2. आचार्य प्रताप की साहित्यिक यात्रा में एक और मधुर पड़ाव—‘अर्णिका’
समीक्षिका : 'शास्त्री रेखा सिंह जयशूर’
- पुस्तक-परिचय
- पुस्तक का नाम: अर्णिका (सृजन-मञ्जरी)
- लेखक: आचार्य प्रताप
- विधा: सृजन-मञ्जरी (काव्य-संग्रह)
- प्रकाशक: बुक्सक्लिनिक पब्लिशिंग
- कुल पृष्ठ: ९४ (कवर पृष्ठ को छोड़कर)
- प्रकाशन वर्ष: अगस्त, २०२६
- ISBN: 978-93-7254-611-8
- मूल्य: १५० ₹
आचार्य प्रताप की अब तक तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी पहली पुस्तक ‘मेरी बगिया के फूल’ एक काव्य-संग्रह है। इसके पश्चात आया ‘स्वरात्मिका’, जो उनकी अपनी सुता के नाम समर्पित पहला गीत-संग्रह था। इसी काव्य-यात्रा की अगली कड़ी है ‘अर्णिका’—एक ऐसा गीत-संग्रह, जो उनकी प्यारी भांजी के नाम समर्पित है।
‘अर्णिका’ केवल गीतों का संकलन नहीं, बल्कि आत्मीय संबंधों, संवेदनाओं और जीवन के विविध रंगों से बुना हुआ भावलोक है। एक शिक्षक और अकादमिक नेतृत्वकर्ता के रूप में आचार्य प्रताप वर्षों से विद्यार्थियों और सहकर्मियों को ज्ञान, संस्कार और जीवन-पथ की दिशा दिखाते रहे हैं; साहित्य में भी उनकी यही दृष्टि संवेदना और सृजन के रूप में अभिव्यक्त होती दिखाई देती है।
साहित्य का मूल उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, अपितु मानवीय संवेदनाओं का परिष्कार और समाज का यथार्थपरक मार्गदर्शन भी है। एक समालोचक के रूप में जब मैं आचार्य प्रताप द्वारा रचित कृति 'अर्णिका' का अवलोकन करती हूँ, तो यह स्पष्ट होता है कि यह संग्रह मात्र शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि कवि के व्यापक जीवन-अनुभवों, राष्ट्रीय चेतना, और गहन मानवीय संवेदनाओं का एक जीवंत दस्तावेज़ है। पुस्तक का शीर्षक 'अर्णिका' कवि की भानजी को समर्पित है, जिसका अर्थ जल की तरंग या लहर होता है। यह नाम कृति की तरलता और भावों के प्रवाह को भी सार्थक करता है। आधुनिक युग में जहाँ कविता छंदों के अनुशासन से मुक्त होकर गद्य की ओर अग्रसर है, वहीं आचार्य प्रताप ने इस संग्रह में पिंगल-शास्त्र और छंद-विधान का कठोरता से पालन कर भारतीय काव्य-परंपरा को पुनर्जीवित करने का स्तुत्य प्रयास किया है। इस विस्तृत और निष्पक्ष समीक्षा में हम इस कृति की प्रत्येक प्रमुख रचना का उसके कथ्य, शिल्प, रस, अलंकार और दार्शनिक दृष्टि के आधार पर गहन विवेचन करेंगे।
किसी भी कृति का नामकरण उसकी आत्मा का परिचायक होता है। 'अर्णिका' शीर्षक कवि की भानजी को समर्पित है, जिसका शाब्दिक अर्थ जल की तरंग या लहर होता है। यह अत्यंत आश्चर्यजनक और विचारणीय था कि पूर्व की समीक्षा में उस मुख्य कविता का विवेचन छूट गया था जो इस संपूर्ण संग्रह का आधार है।
'हे अर्णिका करुणासुधा-सी...'
