मंगलवार, 10 मार्च 2020

कुंडलियाँ छंद

कुंडलियाँ_छंद
------------------------
मित्र परिधि में जुड रहे , भाँति-भाँति  के  लोग।
जुड़कर   भटके   ये  नहीं ,  कैसा  यह  संयोग।
कैसा  यह   संयोग  , कहे  ये  मन  हो    पावन।
बिन  ऋतु  लगे  वसंत ,  लगा जैसे  हो सावन ।
कैसे   बरसे   मेह  ,  टिप्पणी  आये   निधि  में ।
सरस सलिल सम राह ,   पधारें  मित्र परिधि में।
--------
आचार्य प्रताप

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी टिप्पणी से आपकी पसंद के अनुसार सामग्री प्रस्तुत करने में हमें सहयता मिलेगी। टिप्पणी में रचना के कथ्य, भाषा ,टंकण पर भी विचार व्यक्त कर सकते हैं