विकास की तस्वीर और तस्वीरों का विकास
गाँव का विकास अब पहले जैसा नहीं रहा कि कोई सड़क बन जाए, नाली बहने लगे, पानी की टंकी साफ हो जाए और लोग कहें कि कुछ काम हुआ है। अब विकास के भी नए मानदण्ड बन गए हैं। कहीं विकास का प्रमाण चित्रों में मिलता है, कहीं उद्घाटन के पत्थरों में और कहीं किसी जनप्रतिनिधि के प्रशंसात्मक कथन में। धरातल पर विकास दिखाई न दे, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं; दूरभाष के पर्दे पर उसका चित्र देखकर मन बहलाया जा सकता है। आखिर आँखों को भी तो कुछ चाहिए!
कोटर में भी विकास की अपनी एक अनूठी यात्रा चल रही है। इस यात्रा का एक पड़ाव है जनसंवाद का मंच, जहाँ जनता, जनप्रतिनिधि और प्रशासन एक-दूसरे से संवाद करते हैं। मंच का नाम विकास का है, इसलिए स्वाभाविक है कि वहाँ विकास की चर्चा होनी चाहिए। किंतु कभी-कभी चर्चा की गाड़ी ऐसी पटरी पर चढ़ जाती है कि कन्या भोज से चलकर सड़क की दुर्दशा तक पहुँचती है, मंदिर से घूमती हुई भूमि के अधिकार पर आती है और अंततः नगर परिषद की कार्यशैली के दरवाजे पर खड़ी होकर पूछती है—“भैया, भीतर कोई है भी या सब विकास करने गए हैं?”
प्रारम्भ कन्या भोज से हुआ। इक्यावन कन्याओं को भोजन कराने का पुण्यकार्य हुआ। यह अपने आप में सराहनीय है। कन्या में देवी का रूप देखने वाली हमारी संस्कृति में बालिकाओं को भोजन कराना श्रद्धा और सेवा का प्रतीक रहा है। किंतु जब इस कार्य के चित्र माँगे गए, तब श्रद्धा के साथ प्रमाण की आवश्यकता भी जुड़ गई। चित्र आए, तो उन पर प्रश्न उठे कि ये उसी आयोजन के हैं अथवा किसी अन्य स्थान के। बस, फिर क्या था! पुण्य के साथ प्रमाण की परीक्षा भी आरम्भ हो गई।
आजकल सेवा करने से अधिक कठिन काम सेवा का प्रमाण देना है। किसी भूखे को भोजन करा दीजिए, फिर यह सिद्ध करने के लिए चित्र सँभालिए कि भोजन वास्तव में कराया गया था। किसी निर्धन की सहायता कर दीजिए, तो उसकी सहायता का विवरण प्रस्तुत कीजिए। ऐसा समय आ गया है कि यदि कोई व्यक्ति चुपचाप परोपकार कर दे, तो समाज को संदेह होने लगता है कि अवश्य कुछ छिपा रहा होगा। मानो पुण्य भी अब बिना प्रमाणपत्र के मान्य नहीं है।
परंतु एक प्रश्न यहाँ भी है। यदि धार्मिक आयोजन के चित्रों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाना उचित है, तो विकास के चित्रों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाना उससे कम उचित कैसे हो सकता है? कन्या भोज में भोजन परोसा गया या नहीं, इसका प्रमाण चाहिए; तो वार्ड की सड़क बनी या नहीं, उसका प्रमाण क्यों नहीं? वहाँ कन्याओं की संख्या गिनी जा सकती है, तो यहाँ निर्मित नालियों और सुधरी सड़कों की संख्या क्यों नहीं गिनी जा सकती? धर्म के कार्य में पारदर्शिता होनी चाहिए और जनकार्य में तो उससे भी अधिक।
यहीं से जनसंवाद की असली परीक्षा आरम्भ होती है। वार्ड की सड़क टूटी पड़ी है, पगडंडी की दशा दयनीय है और नागरिक सुविधाएँ अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही हैं। जनता पूछती है कि विकास कहाँ हुआ। उत्तर में यदि पुराने कार्यों की सूची प्रस्तुत कर दी जाए, तो प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता। किसान को यह बताने से खेत नहीं सींचा जा सकता कि पिछले वर्ष नहर का उद्घाटन हुआ था। उसे तो खेत तक पानी चाहिए। उसी प्रकार नागरिक को विकास की घोषणा नहीं, उसका परिणाम चाहिए।
