अर्थव्यवस्था का अमृत और समाज का विष
विचित्र समय है! आजकल किसी वस्तु के गुण-दोष का निर्णय इस आधार पर नहीं होता कि उससे मनुष्य का कितना भला हुआ, बल्कि इस आधार पर होता है कि उससे सरकारी कोष में कितनी धनराशि पहुँची। इसी कसौटी पर यदि विष भी राजस्व बढ़ाने लगे, तो सम्भव है कि उसे अमृत घोषित करने के लिए कोई समिति बैठा दी जाए।
मदिरा की एक दुकान के आसपास कुछ लोग स्त्रियों के साथ अभद्र व्यवहार करते हैं, राह चलती महिलाओं को असुविधा होती है, समीप के रिक्त खेतों और खुले स्थानों पर मद्यपान करने वालों का जमावड़ा लगा रहता है। यह सब देखकर कुछ नागरिक दुकान हटाने की माँग करते हैं। उनकी चिन्ता सहज है—मार्ग सुरक्षित रहें, स्त्रियाँ निर्भय होकर निकल सकें और खेतों में अन्न उगे, मदिरा के पात्र नहीं।
किन्तु उनकी इस छोटी-सी सामाजिक चिन्ता के सामने अर्थव्यवस्था का विराट प्रश्न खड़ा कर दिया जाता है। कहा जाता है कि मदिरा ही देश की अर्थव्यवस्था को सँभाले हुए है। यदि ऐसी दुकानें हट गईं, तो राजस्व का क्या होगा? राजस्व घटा, तो राष्ट्र का क्या होगा? और राष्ट्र को हानि हुई, तो कहीं यह राष्ट्रविरोध का कार्य तो नहीं!
तर्क की यह सीढ़ी इतनी ऊँची है कि उस पर चढ़ते-चढ़ते मनुष्य अपने घर की देहरी ही भूल जाए। स्त्री की सुरक्षा नीचे छूट जाए, बालकों का भविष्य पीछे रह जाए, परिवार की शान्ति कहीं मार्ग में बैठ जाए; किन्तु अर्थव्यवस्था का ध्वज हाथ से नहीं छूटना चाहिए।
अब कोई पूछे कि यदि मदिरा की दुकान के कारण आसपास का वातावरण दूषित हो रहा है, तो उसका समाधान क्या है? उत्तर मिलेगा—व्यवस्था कीजिए। प्रश्न होगा कि व्यवस्था कौन करेगा? उत्तर आएगा—सम्बन्धित विभाग। फिर पूछा जाएगा कि विभाग कब करेगा? तब तक अगली सन्ध्या हो चुकी होगी और अर्थव्यवस्था अपनी दैनिक साधना में पुनः लीन हो जाएगी।
हमारे सतना अंचल में कहा जाता है—‘का हो, भइया! घरै मा आग लागै तौ पहिले लोटा बचाइहौ कि घर के मनई?’ परन्तु आधुनिक अर्थशास्त्र ने इस लोकबुद्धि को भी चुनौती दे दी है। अब कहा जा सकता है कि घर जलता रहे, पर अग्नि से उत्पन्न ऊष्मा का आर्थिक मूल्यांकन अवश्य होना चाहिए।
मदिरा की दुकान से मिलने वाला राजस्व वास्तविक हो सकता है। शासन को उससे आय प्राप्त होती है, यह भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता। परन्तु क्या राजस्व का लेखा केवल दुकान के विक्रय तक सीमित रहना चाहिए? क्या परिवारों की आर्थिक कठिनाइयों, स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों, सड़क दुर्घटनाओं, घरेलू कलह और सार्वजनिक सुरक्षा पर पड़ने वाले भार का कोई मूल्य नहीं? यदि आय का लेखा रखा जाता है, तो उससे उत्पन्न सामाजिक व्यय का लेखा भी रखा जाना चाहिए। अन्यथा यह वैसा ही हिसाब होगा जिसमें किसान अपनी उपज तो गिने, पर खेत में डाला गया बीज भूल जाए।
व्यंग्य की विडम्बना देखिए कि कुछ लोग दुकान हटाने की माँग कर रहे हैं और कुछ लोग उन्हें राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का विरोधी सिद्ध करने में लगे हैं। मानो नागरिकों ने दुकान हटाने का निवेदन नहीं किया, राष्ट्रीय आय के मूल स्तम्भ पर प्रहार कर दिया हो! कल को कोई व्यक्ति विद्यालय के निकट शोर रोकने की माँग करे, तो सम्भव है उसे ज्ञान की अर्थव्यवस्था का विरोधी बता दिया जाए। चिकित्सालय के सामने अतिक्रमण हटाने की बात उठे, तो उसे औषधि उद्योग का विरोधी घोषित कर दिया जाए।
