जाए। गीत वह सृजन है जो मनुष्य के भीतर स्फुरित होने वाली भावनाओं और संवेदनाओं को सुंदर, संगीतमय और लयबद्ध शब्दों में अभिव्यक्त करता है। यह मानव मन की गहन अनुभूतियों का साक्षात्कार है।

प्रशांत मिश्र 'मन' की सद्यः प्रकाशित कृति 'एक राधा गीत गाती है' की पांडुलिपि के पन्नों से गुजरते हुए, मैंने स्वयं को ब्रज की कुंज-गलियों और कलयुग के कंक्रीट के जंगलों के बीच एक अजीब-सी संधि-रेखा पर खड़ा पाया। ५१ गीतों का यह संग्रह केवल कोरे शब्दों का जमावड़ा नहीं, अपितु एक आहत हृदय का स्पंदन है। एक वरिष्ठ समालोचक की भूमिका में, मैं इस कृति का निष्पक्ष, सांगीतिक, सौंदर्यशास्त्रीय और साहित्यिक विवेचन प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो न केवल कृति के मर्म को उद्घाटित करेगा, अपितु हिंदी गीत परंपरा में इसके स्थान को भी निर्धारित करेगा।
मिथक का समकालीन रूपांतरण
प्रथम दृष्टया, यह संग्रह राधा-कृष्ण के पौराणिक प्रेम का पुनराख्यान प्रतीत होता है, किन्तु इसकी संवेदना नितांत आधुनिक, वैयक्तिक और युगीन है। यहाँ 'राधा' केवल द्वापर की वह नायिका नहीं है जो यमुना तट पर कृष्ण की प्रतीक्षा करती है, बल्कि वह हर उस समकालीन प्रेमिल हृदय का प्रतीक है, जिसे सामाजिक व्यवस्थाओंविवाह, मंडप, लोक-लाज और पारिवारिक दबावके चलते अपने विशुद्ध प्रेम की बलि देनी पड़ी है।
कवि प्रशांत मिश्र 'मन' ने बड़ी ही चतुराई और साहस के साथ 'शेरवानी', 'मंडप', 'लग्न', 'हल्दी' और 'रिसेप्शन' जैसे आधुनिक विवाह समारोहों के प्रतीकों का प्रयोग कर पौराणिक राधा को एक समकालीन प्रेमिका के कलेवर में ढाला है। यह 'राधा' वह है जो अपने प्रेमी को किसी और का होते हुए देखती है, जो मंडप की सजावट में अपनी चिता की लपटें देखती है।
उदाहरणार्थ, यह पंक्तियाँ देखिए जो कथ्य की आधुनिकता को प्रमाणित करती हैं:
"सज रहा मण्डप कहीं पर, लग्न का दिन भी निकट है।
पर उभय के हेतु यह क्षण, हाय री ! अतिशय विकट है !"
यहाँ 'उभय' (दोनों) का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह शब्द इंगित करता है कि पीड़ा केवल राधा (प्रेमिका) की नहीं है, अपितु कृष्ण (प्रेमी) की भी है, जो विवशताओं के पाश में बंधकर, एक 'नट' (अभिनेता) की भांति विवाह के फेरे ले रहे हैं। यह कथ्य उस 'कलयुगी अँधियारे' की ओर संकेत करता है जहाँ प्रेम, विवाह संस्था के कठोर यथार्थ और सामाजिक अनुबंधों से टकराकर दम तोड़ देता है। कवि ने बड़ी कुशलता से यह स्थापित किया है कि आज के युग में प्रेम करना आसान है, किन्तु उसे निभाना और परिणति तक ले जाना, कुरुक्षेत्र के युद्ध से कम नहीं।
विप्रलंभ का महासागर
भारतीय काव्यशास्त्र की दृष्टि से यदि इस कृति का मूल्यांकन करें, तो इस संग्रह का 'अंगी रस' निस्संदेह 'विप्रलंभ श्रृंगार' (वियोग) है। सम्पूर्ण कृति में 'करुण रस' की एक अंतर्धारा प्रवाहित है, जो संयोग के क्षणों को भी अपनी आर्द्रता से भिगो देती है। यहाँ संयोग का वर्णन नगण्य है, और जहाँ है भी, वह स्मृति के रूप में वियोग को गहरा करने के लिए ही आया है।कवि ने 'दुख' को केवल एक नकारात्मक भाव नहीं माना है, बल्कि उसे एक सौंदर्यबोध के स्तर पर प्रतिष्ठापित किया है।
"हमें न इतना दुलराओ तुम, हमको खुशियाँ छल जाती हैं।

