शबरी अक्टूबर २०२६

‘शबरी’ (अक्टूबर 2026 अंक)

समीक्षक: एक समग्र एवं निष्पक्ष साहित्यिक मूल्यांकन
भारतीय वांग्मय और सांस्कृतिक चेतना में ‘शबरी’ का नाम केवल एक पौराणिक आख्यान मात्र नहीं, बल्कि वह अनन्य प्रतीक्षा, निष्काम साधना और आंतरिक समर्पण की ऐसी पराकाष्ठा है जो युगों-युगों तक मानवता को दिशा दिखाती रही है। जिस प्रकार दंडकारण्य के बीहड़ एकांत में शबरी ने वर्षों तक नित्य कांटों को बुहारते हुए और मीठे बेरों को सहेजते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की प्रतीक्षा की थी, ठीक उसी वैचारिक और आत्मिक धरातल पर साहित्य जगत में पत्रिका ‘शबरी’ का यह अक्टूबर 2026 अंक अपने नाम को पूर्ण सार्थकता प्रदान करता है। आज के इस आपाधापी भरे युग में, जहाँ व्यावसायिकता और अल्पकालिक प्रसिद्धि की होड़ ने गंभीर साहित्यिक पत्रकारिता के मूल स्वरूप को संकुचित कर दिया है, ‘शबरी’ का यह नवीन अंक अपने गंभीर चिंतन, सुरुचिपूर्ण कलेवर और उदात्त मानवीय सरोकारों के बल पर एक विशिष्ट और अनिवार्य उपस्थिति दर्ज कराता है। यह अंक मात्र पन्नों और रचनाओं का संकलन नहीं, बल्कि एक युगधर्म का निर्वहन करता हुआ शब्द-यज्ञ प्रतीत होता है।

