गाँव का चुनाव और पाँच वर्ष की गुलामी का अनुबंध
गाँव का चुनाव आते ही गाँव की मिट्टी में लोकतन्त्र की सुगन्ध फैलने लगती है। वर्षों से जिस गली में विकास पैदल चलने से भी कतराता था, वहाँ अचानक वाहनों की कतारें दिखाई देने लगती हैं। जिन द्वारों पर पाँच वर्ष तक किसी ने कुशलक्षेम पूछने की आवश्यकता नहीं समझी, वहाँ अब चरणधूलि लेने वालों का ताँता लग जाता है। कल तक जो जनप्रतिनिधि दूर से पहचानने में भी कठिनाई अनुभव करते थे, वे आज प्रत्येक मतदाता को अपने परिवार का ज्येष्ठ सदस्य मानने लगते हैं।
गाँव का चुनाव वास्तव में अद्भुत उत्सव है। यहाँ सम्बन्धों की फसल पाँच वर्ष में एक बार लहलहाती है और आश्वासनों की वर्षा इतनी होती है कि सूखे कुएँ भी कुछ क्षणों के लिए पानी की आशा करने लगते हैं। अन्तर केवल इतना है कि वर्षा के बाद खेतों में अन्न उगता है, जबकि चुनाव के बाद आश्वासनों की फसल प्रायः अगली वर्षा तक सूख जाती है।
इस बार अध्यक्ष का चुनाव सीधे जनता के हाथों में है। अर्थात् सत्ता की चाबी मतदाता के हाथ में है। अब प्रश्न यह है कि वह इस चाबी से विकास का द्वार खोलेगा अथवा कुछ क्षणों के लाभ के बदले अपने ही घर का ताला किसी दूसरे को सौंप देगा।
आश्वासन की खेती और विकास की कटाई
चुनाव के दिनों में प्रत्येक प्रत्याशी गाँव का ऐसा सेवक बन जाता है, जिसकी सेवा करने के लिए गाँव को ही अपना भाग्य धन्य मानना चाहिए। कोई कहता है, सड़क बनवा दूँगा; कोई कहता है, नाली बनवा दूँगा; कोई जल की व्यवस्था सुधारने का वचन देता है। कुछ तो ऐसे होते हैं कि उनके सामने गाँव की समस्याएँ गिनाने बैठ जाइए, वे पूरे गाँव को स्वर्ग बनाने की योजना सुना देंगे। बस, स्वर्ग का द्वार खुलने से पहले उन्हें एक छोटा-सा सहयोग चाहिए—आपका अमूल्य मत!
जनता भी भोली है। उसे लगता है कि इस बार प्रत्याशी ने आँखों में आँखें डालकर बात की है, इसलिए अवश्य कुछ करेगा। वह भूल जाती है कि आँखों में देखकर बात करना और आँखों के सामने काम करना दो भिन्न बातें हैं।
बघेली अंचल में कहावत है—“का हो, कागज मा लिखि द्या, तबै मानब कि काम होई!” यही बात आज गाँव के प्रत्येक मतदाता को समझनी चाहिए। जो भी प्रत्याशी विकास का वचन देने आए, उससे कहिए कि अपने कार्यों की सूची लिखकर दे, उस पर हस्ताक्षर करे और सम्भव हो तो उसका कथन अभिलेखित भी किया जाए। यह कोई अविश्वास नहीं, लोकतन्त्र की सजगता है।
आखिर विवाह में भी सम्बन्ध केवल मीठी बातों से नहीं निभते, वहाँ उत्तरदायित्व भी होते हैं। फिर पाँच वर्ष तक गाँव का भार सँभालने वाले से उत्तरदायित्व माँगना कौन-सा अपराध है?
