शीर्षक: बघेली इश्क़, उर्दू इंतज़ार
हैदराबाद के उस सीलन भरे पुराने कमरे में आज भी जब सावन की पहली बारिश होती है, तो हवाओं में चारमीनार की बिरयानी या शहर के धुएँ की महक नहीं, बल्कि बघेलाँचल की सोंधी माटी और लोनी बघेली की गंध तैरने लगती है। समय जैसे उस कमरे की चौखट पर आकर ठहर सा जाता है। लोहे के एक जंग खाए संदूक में कुछ पुरानी फाइलें सहेज कर रखी गई हैं। उन फाइलों में ज़िंदगी के कई हिसाब-किताब हैं, लेकिन उन्हीं पन्नों के बीच दबी है एक गैस कनेक्शन की पुरानी रसीद, जिसकी नीली स्याही वक्त की मार खाकर अब पीली और मटमैली पड़ चुकी है। यह महज़ एक रसीद नहीं है, बल्कि एक मूक प्रेमपत्र है। उस कागज़ के 'नॉमिनी' वाले खाने में दर्ज नाम आज भी चीख-चीख कर एक मुकम्मल अधूरेपन की गवाही देता है—‘अर्शिया’। यह नाम उस स्याही से नहीं, बल्कि एक देहाती मास्टर के दिल के कतरे-कतरे से लिखा गया था।
प्रताप, बघेलाँचल के एक छोटे से गाँव का स्वाभिमानी, भावुक और ठेठ गंवई युवक था। उसकी दुनिया गाँव की उन कच्ची पगडंडियों तक सीमित थी, जिनके किनारे बेशर्म के फूल खिलते थे। आम की अमराइयों में गूँजती कोयल की कूक, बिछिया और तमसा नदी के घाटों पर बजती औरतों की चूड़ियाँ, चौपाल की नीम के नीचे बैठती पंचायत और हाट-बाज़ार की गहमागहमी—यही उसका ब्रह्मांड था। उसके माथे पर पसीने की चमक किसी राजमुकुट सी सजी रहती थी, और आँखों में लोकगीतों की वह गहरी सादगी थी, जो बिना कुछ कहे सब कुछ कह जाती है। प्रताप का जीवन उन कच्चे घरों की तरह था, जहाँ मिट्टी की गंध सीधे रूह में उतरती है और पारिवारिक संस्कार जड़ों की तरह गहरे धंसे होते हैं।
गाँव के स्कूल में वह मास्टरी करता था। एक टूटी हुई कुर्सी, ब्लैकबोर्ड पर चाक की घिसती आवाज़ और शाम ढलने पर लालटेन की पीली रोशनी में बच्चों की कॉपियाँ जाँचना—यही उसकी दिनचर्या थी। लेकिन उसी स्कूल की कच्ची दीवारों के बीच एक ऐसी हवा का झोंका आया, जिसने उस शांत कुएँ के पानी में जीवन भर की लहरें पैदा कर दीं। वह झोंका थी अर्शिया। स्कूल की सबसे चुलबुली, हाज़िर-जवाब, कड़क मिज़ाज और बेबाक छात्रा। अर्शिया किसी नियमों की मोहताज नहीं थी।
अर्शिया की आँखें सावन में उफनती उस पहाड़ी नदी की तरह थीं, जो किसी किनारे की बंदिश नहीं मानती थीं। उसकी आँखों में एक अजीब सी अकुलाहट थी, दुनिया को जान लेने की एक ज़िद। जब वह प्रताप की क्लास में बैठती, तो प्रताप का ध्यान ब्लैकबोर्ड से ज़्यादा उस लड़की की आँखों के सवालों पर भटक जाता।
एक दिन क्लास खत्म होने के बाद, जब बाहर झमाझम बारिश हो रही थी, अर्शिया प्रताप के पास आई। उसकी बड़ी-बड़ी कत्थई आँखें सीधे प्रताप की आँखों में झाँक रही थीं।
"सर, ये बताइए कि नदिया जब समुंदर में मिल जाती हैं, तो उन नदियों का अपना अक्खड़पन कहाँ गुम हो जाता है?" उसने अपनी तीखी आवाज़ में पूछा।
प्रताप, जो हमेशा अपनी मर्यादा के आवरण में लिपटा रहता था, थोड़ा झेंप गया। उसने अपनी गंवई लेकिन सधी हुई आवाज़ में जवाब दिया, "नदिया हेरात नाहिं आय, अर्शिया। ऊँ समुंदर केर खारापन का अपने मीठ-मीठ पानी से सींचैं केर कोसिस करतीं हय। तू जादा सवाल ना करा कर, ई सब बातन मा का रखा है? पढ़ाई मा जादा धियान दे।"