तब देश में नागरिकों की आवश्यकता के अनुसार व्यवस्था नहीं बनेगी; व्यवस्था की आवश्यकता के अनुसार नागरिकों को अपनी आवश्यकताएँ बदलनी पड़ेंगी।
एक काल्पनिक ग्रामसभा की कल्पना कीजिए। गाँव की महिलाओं ने शिकायत की कि मदिरा की दुकान के समीप से निकलना कठिन हो गया है। कुछ युवकों ने बताया कि रिक्त खेतों में प्रतिदिन मद्यपान करने वालों का जमावड़ा लगता है। ग्रामसभा में एक सज्जन उठे और बोले, ‘भाइयो! भावना में मत बहिए। दुकान से राजस्व आता है। इसे हटाना देश की अर्थव्यवस्था को दुर्बल करना है।’
एक वृद्ध किसान अब तक चुप बैठा था। उसने अपनी लाठी सँभाली और कहा, ‘महाराज, हम तो अनपढ़ किसान हैं। बस इतना जानते हैं कि खेत में अन्न बोया जाता है, काँटे नहीं। यदि काँटों से भी आय होने लगे, तो क्या हम गेहूँ बोना छोड़ दें?’
सभा में कुछ क्षण मौन रहा। फिर किसी ने सुझाव दिया कि वृद्ध किसान को अर्थव्यवस्था का प्रशिक्षण दिया जाए। सम्भव है, वह अपनी समझ बदल ले। आखिर व्यवस्था को प्रश्नों से अधिक सुविधा प्रिय होती है।
वास्तविक प्रश्न मदिरा की दुकान के अस्तित्व मात्र का नहीं, उसके संचालन, स्थान, सार्वजनिक सुरक्षा और उत्तरदायित्व का है। यदि किसी स्थान पर स्त्रियों के साथ अभद्र व्यवहार हो रहा है, तो उसकी रोकथाम तत्काल होनी चाहिए। पुलिस की नियमित निगरानी, प्रकाश की व्यवस्था, अवैध जमावड़े पर नियन्त्रण, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और आवश्यकता पड़ने पर दुकान के स्थानान्तरण जैसे उपायों पर गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए। राजस्व की आवश्यकता नागरिकों की गरिमा और सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकती।
राष्ट्र केवल कोषागार में संचित धन का नाम नहीं है। राष्ट्र वह स्त्री भी है जो सन्ध्या को निर्भय होकर घर लौटना चाहती है; वह किसान भी है जो अपने खेत को सुरक्षित देखना चाहता है; वह बालक भी है जो अपने पिता को घर में उपस्थित और परिवार के प्रति उत्तरदायी देखना चाहता है।
यदि अर्थव्यवस्था मनुष्य के जीवन को सँभालने के लिए है, तो मनुष्य को अर्थव्यवस्था के नाम पर असुरक्षा सहने के लिए विवश क्यों किया जाए?
मदिरा से प्राप्त राजस्व का उपयोग जनकल्याण में हो, यह उचित है; किन्तु जनकल्याण की बलि देकर राजस्व बढ़ाना कैसी प्रगति है? राष्ट्र की हानि केवल तब नहीं होती जब राजकोष खाली हो जाए। राष्ट्र की हानि तब भी होती है जब उसकी स्त्रियाँ असुरक्षित हों, उसके परिवार टूटते हों और उसके नागरिकों की पीड़ा को आय के आँकड़ों के नीचे दबा दिया जाए।
अन्ततः निर्णय हमें करना है—हम ऐसी अर्थव्यवस्था चाहते हैं जो मनुष्य के लिए हो, अथवा ऐसा मनुष्य जो अर्थव्यवस्था के आँकड़ों में समा जाने के लिए विवश हो जाए।
क्योंकि जिस दिन राजस्व बचाने के लिए नागरिक की सुरक्षा को व्यय मान लिया जाएगा, उस दिन लेखा भले ही सन्तुलित दिखाई दे, राष्ट्र का जीवन अवश्य घाटे में चला जाएगा।
आचार्य प्रताप
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