इस पत्रिका और इसके वर्तमान अंक का सबसे मार्मिक, ऐतिहासिक और विचारणीय पक्ष इसकी असाधारण भौगोलिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है। दक्षिण भारत के उस प्रांत में, जहाँ भाषाई राजनीति और तमिल अस्मिता की प्रचंड आँधियाँ दशकों से इस कदर उग्र रही हैं कि वे हिंदी के दीपक की लौ तो दूर, उसे टिमटिमाते हुए भी नहीं देखना चाहते, वहाँ इस पत्रिका के माध्यम से हिंदी की अखंड ज्योति प्रज्वलित रखना किसी भगीरथ प्रयास से कम नहीं है। तमिलनाडु की पुण्यभूमि अपनी सहस्राब्दियों पुरानी संगम-परंपरा, विपुल ज्ञानराशि और गौरवमयी भाषा के लिए निसंदेह वंदनीय है, किंतु दुर्भाग्यवश क्षेत्रीय संकीर्णताओं और राजनीतिक दुराग्रहों के चलते वहाँ हिंदी के विरुद्ध जो आक्रामक और दुर्भेद्य दीवारें खड़ी की गईं, उसने राष्ट्र की दो महान सांस्कृतिक धाराओं के बीच एक अस्वाभाविक वैमनस्य की खाई पैदा कर दी। ऐसे प्रतिकूल और संवेदनशील वातावरण में, जहाँ हिंदी का सामान्य उच्चारण भी प्रायः तीखे प्रतिरोध का कारण बन जाता है, वहाँ हिंदी भाषा और साहित्य की एक गरिमामयी पत्रिका को निरंतर संजोना, उसका संपादन-प्रकाशन करना और उसे पाठकों तक पहुँचाना असीम नैतिक बल, अदम्य साहस और एक तपस्वी जैसी निष्ठा की मांग करता है।
‘शबरी’ के इस अंक के पृष्ठों से गुजरते हुए यह तथ्य स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि संपादक मंडल ने संकीर्णता और विद्वेष का उत्तर कभी कटुता से नहीं, बल्कि उदारता, सहिष्णुता और उच्च कोटि के साहित्यिक विमर्श से दिया है। यह पत्रिका उस भाषाई आँधी के सम्मुख एक ऐसे सुदृढ़ दीपस्तंभ की भाँति अडिग खड़ी है, जो बिना किसी कंपकंपाहट के अपनी रश्मियां बिखेर रहा है। यह इस शाश्वत सत्य को पुनर्स्थापित करता है कि साहित्य भूगोल की सीमाओं और राजनीतिक नारों से कहीं अधिक व्यापक होता है; वह सीधे आत्मा से संवाद करता है। दक्षिण के इस अंचल में हिंदी का यह दीपस्तंभ केवल एक भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि यह संपूर्ण भारत की सांस्कृतिक अखंडता, राष्ट्रीय चेतना और भावनात्मक एकात्मता की प्राणवायु बनकर स्पंदित हो रहा है।
अक्टूबर 2026 अंक की संपादकीय दृष्टि अत्यंत प्रौढ़, संतुलित और युगबोध से संपृक्त है। संपादकीय आलेख में संपादक ने भाषा को किसी भी प्रकार के प्रभुत्व अथवा संघर्ष का अस्त्र मानने के बजाय उसे परस्पर आत्मीयता, संवाद और समरसता का परम माध्यम स्वीकार किया है। यह संपादकीय दक्षिण और उत्तर के सांस्कृतिक अंतर्संबंधों को सुदृढ़ करने का आह्वान करता है और यह सिद्ध करता है कि अपनी मातृभाषा के प्रति अटूट प्रेम का अर्थ दूसरी समृद्ध भाषा के प्रति घृणा कदापि नहीं हो सकता। विचार जब निष्कपट हृदय और सौहार्द की कोख से जन्म लेते हैं, तो वे प्रांतीय संकीर्णताओं की हर चट्टान को पिघलाने का सामर्थ्य रखते हैं, और यही इस अंक का मुख्य वैचारिक स्वर है।
काव्य-पक्ष की दृष्टि से विचार करें तो पत्रिका का यह अंक अत्यंत समृद्ध और बहुरंगी है। इसमें पारंपरिक छंदबद्धता के अनुशासन से लेकर समकालीन भावबोध की मुक्त रचनाओं का ऐसा संतुलित समन्वय है जो पाठक के अंतस को झंकृत करता है। कविताओं में व्यक्तिगत अनुभूतियों, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना और स्वाभिमान का ओजस्वी स्वर भी अनुस्यूत है। गीतों और मुक्तकों में प्रयुक्त बिंब-विधान अत्यंत ताज़ा और सहज हैं। कई रचनाओं में प्रतीक्षा, विस्थापन, मातृभूमि और भाषा-प्रेम को शबरी के रूपक के माध्यम से जिस कारुणिक और उदात्त शैली में प्रस्तुत किया गया है, वह सीधे मर्म का स्पर्श करता है।
पत्रिका का गद्य-खंड भी अपनी वैचारिक गहराई और अकादमिक गरिमा के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करता है। इस अंक में संकलित निबंध और शोधपरक आलेख सतही चर्चाओं से परे जाकर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करते हैं। विशेष रूप से संत तिरुवल्लुवर के ‘तिरुक्कुरल’ और उत्तर भारत के कबीर, तुलसी तथा सूर के भक्ति-दर्शन के अंतर्संबंधों पर केंद्रित तुलनात्मक अध्ययन अत्यंत श्लाघनीय और संग्रहणीय बन पड़ा है। यह विवेचन इस सत्य को अकाट्य रूप से प्रमाणित करता है कि दक्षिण के भक्ति आंदोलन और उत्तर के संत साहित्य की आत्मा एक ही मूल स्रोत से प्रस्फुटित हुई है। इसके साथ ही, अनुवाद की महत्ता और भारतीय भाषाओं के पारस्परिक संवाद पर प्रकाशित आलेख यह दर्शाते हैं कि साहित्यिक आदान-प्रदान ही भाषाई संकीर्णता की एकमात्र अचूक औषधि है।
कथा-साहित्य और संस्मरण के धरातल पर भी यह अंक अत्यंत जीवंत प्रतीत होता है। कहानियों में दक्षिण भारत के लोकजीवन, वहाँ के ग्रामीण परिवेश, मानवीय द्वंद्व और सांस्कृतिक महक को हिंदी की प्रांजल शब्दावली में बहुत सजीव ढंग से उकेरा गया है। संस्मरण खंड तो पाठक की आँखें नम कर देने वाला है, जहाँ अहिन्दी भाषी अंचल में हिंदी सिखाने, बोलने और प्रचारित करने के दौरान झेले गए सामाजिक उपहास, अनगिनत संघर्षों और अंततः भाषा के प्रति उपजे अनुराग की सत्य घटनाओं को अत्यंत निश्छल भाव से लिपिबद्ध किया गया है। यह आख्यान केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं, बल्कि दक्षिण में हिंदी के अस्तित्व का मूक इतिहास बयान करता है।
भाषा-शिल्प और संप्रेषणीयता के निकष पर परखें तो ‘शबरी’ की भाषा अपनी प्रांजलता, गरिमा और सहज प्रवाह के कारण अद्वितीय है। इसमें संस्कृतनिष्ठ तत्सम पदावली का औचित्यपूर्ण सौंदर्य तो है ही, साथ ही बोलचाल की सुबोधता भी सुरक्षित है, जिससे भाव-संप्रेषण में कहीं भी अवरोध नहीं आता। वाक्य-विन्यास सुगठित हैं और विचारों में अद्भुत तारतम्यता देखने को मिलती है। इसके अतिरिक्त, पत्रिका का बाह्य कलेवर, आवरण पृष्ठ की सौम्यता, सुरुचिपूर्ण लेआउट और शुद्ध मुद्रण इसके संपादकीय कौशल और कलात्मक दृष्टि की गवाही देते हैं।