मत का मूल्य और प्रलोभन का मोल
चुनाव में प्रलोभन की गठरी भी बड़ी विचित्र होती है। उसमें कभी धन होता है, कभी उपहार, कभी भोज और कभी ऐसे निजी लाभ का आश्वासन, जिसे सुनकर विवेक भी कुछ देर के लिए छुट्टी पर चला जाता है।
मतदाता सोचता है कि पाँच सौ अथवा एक हजार रुपये मिल रहे हैं, तो ले लेने में क्या हानि है! हानि का हिसाब वह नहीं लगाता कि जिस व्यक्ति ने कुछ क्षण के लाभ के लिए लाखों रुपये व्यय किए हैं, वह सत्ता मिलने के बाद उस धन की भरपाई कहाँ से करेगा। सार्वजनिक धन कोई कल्पवृक्ष नहीं, जिसकी शाखाएँ हिलाते ही निजी लाभ टपकने लगे।
कुर्सी पाने के लिए यदि कोई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य से कहीं अधिक धन व्यय कर रहा है, तो मतदाता को यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए कि यह सेवा का संकल्प है अथवा लाभ कमाने की योजना? सेवा में त्याग की सम्भावना होती है, जबकि व्यापार में लाभ की अपेक्षा। दोनों का बाहरी रूप एक जैसा हो सकता है, परन्तु भीतर का उद्देश्य भिन्न होता है।
और जो मतदाता अपना मत बेच देता है, वह वस्तुतः केवल एक मत नहीं बेचता; वह आने वाले पाँच वर्षों तक प्रश्न पूछने का अपना नैतिक अधिकार भी दुर्बल कर देता है। जिस व्यक्ति ने अपना निर्णय कुछ रुपयों के बदले सौंप दिया, वह बाद में सड़क की दुर्दशा, जल की समस्या और अधूरे कार्यों पर किस मुँह से उत्तरदायित्व माँगेगा?
मत का मूल्य बाजार में निर्धारित नहीं होता। उसका मूल्य उस विद्यालय में है जहाँ हमारे बच्चे पढ़ेंगे, उस सड़क में है जिस पर हमारी वृद्ध माता चलेगी, उस जल में है जिसे हमारा परिवार पिएगा और उस व्यवस्था में है जिसमें हमारी अगली पीढ़ी जीवन बिताएगी।
पुराना धोखा, नई माला
गाँव की स्मृति भी विचित्र होती है। किसी प्रत्याशी ने पाँच वर्ष तक दर्शन नहीं दिए, फिर भी चुनाव आते ही वह इतना अपना लगने लगता है कि लोग पुराने दिनों की उपेक्षा भूल जाते हैं। वह द्वार पर आता है, चरण छूता है, कुशल पूछता है और कहता है—“इस बार अवसर दीजिए, गाँव की तस्वीर बदल दूँगा।”
मतदाता का मन पिघल जाता है। उसे याद नहीं रहता कि पिछली बार भी इसी वाक्य के साथ विदाई हुई थी। तस्वीर बदलने का वचन देने वाला स्वयं तो बदल जाता है, परन्तु गाँव की तस्वीर वैसी ही रह जाती है।
एक काल्पनिक गाँव की कल्पना कीजिए। वहाँ एक प्रत्याशी ने पिछली अवधि में सड़क बनवाने का वचन दिया था। सड़क नहीं बनी, परन्तु उसके घर तक जाने वाला मार्ग अवश्य सुधर गया। अब वह पुनः मत माँगने आया। गाँव के एक वृद्ध किसान ने पूछा, “बेटा, पिछली बार सड़क का वचन दिए रहे, उ सड़क कहाँ गई?”
प्रत्याशी मुस्कराया, “बाबा, योजना बनी थी, कुछ बाधाएँ आ गईं।”
वृद्ध बोले, “अच्छा! योजना कागज पर बनी, बाधा धरती पर आ गई और लाभ तुम्हरे द्वार पहुँच गवा! वाह रे विकास!”
भीड़ हँस पड़ी। प्रत्याशी भी हँसा, क्योंकि चुनाव में मुस्कराना सबसे सस्ता और उपयोगी साधन होता है। किन्तु उस वृद्ध का प्रश्न गाँव के विवेक का प्रश्न था। वह किसी व्यक्ति का अपमान नहीं कर रहा था; वह अपने गाँव के भविष्य का हिसाब माँग रहा था।
यही दृष्टि प्रत्येक मतदाता में होनी चाहिए। पहले किसी से धोखा मिला हो, तो केवल नए वचन सुनकर पुराना विश्वास लौटाना बुद्धिमानी नहीं। विश्वास का आधार कार्य होना चाहिए, केवल परिचय, जातीय समीपता, पारिवारिक सम्बन्ध अथवा मधुर वचन नहीं।
दोष केवल प्रत्याशी का नहीं
हम प्रायः चुनाव के बाद कहते हैं कि नेता ठीक नहीं निकला। परन्तु क्या कभी हमने अपने निर्णय की भी परीक्षा की? क्या हमने उसके कार्य देखे थे? क्या हमने गाँव की आवश्यकताओं पर विचार किया था? क्या हमने अपने मत का उपयोग विवेक से किया था?