शीर्षक वाली यह कविता वात्सल्य और भक्ति रस का एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है। कवि एक नन्ही बालिका में केवल लौकिक स्नेह नहीं देखता, बल्कि उसमें ईश्वरीय सत्ता का दर्शन करता है। पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
"हे अर्णिका करुणासुधा-सी, है ज्योतिर्मय तू तरंगिणी।
तन-मन में दे नव चेतना-सी, भर शक्ति-भक्ति सुरंगिणी॥"।
यहाँ कवि ने बालिका के लिए 'करुणासुधा-सी' और 'ज्योतिर्मय तरंगिणी' जैसे विशेषणों का प्रयोग कर मानवीकरण और रूपक अलंकार की सुंदर छटा बिखेरी है। बालिका का निश्छल स्वरूप कवि के लिए केवल वात्सल्य का विषय नहीं है, अपितु वह उसके लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शिका बन जाती है। आगे की पंक्तियों में यह भाव अपने चरम पर पहुँचता है-
"तेरे चरण की धूल बन मैं, पथ-पथ पे गा मंगल कथा।"
और
"भटके मन को सु-मार्ग दे दो, हे जगत जननी सुधारिणी।"।
शिल्प की दृष्टि से यह रचना अत्यंत कोमल और सांगीतिक है। यद्यपि एक नन्ही भानजी को 'जगत जननी' कहकर संबोधित करना प्रथम दृष्टया अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत हो सकता है, परंतु भारतीय दर्शन में कन्या को देवी का ही स्वरूप माना गया है, अतः कवि का यह भाव-विस्तार सांस्कृतिक और भावनात्मक स्तर पर पूर्णतः ग्राह्य है।
काव्य-संग्रह के आरंभ में कवि ने नवोदित रचनाकारों के मार्गदर्शन हेतु 'सृजन-विधान' और 'सृजन-सूत्र' जैसी परिचयात्मक रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, जो सिद्ध करती हैं कि आचार्य प्रताप के भीतर एक सजग मार्गदर्शक और शिक्षक विद्यमान है। 'सृजन-विधान' में कवि लिखता है-
"गीत-विधा के अंग समझ लो, आओ रचते गीत।
स्वर-लहरी में गूंज उठे जो, बन जाए जो मीत।।"
तथा
"प्रथम चरण है 'मुखड़ा' जानो, भावों का यह खोले द्वार।"
इन पंक्तियों में कवि ने अत्यंत सरल और प्रवाहमयी भाषा में गीत के व्याकरण, मुखड़ा, अंतरा और टेक की संरचना को स्पष्ट किया है। यद्यपि यहाँ काव्यात्मक सौन्दर्य से अधिक शास्त्रीय नियम पर बल है, फिर भी यह प्रयास हिंदी साहित्य की धरोहर को नई पीढ़ी तक हस्तांतरित करने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भाषा में प्रसाद गुण की प्रधानता है और शब्दावली बोधगम्य है।
संग्रह की विधिवत काव्यात्मक यात्रा 'पौरुष का अर्घ्य' से आरंभ होती है, जो ओज गुण और वीर रस से ओतप्रोत एक सशक्त रचना है। कवि युवाओं का आह्वान करते हुए लिखता है-
"अर्घ्य चढ़ा तू निज पौरुष का, जो तेरा प्रारब्ध बदल दे।
चरण धरे जिस ध्येय दिशा में, मत पीछे संकल्प बदल दे॥"
इन पंक्तियों में 'पौरुष' (पराक्रम) को 'अर्घ्य' (पवित्र भेंट) के रूप में कल्पित कर कवि ने रूपक अलंकार का अत्यंत सुंदर प्रयोग किया है। यहाँ भाग्यवादी दृष्टिकोण का खंडन करते हुए कर्मयोग की स्थापना की गई है। अगली पंक्तियों में बिंब-विधान और भी प्रखर हो जाता है-
"बैठ किनारे डरा अगर तो, नाविक न कहलायेगा तू।
तज कर यदि यह तीर न निकला, तीर-सा कब चल पायेगा तू?"