कोटर के बस अड्डे के विस्तार, भूमि भराव और ऊँचाई बढ़ाने जैसे कार्यों का उल्लेख भी चर्चा में आया। यह उचित है कि हुए कार्यों का मूल्यांकन किया जाए। किंतु किसी एक स्थान पर हुआ विकास दूसरे स्थान की उपेक्षा का स्थायी प्रमाणपत्र नहीं बन सकता। यदि मुख्य मार्ग सँवर गया, तो भीतर की गली को यह कहकर नहीं समझाया जा सकता कि तुम्हारे नगर का चेहरा तो चमक रहा है। घर का मुखमंडप चमकता रहे और पिछवाड़े में कीचड़ भरा हो, तो गृहस्वामी की प्रतिष्ठा अधिक समय तक नहीं टिकती।
फिर मंदिर और निजी भूमि का प्रश्न उठा। यहाँ राजनीति, आस्था, भूमि के अधिकार और सामाजिक संबंधों की उलझी हुई गाँठ सामने आती है। नगर के बड़े भाग में नियम लागू करना सरल हो सकता है, पर गाँव में प्रत्येक भूमि के साथ स्मृतियाँ जुड़ी होती हैं। कहीं पुरखों की निशानी है, कहीं दान की भूमि, कहीं देवस्थान और कहीं पीढ़ियों से चला आता अधिकार। ऐसे में प्रशासनिक निर्णय केवल डंडे की लंबाई से नहीं, विवेक की गहराई से होने चाहिए।
यह भी सत्य है कि गाँव में सब एक-दूसरे को जानते हैं। आज जिस घर के सामने अधिकारी खड़ा है, कल उसी घर का व्यक्ति किसी सामाजिक कार्य में उसके साथ बैठा हो सकता है। यहाँ संबंधों की डोर मोटी होती है, किंतु कभी-कभी उसी डोर में नियमों की गाँठ फँस जाती है। भाईचारा बना रहे, यह आवश्यक है; पर भाईचारे के नाम पर नियमों को विश्राम दे देना उचित नहीं। न्याय ऐसा हो जो किसी के प्रति कठोर पक्षपात न करे और किसी के प्रति मधुर अन्याय भी न करे।
बघेली में कहें तो, “गाँव मा सबके नाता-ग्वाता रहत हय, पर नियम के नाता सबके साथ बराबर रहँय के चाही।” अन्यथा प्रभावशाली व्यक्ति के लिए नियम मोम बन जाएँगे और साधारण नागरिक के लिए पत्थर। यही वह स्थिति है जहाँ प्रशासन की निष्पक्षता की वास्तविक परीक्षा होती है।
अब आइए नगर परिषद की कार्यशैली पर। चर्चा में आरोप लगाए गए कि बड़े विकास कार्यों में गति धीमी रहती है, लेकिन नागरिक अपने खेत में कुछ बना ले, भूमि की सीमा सुधार ले, नाली साफ कर ले अथवा अपने शौचालय की सफाई करने लगे, तो रोकने वाले शीघ्र पहुँच जाते हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है, किंतु यदि अनुभव यही है, तो नागरिक के मन में उठने वाला प्रश्न स्वाभाविक है—जिस व्यवस्था को मेरी समस्या दूर करने में समय लगता है, उसे मेरे काम में बाधा डालने की इतनी शीघ्रता कहाँ से मिल जाती है?
ऐसा लगता है मानो प्रशासन के पास दो प्रकार के घोड़े हैं। एक विकास के लिए है, जो वर्षों से चारा खाकर भी धीरे चलता है; दूसरा रोक लगाने के लिए है, जो सीटी बजते ही दौड़ पड़ता है। पहला नागरिक की समस्या तक पहुँचते-पहुँचते थक जाता है, दूसरा नागरिक के दरवाजे पर पहुँचकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता है।
आवास योजनाओं की फाइलों को अनावश्यक रूप से लटकाए रखने और धन लेकर काम आगे बढ़ाने के आरोप भी गंभीर हैं। आरोप सत्य हैं या असत्य, इसका निर्णय जाँच और प्रमाण से होना चाहिए। किंतु यह स्थिति अपने आप में चिंताजनक है कि नागरिक को सरकारी सुविधा पाने के लिए बार-बार चक्कर लगाने पड़ें और उसके मन में यह शंका घर कर जाए कि बिना अनुचित भुगतान के काम नहीं होगा। सरकारी योजना का उद्देश्य निर्धन के घर तक सहायता पहुँचाना है, न कि उसकी विवशता को किसी की अतिरिक्त आय का साधन बनाना।
कल्पना कीजिए, गाँव का एक वृद्ध अपनी आवास योजना की जानकारी लेने कार्यालय पहुँचता है। वह पूछता है, “महाराज, हमार घर कब बनी?”