दुख का अभिनंदन करते हम, दुख ही अपना परिचायक है।"
इन पंक्तियों में छायावादी कवियों, विशेषकर महादेवी वर्मा की 'मैं नीर भरी दुख की बदली' जैसी रहस्यवादी पीड़ा की गूंज सुनाई देती है। यहाँ वेदना का उत्सव है। रीतिकालीन कवियों की भांति यहाँ विरह का वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण न होकर, आंतरिक और मर्मभेदी है। यह 'टीस' बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मा का 'परिचायक' बन गई है। कवि ने प्रेम की उस अवस्था को पकड़ा है जहाँ प्रेमी को सुख की कामना नहीं रह जाती, बल्कि वह अपनी पीड़ा में ही एक प्रकार के तोष का अनुभव करता है।

एक गीतकार के रूप में, मैं इस कृति की गेयता और लयात्मकता को इसका सबसे सबल और प्रामाणिक पक्ष मानता हूँ। गीतों का ढांचा मुखड़ा और अंतरा के पारंपरिक अनुशासन में बढ़ा हुआ है, जो हिंदी के मंचों और एकांत संगीत साधनादोनों के लिए उपयुक्त है। छंदों में एक सहज प्रवाह है, मात्राओं का पतन बहुत कम स्थानों पर है, जो पाठक को बरबस गुनगुने पर विवश करता है।

ध्वनि-सौंदर्य: प्रशांत जी ने शब्दों का चयन नाद-सौंदर्य को ध्यान में रखकर किया है। 'अम्लता', 'मूकता', 'व्यंजना', 'उन्माद', 'परिवेदना' जैसे तत्सम शब्दों का प्रयोग गीतों को एक 'क्लासिक' गरिमा प्रदान करता है।
प्रवाह: पंक्तियों में मात्राओं का संतुलन सधा हुआ है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है:
"मेरे मधुमासी जीवन को, पीड़ा का मलमास नहीं दो!" यहाँ 'मधुमास' (वसंत/यौवन) और 'मलमास' (अधिक मास/अशुभ समय) का अनुप्रास और विरोधाभास अद्भुत है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि जीवन की दो विपरीत अवस्थाओं का ध्वन्यात्मक चित्रण है।
कवि ने अलंकारों का प्रयोग केवल चमत्कार प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि अनुभूति को गहरा और दृश्यमान करने के लिए किया है। उनकी बिंब-धर्मिता पाठक के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ती है।
मानवीकरण
"कर रहे संवाद दृग, सिन्दूरदानी से।" यहाँ निर्जीव वस्तुओं (सिन्दूरदानी) से संवाद, विरह की उन्मत्त अवस्था को दर्शाता है। 'रात का मौन पड़ा कंगन' एक अत्यंत मौलिक और दृश्य बिंब है, जो सूनेपन को एक आकार देता है।
रूपक
"सुरनदी-सा प्रेम पावन मोक्ष हित जन्मा हृदय में" प्रेम को गंगा (सुरनदी) के समान पवित्र बताना और विरह को 'तट' कहना, भावों को दृश्यता प्रदान करता है।
विरोधाभास
"अविवाहित हैं गीत हमारे" गीतों का मानवीकरण कर उन्हें 'अविवाहित' कहना एक नई और मौलिक उद्भावना है। यह उस प्रेम का प्रतीक है जिसे सामाजिक स्वीकृति (विवाह) नहीं मिली, फिर भी वह अस्तित्व में है।