यहाँ 'तीर' शब्द में श्लेष और यमक की अद्भुत छटा है, जहाँ एक तीर का अर्थ किनारा है और दूसरे का अर्थ बाण है। शिल्प की दृष्टि से यह कविता अत्यंत कसी हुई है, परंतु एक आलोचक के रूप में मेरा मानना है कि 'प्रारब्ध बदल दे' जैसे प्रयोगों में नवीनता का अभाव झलकता है; यह भाव हिंदी ओज-काव्य में पूर्व में भी बहुतायत में प्रयुक्त हुआ है।
इसी शृंखला में अगली कविता 'शंखनाद' है, जो राष्ट्रीय चेतना और सीमा-सुरक्षा के प्रति आक्रामक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। कवि का स्वर यहाँ दिनकर की परंपरा का स्मरण कराता है। पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
"छोड़ अहिंसा, उठो वीर अब, रिपु का दमन तुम्हें है करना।
कुचल व्याल के फन को साथी, रिपु का शीश तुम्हें है हरना॥"
यहाँ 'व्याल के फन' का प्रयोग शत्रु की कुटिलता के लिए एक सशक्त प्रतीक के रूप में हुआ है। यद्यपि कविता में राष्ट्रप्रेम का ज्वार है, किंतु "छोड़ अहिंसा" जैसी उक्ति अतिवादी प्रतीत होती है। काव्य में जब भावुकता यथार्थवादी कूटनीति पर हावी हो जाती है, तो वह कविता से अधिक नारा (स्लोगन) लगने लगती है। यहाँ अभिधा शब्द-शक्ति का सीधा प्रयोग है, जबकि व्यंजना के प्रयोग से मारक क्षमता और बढ़ सकती थी।
सामाजिक यथार्थ और शोषित वर्ग की पीड़ा को उद्घाटित करने वाली रचना 'समिधा बनकर जलते हैं' इस संग्रह की एक अमूल्य निधि है। इसमें अतिथि शिक्षकों की दारुण व्यथा को वाणी दी गई है। कवि अत्यंत मर्मस्पर्शी शब्दों में लिखता है-
"ज्ञान-दीप औरों को देते, घोर तमस में हम जीते हैं।
अतिथि नाम का दंश झेलते, घूँट जहर के हम पीते हैं॥"
इन पंक्तियों में विरोधाभास अलंकार का सुंदर प्रयोग है- जो दूसरों को ज्ञान का प्रकाश दे रहा है, वह स्वयं अंधकार में जीने को विवश है। आगे कवि कहता है-
"नाव पुरानी, नदी उफनती, फटे पाल हम तो सीते हैं।"
यह रूपक व्यवस्था की जर्जरता और शोषित वर्ग की निरंतर जीवन-संघर्ष की विवशता को अत्यंत सजीवता से प्रस्तुत करता है। इस रचना में करुण रस और सामाजिक सरोकार अपने चरम पर हैं।
स्त्री-विमर्श और पितृसत्तात्मक समाज में नारी की पहचान के संकट को 'अपना घर कौन सा?' नामक कविता में अत्यंत सशक्त ढंग से उठाया गया है। यह संग्रह की संभवतः सबसे मार्मिक और विचारोत्तेजक रचना है। पंक्तियाँ देखिए- "दो-दो देहरी लाँघ चुकी पर, अपना घर न अब तक पाया।
पीहर ने परदेशी माना, ससुराल पराई ठहराया॥"
इन सहज पंक्तियों में भारतीय स्त्री की वह शाश्वत विडंबना छिपी है, जहाँ विवाह के पश्चात उसका अपना कोई भूगोल नहीं बचता। कवि ने स्त्री की तुलना एक नन्हे पौधे से करते हुए लिखा है-