उत्तर मिलता है, “प्रक्रिया चल रही है।”
वृद्ध लौट आता है। कुछ दिन बाद फिर पहुँचता है। वही उत्तर मिलता है। तीसरी बार जाता है, तो बताया जाता है कि कागज पूरे नहीं हैं। वह घर लौटकर अपने पुराने संदूक से कागज निकालता है, उन्हें सँभालता है और फिर उपस्थित हो जाता है। इस बार उसे बताया जाता है कि अधिकारी उपलब्ध नहीं हैं।
वृद्ध सोचता है कि घर तो बाद में बनेगा, पहले मुझे कार्यालय में आने-जाने के लिए एक अलग मकान बनवा लेना चाहिए। कम से कम विश्राम तो कर सकूँगा!
व्यंग्य यहीं जन्म लेता है। वह किसी कर्मचारी की वेशभूषा पर नहीं, ऐसी व्यवस्था पर हँसता है जिसमें नागरिक का समय सस्ता और कार्यालय का समय अमूल्य हो जाता है।
जनसंवाद के ऐसे मंचों का महत्त्व इसी कारण है। वे जनता को प्रश्न पूछने का अवसर देते हैं। किंतु प्रश्न पूछना तभी सार्थक होगा, जब प्रश्नों का उत्तर भी मिले। केवल आरोपों से व्यवस्था नहीं सुधरती और केवल प्रशंसाओं से व्यवस्था निर्दोष नहीं हो जाती। आरोपों की जाँच हो, कार्यों का विवरण सामने आए, उत्तरदायित्व निश्चित हो और शिकायतों के निवारण की समय-सीमा तय हो। मंच पर उठी आवाज को कार्यवाही तक पहुँचाना ही संवाद की सफलता है।
जनप्रतिनिधियों को भी समझना चाहिए कि जनता का प्रश्न विरोध का प्रमाण नहीं होता। कई बार वही प्रश्न विकास का सबसे सच्चा मार्गदर्शक बन जाता है। जो नागरिक टूटी सड़क दिखाता है, वह नगर का शत्रु नहीं; वह उस कमी की ओर संकेत कर रहा है जिसे दूर करना जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है। और जो व्यक्ति अच्छे कार्य की प्रशंसा करता है, वह भी आवश्यक है, क्योंकि निरन्तर दोष-दर्शन से सुधार की प्रेरणा क्षीण पड़ सकती है। प्रशंसा और आलोचना, दोनों का स्थान है; किंतु दोनों का आधार सत्य होना चाहिए।
अंततः कोटर को यह निर्णय करना है कि उसका जनसंवाद मंच चित्रों का संग्रहालय बनेगा या जनहित का कार्यस्थल। कन्या भोज की पवित्रता बनी रहे, मंदिर की गरिमा सुरक्षित रहे, भूमि के अधिकारों का सम्मान हो और विकास के कार्य समय पर पूरे हों—इनमें कोई विरोध नहीं है। विरोध तब उत्पन्न होता है, जब किसी एक विषय की आड़ लेकर दूसरे विषय को दबा दिया जाता है।
सड़क को सड़क चाहिए, नाली को सफाई चाहिए, निर्धन को आवास चाहिए और नागरिक को सम्मानपूर्वक उत्तर चाहिए। इन आवश्यकताओं का कोई विकल्प नहीं हो सकता।
क्योंकि नगर का विकास उस दिन नहीं होता, जिस दिन उसकी प्रशंसा में संदेश लिखे जाते हैं। विकास उस दिन होता है, जिस दिन किसी वृद्ध को अपने घर की छत के लिए कार्यालय के चक्कर नहीं लगाने पड़ते, किसी बच्चे को विद्यालय पहुँचने के लिए कीचड़ से नहीं जूझना पड़ता और किसी नागरिक को अपने अधिकार के लिए हाथ जोड़कर खड़ा नहीं होना पड़ता।
तब शायद जनसंवाद मंच पर चित्रों की माँग भी कम हो जाएगी। लोग अपने आसपास के परिवर्तन को देखकर स्वयं कह उठेंगे—“हाँ भैया, अब विकास देखात हय”
और यही वह दिन होगा, जब विकास को सिद्ध करने के लिए चित्रों की नहीं, नागरिकों के संतोष की आवश्यकता होगी।
आचार्य प्रताप
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