मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

शीर्षक - || धन्य है तू वेदने जग को बताऊँ ||

मोल अपने मैं प्रणय का क्या बताऊँ ।

वेदना मैं निज ह्रदय की क्या सुनाऊँ ।।

प्रेरणा का

एक साधन प्रेम होता ।

प्रीत न

करता अगर तो क्षेम होता ।

छुद्र था

मेरा समर्पण ही सदा यूँ –

भेद तेरे

मन का क्यों न जान पाऊँ ।

वेदना मैं निज ह्रदय......... ।।०१।।

                        मानसपटल

                            को जीतकर दी मात तूने ।

                           प्रीत के

                                बदले किया प्रतिघात तूने ।

                    मौन रह मैं

                                उर की पीड़ा कह न पाऊँ –

                            घाव अपने

                                आज फिर मैं क्यों दिखाऊँ ।

                            वेदना मैं निज ह्रदय....... ।।०२।।

खो न

जाऊँ कँगनों की खनकनों में।

गीत बन

जो बस गये हैं धड़कनों में।

ड़बड़बाते

दृग लिये यह सोचता हूँ -

निज

प्रणय की आज  गाथा क्युँ मैं गाऊँ ।

वेदना मैं निज ह्रदय........ ।।०३।।

                    प्रार्थना में

                       प्रीत की ही कामना थी ।

                    प्रीत के

                        अतिरिक्त न कुछ कामना थी ।

                    किन्तु मेरे

                        तुम प्रणय को सुन न पाई ।

                     फिर वेदना

                        के गीत  क्यों तुमको सुनाऊँ।

                वेदना मैं निज ह्रदय........ ।।०४।।

किंचित

प्रणय को तुम मेरे पहचान पाती।

तुम मेरी

आराधिता थी जान पाती।

आत्म का

 स्तम्भ व आधार थी तुम-

धन्य है तू वेदने जग को बताऊँ।


वेदना मैं निज ह्रदय........ ।।०५।।


-आचार्य प्रताप

प्रबंध निदेशक

अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्रम्



12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (16-12-2020) को "हाड़ कँपाता शीत"  (चर्चा अंक-3917)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  2. उत्तर
    1. बहुत बहुत हेतु आभार आपका पधारने तथा उत्साहवर्धक टिप्पणी हेतु
      ||सादर नमन ||

      हटाएं
  3. आत्म का

    स्तम्भ व आधार थी तुम-

    धन्य है तू वेदने जग को बताऊँ।... बहुत ही आत्मव‍िभोर करने वाली रचना प्रताप जी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. नमन आपको धैर्य पूर्वक पढने के लिए
      कल सुबह इसका पाठन मेरे youtube चैनेल पर किया जाना सुनिश्चित गया गया है

      https://www.youtube.com/acharypratap

      हटाएं

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