"ले जाकर अनजानी भू पर, नन्हें पौध को रोप दिया।
जड़ें न उसकी जम पाईं जब, पत्ता-पत्ता मुरझाया।"
यहाँ विस्थापन का दर्द अत्यंत सघन बिंब के माध्यम से उभरकर आया है। कविता "अपना घर कौन सा?" के आलोचनात्मक मूल्यांकन में एक अत्यंत मार्मिक और वैयक्तिक तथ्य का समावेश इसे एक सर्वथा नवीन अर्थ-गांभीर्य प्रदान करता है, जो स्वयं रचनाकार से संवाद के पश्चात मेरे संज्ञान में आया। "दो-दो देहरी लाँघ चुकी पर, अपना घर न अब तक पाया" जैसी पंक्तियों के नेपथ्य में केवल एक सामान्य स्त्री-विमर्श या समष्टिगत विडंबना का बौद्धिक चित्रण नहीं है, अपितु इसके मूल में स्वयं कवि की गहरी आत्मीय पीड़ा और उनकी नवविवाहिता (नव्याहता) बहन का यथार्थ दुःख स्पंदित हो रहा है। एक भाई के रूप में अपनी बहन को विदा करने की विरह-वेदना और एक नई चौखट पर अपनी पहचान खोजने के उसके मानसिक संघर्ष को कवि ने इतनी निकटता से भोगा है कि वह वैयक्तिक पीड़ा इस गीत के माध्यम से सार्वभौमिक सत्य बन गई है। पीहर और ससुराल के बीच झूलती स्त्री की इस शाश्वत त्रासदी में कवि ने अपनी बहन के मौन क्रंदन को जिस प्रामाणिकता, सूक्ष्मता और भावात्मक तरलता के साथ वाणी दी है, वह इस रचना को मात्र एक अकादमिक विमर्श से उठाकर एक जीवंत और करुण दस्तावेज़ बना देती है। वैयक्तिक अनुभूति को समष्टिगत यथार्थ में ढालने की यह क्षमता ही इस गीत को श्रेष्ठ साहित्य की कोटि में स्थापित करती है। यह रचना शिल्प, संवेदना और दार्शनिक प्रश्न- तीनों ही स्तरों पर पूर्णतः सफल है।
वीर और करुण रस के पश्चात यह कृति शृंगार रस के माधुर्य की ओर मुड़ती है। 'मौन विजय और समर्पण के क्षण' नामक कविता में दाम्पत्य प्रेम और रति भाव का अत्यंत सात्विक और कलात्मक चित्रण हुआ है।
"बर्फ की ठंडक मिली थी आग को कल,
नीर बनकर शक्ति सारी ढल रही थी।।"
यहाँ पुरुष के पौरुष (आग) और स्त्री की कोमलता (बर्फ) के मिलन का जो मनोवैज्ञानिक और शारीरिक बिंब गढ़ा गया है, वह अद्भुत है। विरोधाभास अलंकार के माध्यम से प्रेम की विजय को दर्शाया गया है जहाँ विजेता स्वयं को हारकर जीतता है। इसी शृंखला में 'प्रेयसी का प्रणय निवेदन' और 'तूलिका लौटा दो' में नायक और नायिका के मध्य का संवाद शृंगारिक चंचलता से परिपूर्ण है।
"सौत-सी तूलिका, दूर फेंको इसे।
चाहते तुम कहो, आज ज्यादा किसे?"।
यहाँ लेखनी को 'सौत' कहना पुरानी साहित्यिक रूढ़ि अवश्य है, परंतु इसे जिस प्रवाहमयी शैली में प्रस्तुत किया गया है, वह हृदय को गुदगुदाता है। आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो शृंगारिक कविताओं में कवि का शब्द-चयन कुछ स्थानों पर पारंपरिक और अति-परिचित हो गया है, जहाँ नए प्रतीकों की दरकार थी।