परंपरा और प्रयोग का सेतु

'एक राधा गीत गाती है' की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें तत्सम शब्दावली की प्रचुरता है। 'परिवेदना', 'रंजना', 'अभिसार', 'शुभे', 'विनय-पत्रिका' जैसे शब्दों का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि कवि की पकड़ हिंदी की सुदीर्घ साहित्यिक परंपरा पर मजबूत है।
साथ ही, कवि ने लोक-जीवन के शब्दों का भी सुंदर समायोजन किया है। कहीं-कहीं 'री', 'हाय' जैसे संबोधन लोक-गीतों की मिठास और पीड़ा को जीवंत कर देते हैं। ब्रज भाषा की कोमलता और खड़ी बोली का खरापनदोनों का मणिकांचन योग यहाँ देखने को मिलता है। हालांकि, कहीं-कहीं 'उभय', 'अकल्पष' जैसे भारी-भरकम शब्द गीत के कोमल प्रवाह में थोड़े अवरोधक प्रतीत होते हैं, किन्तु वे कथ्य की गंभीरता और दार्शनिकता के लिए आवश्यक भी लगते हैं।
 
'एक राधा गीत गाती है' पढ़ते समय अनायास ही हिंदी साहित्य के मूर्धन्य कवियों का स्मरण हो आता है। यह कृति एक शून्य में नहीं रची गई है, बल्कि यह एक समृद्ध परंपरा से संवाद करती है।
मध्यकालीन भक्त कवि: पुराने कवियों में मीरा, सूरदास, कबीर और तुलसीदास जैसे नाम स्मृति पटल पर उभरते हैं। मीरा के 'चूड़ी न टूटे, माथा न फूटे' जैसी विरहिणी की निडरता और दर्द, तथा सूरदास के 'निसिदिन बरसत नैन हमारे' जैसी निरंतर अश्रु-धारा का आधुनिक संस्करण यहाँ दिखाई देता है। कबीर का 'हम से रहा न जाय' वाला विछोह भाव भी यहाँ विद्यमान है।
आधुनिक कवि: नए कवियों में मैथिलीशरण गुप्त की 'साकेत' की उर्मिला का विरह और 'चलो, मानव-मन, चलो' जैसी पंक्तियों की आकुलता यहाँ राधा के स्वर में मिलती है। सुमित्रानंदन पंत के 'वह कौन, तिहारी आंखों में' जैसी छायावादी सुकुमारता और प्रकृति के माध्यम से प्रेम-वियोग की व्यथा को चित्रित करने की शैली का प्रभाव भी प्रशांत मिश्र 'मन' पर परिलक्षित होता है।
कवि ने इन पूर्वजों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे अपने समय के मुहावरों में ढाला है। 'एक राधा गीत गाती है' में राधा केवल पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि महादेवी की 'दीपशिखा' की तरह जलने वाली एक आधुनिक स्त्री है।
संवेदना के शिखर


संग्रह के कुछ गीत अपनी संवेदना और शिल्प के कारण विशेष उल्लेख के अधिकारी हैं:
'सज रहा मण्डप कहीं पर': यह गीत संग्रह का 'हृदय-स्थल' है। इसमें विवाह के मंगल क्षणों (मंडप, हल्दी, फेरे) और प्रेम की मृत्यु के अमंगल का जो विरोधाभास खींचा गया है, वह अद्भुत है। प्रेमी को 'नट' (अभिनेता) की उपमा देना"और तुम फेरे करोगे यह तुम्हीं हो या कि नट है?"कवि की सूक्ष्म दृष्टि और क्राफ्ट का उत्कृष्ट प्रमाण है।
'दूरी बहुत खला करती है': यह गीत विरह की उस मनोवैज्ञानिक स्थिति को पकड़ता है जहाँ भौतिक दूरी मन के लिए असहनीय हो जाती है।
'अविवाहित हैं गीत हमारे': यह गीत शीर्षक की दृष्टि से अत्यंत नूतन है। यह स्वीकारोक्ति कि प्रेम का कोई सामाजिक नाम (विवाह) नहीं है, फिर भी वह गीतों के रूप में जीवित है, इसे एक दार्शनिक ऊंचाई देती है।
किसी भी कृति का निष्पक्ष मूल्यांकन उसके गुण और दोषों के सम्यक विवेचन के बिना अधूरा है।
सबल पक्ष
संवेदनात्मक ईमानदारी: कवि ने राधा-कृष्ण के मिथक को केवल पूजा के लिए नहीं, बल्कि आधुनिक प्रेम की विवशताओं को स्वर देने के लिए चुना है। यह कृति 'विरह' को केवल रोना-धोना नहीं, बल्कि एक पवित्र अनुष्ठान की तरह स्थापित करती है।
गेयता: छंदों का अनुशासन और लय का प्रवाह इसे मंच और पाठदोनों के लिए उपयोगी बनाता है।
मौलिक बिंब: 'सन्नाटों में चीखों का जीवन', 'सुधि को वरमाला पहनाना'—ये बिंब नए और ताजे हैं।

