हस्ताक्षर की महिमा
फैसला उचित था या अनुचित, यह आज तक स्पष्ट नहीं हुआ। स्पष्ट केवल इतना था कि एक हस्ताक्षर हुआ और दो जीवन अपनी-अपनी दिशा में चल पड़े। एक दिशा में नई नेमपट्ट लग गई, दूसरी दिशा में पुरानी चौखट रह गई।
काश! हस्ताक्षर करने वाले ने एक बार उस कलम को रोककर पूछा होता—“इसके नीचे जो लिखा जा रहा है, उसके ऊपर कितने जीवन लिखे हैं?”
पर कार्यालयों में प्रश्न पूछने से निर्णय देर से होता है और निर्णय देर से हो तो कागजों को अपमान लगता है।
अगले दिन दरवाजे पर नई नेमपट्ट चमक रही थी। देखने वालों ने कहा—“व्यवस्था बदल गई।” मगर चौखट पर टिका पुराना निशान जस का तस था। वह निशान किसी रंगरेज की भूल नहीं, उस घर में बीते जीवन की गवाही था। नेमपट्ट बदलना सरल था; स्मृतियों को हटाने के लिए अभी तक कोई सरकारी आदेश नहीं निकला था।
गाँव का बुधिया काका बोले—“का हो, नाम बदलिगा ,ता का घरव बदलिगा?”
किसी ने उत्तर नहीं दिया। गाँव में लोग ऐसे प्रश्नों का उत्तर नहीं देते, क्योंकि उत्तर देने से अगला प्रश्न जन्म लेता है।
उधर सहायता माँगने के लिए उसने हाथ बढ़ाया। हथेली में कुछ कसकर बंद था। लोग समझे—शायद धन होगा। कोई बोला—“जब हाथ खोलिहा, तबहिन सहायता मिली।”
वह मुस्कराया। बोला—“इसे खोल दिया तो सहायता किसके लिए माँगूँगा?”
मुट्ठी में एक पुरानी चाबी थी—उस घर की, जिसकी नेमपट्ट बदल चुकी थी।
हमारे समय की यही विडंबना है—व्यवस्था हस्ताक्षर से जीवन बदल देती है, नेमपट्ट से संबंध बदल देती है और फिर पूछती है कि व्यक्ति सहायता माँगने में संकोच क्यों करता है।
काश! निर्णय लेने वालों के पास भी कभी एक चौखट होती, जिस पर उनके अपने निर्णयों के निशान टिके रहते।