भक्ति और अध्यात्म के धरातल पर भी कवि की लेखनी अबाध गति से चली है। 'राधे-राधे' कविता में स्रग्विणी छंद का निर्वाह करते हुए कवि ने कृष्ण और राधा के शाश्वत प्रेम को उकेरा है।
"ढूँढ़ता हूँ तुम्हें, कुंज में राधिके।
क्यों छिपी वृक्ष की, ओट में साधिके।।"
माधुर्य गुण से ओतप्रोत यह रचना भक्तिकाल की रागात्मक वृत्ति की याद दिलाती है।
इस संग्रह का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और चौंकाने वाला पक्ष इसका शृंगारिक काव्य है। सामान्यतः हिंदी कविता में 'राधा' का प्रयोग एक पौराणिक, आध्यात्मिक या मिथकीय नायिका के रूप में होता आया है, परंतु इस कृति के मूल्यांकन में यह तथ्य एक नया आयाम जोड़ता है कि यहाँ 'राधा' या 'राधिके' मात्र कवि की कोरी कल्पना नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक प्रेयसी और पत्नी का नाम है। इस सत्य के अनावृत्त होते ही 'अर्णिका' की संपूर्ण शृंगारिक कविताओं का अर्थ-गांभीर्य और आत्मीयता सहस्र गुना बढ़ जाती है। यह अब केवल भक्त और भगवान या नायक-नायिका का पारंपरिक विलास नहीं, बल्कि एक पति-पत्नी के मध्य का अत्यंत जीवंत, रागात्मक और दाम्पत्य-संवाद बन जाता है। कविता 'प्रेयसी का प्रणय निवेदन' और 'तूलिका लौटा दो' इसी वैवाहिक और रागात्मक जीवन के मर्मस्पर्शी चित्र हैं। नायिका (राधा) कवि से उसकी साहित्यिक साधना छोड़कर प्रेम करने का मनुहार करती है-
"सौत-सी तूलिका, दूर फेंको इसे।
चाहते तुम कहो, आज ज्यादा किसे?"
अपनी पत्नी के मुख से लेखनी को 'सौत' कहलवाना दाम्पत्य जीवन की उस मधुर ईर्ष्या को प्रकट करता है जहाँ नायिका अपने पति के समय और ध्यान पर पूर्ण एकाधिकार चाहती है। इसके प्रत्युत्तर में 'तूलिका लौटा दो' में कवि-पति अत्यंत शालीनता से कहता है-
"राधिके!, तूलिका, शीघ्र ही, दीजिये।
व्यर्थ की, यह हँसी, बंद अब, कीजिये।।"
यहाँ 'राधिके' संबोधन में जो आत्मीयता और अधिकार है, वह इस बात को प्रमाणित करता है कि यह किसी कल्पित नायिका से नहीं, बल्कि घर के आँगन में उपस्थित अपनी अर्धांगिनी से किया गया संवाद है। इसी शृंखला में 'राधे-राधे' कविता लौकिक दाम्पत्य और अलौकिक प्रेम का एक सुंदर मणिकांचन योग प्रस्तुत करती है। कवि लिखता है-
"ढूँढ़ता हूँ तुम्हें, कुंज में राधिके।
क्यों छिपी वृक्ष की, ओट में साधिके।।"
और
"राधिका नाम ही, श्वास में है बसा।
प्रेम की रीत में, खो गया साँवरा॥"