पत्रिका के अंतिम पृष्ठों में देववाणी संस्कृत को ससम्मान स्थान देना संपादक मंडल की अद्भुत दूरदर्शिता, उदात्त सांस्कृतिक निष्ठा और मौलिक दृष्टि का परिचायक है। जहाँ आधुनिक युग में साहित्यिक पत्रिकाएँ प्राचीन भाषाओं से विमुख हो रही हैं, वहीं दक्षिण भारत की इस चुनौतीपूर्ण पृष्ठभूमि में संस्कृत के श्लोकों, सूक्तियों और सारगर्भित रचनाओं का यह समावेश पत्रिका की गरिमा में चार चाँद लगा देता है। यह अभिनव प्रयास न केवल भारतीय वांग्मय के मूल उत्स को संजोता है, बल्कि यह भी स्थापित करता है कि संस्कृत ही भारत की समस्त भाषाओं की जननी और अखंड सांस्कृतिक चेतना का मूल आधार है। इस पावन समावेश के लिए संपादक मंडल निसंदेह साधुवाद और भूरि-भूरि प्रशंसा का पात्र है।


समग्रतः, साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास में ऐसे प्रयास सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित होते हैं जो प्रतिकूल परिस्थितियों के सम्मुख नतमस्तक होने के बजाय अपनी निष्ठा से नया इतिहास रचते हैं। ‘शबरी’ का यह अंक केवल एक पत्रिका का प्रकाशन नहीं, बल्कि प्रतिकूलताओं के बीच प्रज्वलित एक सांस्कृतिक और साहित्यिक महाक्रांति है। जहाँ विरोध की आँधियाँ भीषण हों और हिंदी को मिटाने की चेष्टाएँ प्रबल रही हों, वहाँ यह पत्रिका यह उद्घोष करती है कि निष्काम साधना और सत्यनिष्ठ प्रेम के समक्ष कोई भी अवरोध टिक नहीं सकता। संपादक, रचनाकार और इस संकल्प के समस्त पुरोधा इस अद्वितीय, साहसिक और ऐतिहासिक साहित्यिक अवदान के लिए हार्दिक साधुवाद के पात्र हैं। यह अंक समकालीन हिंदी पत्रकारिता के क्षितिज पर एक जाज्वल्यमान मील का पत्थर सिद्ध होगा।


-आचार्य प्रताप
Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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