            एकरसता: कृति की सबसे बड़ी सीमा इसकी विषयगत एकरसता है। चूँकि पूरा संग्रह 'विरह' पर केंद्रित है, इसलिए मध्य में जाकर पाठक को भावों की पुनरावृत्ति महसूस हो सकती है। विरह के अलावा संयोग या मिलन के चित्र बहुत कम हैं, जो एकरसता पैदा करते हैं। यदि 'संयोग श्रृंगार' के कुछ चित्र स्मृति रूप में ही सही, अधिक होते, तो विरह की गहनता और निखर कर आती।
अतिशय रुदन: कहीं-कहीं विलाप इतना अधिक हो गया है कि वह 'करुणा' के बजाय 'अवसाद' की ओर झुकता प्रतीत होता है। "रुग्ण थे स्वर सिसकियों के" या "हँसते-हँसते रो देता मन" जैसी पंक्तियाँ संवेदना जगाने के बजाय एक नकारात्मक और निराशाजनक वातावरण निर्मित करती हैं। उच्च साहित्य में दुख का उदात्तीकरण होना चाहिए, न कि उसका निरुद्देश्य प्रदर्शन।
एक अमिट दस्तावेज
समग्र रूप से, 'एक राधा गीत गाती है' केवल गीतों का संग्रह नहीं, बल्कि एक 'विफल प्रेम का महाकाव्य' है। यह उन सभी प्रेमियों का दस्तावेज है जिन्होंने समाज के 'मंडप' के बाहर खड़े होकर अपनी 'सिन्दूरदानी' को किसी और के हाथों में जाते देखा है।
प्रशांत मिश्र 'मन' ने अपनी लेखनी से सिद्ध कर दिया है कि वे केवल तुकांत मिलाना नहीं जानते, बल्कि शब्दों में प्राण फूंकना जानते हैं। उनकी कविताएँ पाठकों के मन को छू जाती हैं और उन्हें प्रेम के रहस्यों में लीन कर देती हैं। हिंदी साहित्य की गीत परंपरा में, जहाँ नीरज, बच्चन और महादेवी जैसे दिग्गजों के पदचिह्न हैं, वहाँ प्रशांत मिश्र 'मन' की यह कृति एक विनम्र किन्तु आश्वस्त हस्तक्षेप है।

मेरे अनुसार - “यह कृति उस दीये की तरह है जो प्रेम के भव्य मन्दिर में नहीं, बल्कि विरह के सुनसान और पथरीले रास्ते पर जल रहा है। इसकी रोशनी में हर बिछड़ा हुआ प्रेमी अपना चेहरा देख सकता है और अपनी पीड़ा को 'गीत' में बदल सकता है।"
साहित्य जगत में इस भावपूर्ण, सुगठित और संवेदना से सिक्त रचना का स्वागत होना चाहिए। यह पुस्तक सिद्ध करती है कि जब तक मनुष्य प्रेम करेगा, तब तक 'राधा' गीतों में जीवित रहेगी, और तब तक 'विरह' कविता का सबसे उर्वर आधार बना रहेगा।


आचार्य प्रताप
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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