यदि हम राधा को केवल पत्नी मानें, तो इन पंक्तियों में पति का अपनी पत्नी के प्रति अगाध समर्पण और प्रेम दृष्टिगोचर होता है। यहाँ 'कुंज' घर के उस एकांत का प्रतीक बन जाता है जहाँ दो प्रेमी युगल अपनी क्रीड़ाओं में मग्न हैं। 'शृंगार-समर्पण' कविता में पति अपनी पत्नी (राधा) के सौंदर्य को और निखारने की कामना करता है-
"सुनो राधिके ! लाकर दूँगा, मैं सोलह श्रृंगार॥"
इस कविता में आभूषणों (नासा-नथ, बाजूबंद, बिछिया) का अत्यंत सूक्ष्म और चित्रात्मक वर्णन है जो शृंगार रस के उद्दीपन विभाव को पुष्ट करता है। आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो, इन कविताओं में यद्यपि अनुभूति की प्रामाणिकता निर्विवाद है, परंतु कवि ने अपनी वास्तविक पत्नी के लिए भी जिन उपमानों (कुंज, साँवरा, वंशी) का चयन किया है, वे रीतिकालीन रूढ़ियों से अत्यधिक प्रभावित हैं। यदि कवि अपनी समसामयिक पत्नी 'राधा' के लिए कुछ नूतन और आधुनिक बिंबों का सृजन करता, तो यह दाम्पत्य-काव्य आधुनिक हिंदी कविता में एक अलग ही प्रतिमान स्थापित कर सकता था।
इसी प्रकार 'चेतन-चंदन' नामक दार्शनिक रचना में वेदांत का सार प्रस्तुत किया गया है-
"सत्य सनातन जीवन हो पर, न माया का बंधन होता।
न व्यर्थ भटकता मन-तृष्णा में, स्थिर चेतन चंदन होता।"
यहाँ जीवन की क्षणभंगुरता और ईश्वर की सर्वव्यापकता का बोध कराया गया है।
प्रकृति-चित्रण के अंतर्गत 'नव ऋतु का है हुआ आगमन' एक अत्यंत जीवंत और चित्रात्मक कविता है।
"सरसों की पीली चादर, लहराती है खेतों में,
अमराई की डाल-डाल, पर बौर खिले पत्तों में"
यहाँ मानवीकरण और दृश्य-बिंब का सुंदर प्रयोग है। प्रकृति के इसी यथार्थ से जुड़ी अगली रचना 'अन्नदाता' है, जिसमें कृषक के श्रम और उसके शोषण का मार्मिक चित्रण है।
"चीर धरा का सीना देखो, कोई अन्न उगाता है।
श्रमजल से सिंचित सपनों पर, सबकी भूख मिटाता है॥"
'श्रमजल' (पसीना) को सपनों को सींचने वाला तत्व बताना कवि की गहरी सामाजिक दृष्टि का परिचायक है। यद्यपि इसका कथ्य प्रगतिशील है, परंतु "ऊँची कुर्सी वाले पूँछें" जैसी पंक्तियों में कविता का कलात्मक स्तर कुछ नीचे आ जाता है और यह पत्रकारिता की भाषा के निकट प्रतीत होने लगती है।
कवि की व्यंग्यात्मक दृष्टि इस संग्रह को एक विशेष तीक्ष्णता प्रदान करती है। 'काव्य-त्रास (त्राहिमाम)' वर्तमान सोशल मीडिया युग के उस साहित्यिक प्रदूषण पर करारा प्रहार है, जहाँ हर व्यक्ति स्वयं को महाकवि मान बैठा है।
"नमन-निवेदन, ना ही परिचय, सीधा वज्र-प्रहार किया,
बाँध शिला में काव्य-कल्पना, कैसा यह व्यवहार किया?"