लोकतन्त्र में प्रत्याशी का दायित्व बड़ा है, परन्तु मतदाता का दायित्व छोटा नहीं। यदि हम बार-बार उसी प्रकार के प्रलोभनों में पड़ते हैं, तो केवल व्यवस्था को दोष देना वैसा ही है जैसे खेत में बीज बोए बिना अच्छी फसल की प्रतीक्षा करना।
हाँ, यह भी सत्य है कि प्रत्येक प्रत्याशी को संदेह की दृष्टि से देखना उचित नहीं। अनेक व्यक्ति वास्तव में सेवा करना चाहते हैं। इसलिए निर्णय पूर्वाग्रह से नहीं, प्रमाण और कार्ययोजना से होना चाहिए। योग्य व्यक्ति का समर्थन कीजिए, उसके सामने स्पष्ट अपेक्षाएँ रखिए और निर्वाचित होने के बाद भी उसके कार्यों की समीक्षा कीजिए।
हम पूरे देश का भार अपने कन्धों पर नहीं उठा सकते, परन्तु अपने गाँव के भविष्य के प्रति सजग तो हो सकते हैं। गाँव की सभा में विकास के प्रश्न उठाना, आवश्यक कार्यों की सूची बनाना, सार्वजनिक धन के उपयोग की जानकारी माँगना और निर्वाचित प्रतिनिधि से नियमित प्रगति पूछना—यही लोकतन्त्र की वास्तविक शक्ति है।
मतदान नहीं, भविष्य का चयन
चुनाव केवल अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया नहीं है; यह आने वाले पाँच वर्षों के जीवन की दिशा चुनने का अवसर है। इसलिए जब कोई प्रत्याशी आपके द्वार आए, तो उसका सम्मान कीजिए, उसकी बात सुनिए, किन्तु अपने विवेक को उसके चरणों में मत रखिए। उससे पूछिए कि वह क्या करेगा, कैसे करेगा और कब तक करेगा। उसके पिछले कार्य देखिए और उसके वचनों को लिखित कार्ययोजना में बदलने का आग्रह कीजिए।
याद रखिए, कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति पाँच वर्ष तक गाँव का प्रतिनिधि होता है, गाँव का स्वामी नहीं। जनता ने उसे अधिकार दिया है, अपनी बुद्धि गिरवी नहीं रखी है।
अन्त में बात इतनी-सी है कि यदि मतदाता जागरूक हो जाए, तो प्रत्याशी को भी अपने आचरण में जागरूक होना पड़ेगा। यदि मतदाता प्रलोभन को ठुकरा दे, तो प्रलोभन की राजनीति का मूल्य घटने लगेगा। और यदि गाँव अपने विकास का हिसाब माँगना सीख ले, तो विकास केवल भाषणों का विषय न रहकर धरातल की आवश्यकता बन जाएगा।
इसलिए इस बार मत बेचिए मत, अपना भविष्य चुनिए। किसी के बहकावे में मत आइए, किसी से केवल पुराने परिचय के कारण बँधिए मत। गाँव आपका है, उसकी सड़कें आपकी हैं, उसका जल आपका है और उसकी अगली पीढ़ी भी आपकी ही उत्तराधिकारी है।
मतदान के दिन उँगली पर लगने वाली स्याही कुछ दिनों में मिट जाएगी, परन्तु विवेकहीन निर्णय का प्रभाव पाँच वर्षों तक बना रह सकता है।
और हाँ, यदि कोई पूछे कि आप इतने प्रश्न क्यों कर रहे हैं, तो विनम्रता से कहिए—“भैया, हम गाँव के नागरिक हैं, केवल मतों की गिनती बढ़ाने वाली संख्या नहीं। अबकी बार वचन नहीं, कार्य देखब; प्रलोभन नहीं, विकास चुनब।”
लोकतन्त्र की सबसे बड़ी विजय तब नहीं होगी जब कोई प्रत्याशी कुर्सी पर बैठेगा, बल्कि तब होगी जब कुर्सी पर बैठने वाला यह समझेगा कि उसे बैठाने वाली जनता सोई हुई नहीं है।
क्योंकि गाँव का भाग्य केवल चुनाव जीतने वाले के हाथ में नहीं होता; उसे सँवारने अथवा बिगाड़ने में मत देने वाले का विवेक भी उतना ही उत्तरदायी होता है।
आचार्य प्रताप