यहाँ नवोदित काव्यातुरों द्वारा बिना परिचय कविताएँ भेजने की प्रवृत्ति पर 'बलात्काव्य' जैसे तीखे शब्दों का प्रयोग किया गया है। व्यंग्य अत्यंत मारक है, परंतु 'कर्ण-नितंबों' और 'काव्य-स्खलन' जैसे शब्दों का प्रयोग कुछ पाठकों को भाषाई मर्यादा के दृष्टिकोण से खटक सकता है। इसी प्रकार 'छद्म-जगत की न्याय-प्रणाली' में कवि ने समसामयिक राजनीति, तुष्टिकरण और छद्म-धर्मनिरपेक्षता पर निर्भीक टिप्पणी की है।
"लाख हलाला करके भी वो, शुद्ध-विमल जग में कहलाता।
किंचित मुद्रा लेकर देखो, विप्र कलंकित ही हो जाता।।"
यह कविता वर्तमान विसंगतियों पर सीधा प्रहार करती है, परंतु कविता के नाम पर यह विशुद्ध राजनीतिक वक्तव्य अधिक प्रतीत होती है। एक आलोचक के नाते यह कहना आवश्यक है कि साहित्य में यथार्थ का चित्रण होना चाहिए, परंतु जब वह पूर्णतः विचारधारा के अधीन हो जाए, तो कविता अपनी सार्वभौमिकता खोने लगती है।
काव्य-संग्रह के अंतिम चरण में 'उठो पार्थ! गांडीव तान लो' जैसी रचनाएँ पुनः वीर रस और राष्ट्रीय जागरण का शंखनाद करती हैं।
"उठो पार्थ! गांडीव तान लो, गूंजे भीषण धनु-टंकार।
कायरता का त्याग करो तुम, बहे शत्रु की रक्त-धार।।"
महाभारत के मिथक का प्रयोग कर समकालीन अकर्मण्यता को तोड़ने का यह प्रयास भाषाई दृष्टि से अत्यंत ओजपूर्ण है।
'अर्णिका' निश्चय ही समकालीन हिंदी साहित्य में एक सार्थक और विचारोत्तेजक हस्तक्षेप है। इस कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आचार्य प्रताप ने छंदों के कड़े अनुशासन में रहकर भी भाषा की तरलता और संप्रेषणीयता को बाधित नहीं होने दिया है। कवि के पास विषयों की अद्भुत विविधता है; एक ओर वह शृंगार के अत्यंत सुकोमल चित्र उकेरता है, तो दूसरी ओर व्यवस्था पर तीखे व्यंग्य बाण छोड़ता है। राष्ट्रीय चेतना और स्त्री-विमर्श की कविताओं में कवि का सामाजिक सरोकार अत्यंत मुखर होकर सामने आया है।
परंतु, एक निष्पक्ष समालोचक के रूप में मुझे इस संग्रह की कुछ सीमाओं को भी रेखांकित करना होगा। कई कविताओं में भावों का दोहराव है। वीर रस की कविताओं में कई स्थानों पर शब्द-चयन काव्यात्मकता को छोड़कर अति-आक्रामक और सपाटबयानी का शिकार हो गया है, जिससे कविता का लाक्षणिक और व्यंजना सौंदर्य क्षीण हुआ है। इसके अतिरिक्त, शृंगारिक कविताओं में नवीन बिंबों के स्थान पर पूर्व-स्थापित पारंपरिक उपमानों (जैसे- तूलिका, कुंज, भ्रमर, चाँद) का अधिक सहारा लिया गया है, जिससे आधुनिकता के इस दौर में वे कुछ रूढ़िबद्ध प्रतीत होते हैं।
अंत में यह कह सकती हूँ कि 'अर्णिका' भावों की सघनता, मानवीय संवेदनाओं की गहराई और शिल्प की प्रौढ़ता का एक सुंदर समन्वय है। आचार्य प्रताप ने इस संग्रह के माध्यम से यह प्रमाणित किया है कि वे केवल शब्दों के शिल्पी नहीं हैं, अपितु समाज की धड़कन को पहचानने वाले एक सजग रचनाकार भी हैं। यह कृति न केवल साहित्य-प्रेमियों और छंद-साधकों के लिए पठनीय है, बल्कि समकालीन विमर्शों को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ भी है। हिंदी काव्य-परंपरा को समृद्ध करने की दिशा में आचार्य प्रताप का यह प्रयास सर्वथा स्तुत्य और अभिनंदनीय है।