प्रताप उसके लिए केवल एक शिक्षक नहीं था; वह उस अल्हड़, बेकाबू नदी के लिए एक ऐसा घाट था, जहाँ आकर वह ठहरना सीख रही थी। प्रताप उसे केवल किताबें नहीं पढ़ाता था, वह उसे जीवन की वह पक्की और खरी सीख देता था, जो किताबी पन्नों में नहीं मिलती। जब तक वह विद्यालय में रही, प्रताप का स्नेह एक गुरु की मर्यादा में मज़बूती से बँधा रहा। लालटेन की रोशनी में सीखी और सिखाई गई वह मर्यादा बहुत गहरी थी। लेकिन समय का पहिया अपनी धुरी पर घूमता रहा।
प्रताप पढ़ाई और नौकरी के संघर्ष में बघेलाँचल की उस माटी को छोड़ कर, जहाँ उसके पुरखों की जड़ें थीं, हैदराबाद की अजनबी, शोर-शराबे से भरी सड़कों पर आ गया। गाँव की पगडंडियाँ, नदी के घाट, और महुए की महक बहुत पीछे छूट गई। और उधर, अर्शिया ने भी स्कूल की चौखट लांघ कर कॉलेज की सीढ़ियाँ चढ़ लीं।
अक्सर कहा जाता है कि दूरियाँ प्रेम को मिटा देती हैं, लेकिन यहाँ दूरियों ने आग बुझाने के बजाय तेज़ हवा का काम किया। अर्शिया की ज़िद के आगे शहर की दूरियाँ, भूगोल के फासले सब हारने लगे। वह कॉलेज से लौटते ही गाँव के इकलौते एसटीडी बूथ पर जाती और वहाँ से प्रताप को फोन करती। फिर चिट्ठियों और संदेशों (मैसेजेस) के लंबे सिलसिले शुरू हुए। वह प्रताप को तंग करती, छेड़ती, और उस शांत, गंभीर देहाती कुएँ में अपनी शरारतों के कंकड़ मारती रहती, ताकि प्रताप के भीतर की हलचल बाहर आ सके।
"आप वहाँ शहर की भीड़ में खो तो नहीं गए मास्टर जी? मुझे तो यहाँ बघेलाँचल की हवाओं में भी आपका अक्स दिखता है। ऐसा लगता है जैसे पगडंडी पर चलते हुए आपके कदमों की आहट आ रही हो।"
प्रताप, जो अब भी अपनी गंवई झिझक और लोक-लाज में जकड़ा हुआ था, लंबी साँस लेकर कहता, "देखो अर्शिया, या सब ठीक ना होय। हमार-तोहार दुनव केर दुनिया अलग है। तुम आसमान केर चाँद अउर हम माटी केर दिया। चंदा अउर दीया केर कबौ मेल सुने हया?"
लेकिन अर्शिया कहाँ मानने वाली थी। वह हाज़िर-जवाब लड़की तपाक से, बिना एक पल गँवाए कहती, "तो फिर मैं अपना आसमान छोड़ आऊँगी। आसमान में तो वैसे भी बहुत सन्नाटा है। मैं ज़मीन पर उतर आऊँगी, पर जलूँगी तो उसी दीये के साथ। बुझूँगी, तो उसी दीये के साथ।"
उनका प्रेम किसी आधुनिक दिखावे, कॉफी हाउस की मुलाकातों, वैलेंटाइन डे के कार्ड्स या सीधे 'आई लव यू' के इज़हार का मोहताज नहीं था। वह प्रेम नज़रों की अकुलाहट में पलता था। वह मैसेजों के उस अंतहीन इंतज़ार में जीवित था, जहाँ एक 'डिलीवर्ड' का टिक दिल की धड़कनें बढ़ा देता था। यह मौन की वह भाषा थी, जो शब्दों से कहीं ज़्यादा वाचाल थी। उनकी छोटी-छोटी परवाहों में, लोकगीतों के अप्रत्यक्ष संदर्भों में और अनकहे संकेतों में प्रेम अपनी जड़ें गहरी कर रहा था।
यह इश्क़ की वह रूहानी मंज़िल थी, जहाँ मज़हब की दीवारें, समाज की बेड़ियाँ और परंपराओं की बंदिशें धूप में रखी बर्फ की तरह पिघल गई थीं। प्रेम ने दोनों को एक-दूसरे के रंग में पूरी तरह रंग दिया था।
जो अर्शिया उर्दू के लफ़्ज़ों में, शायरी की नज़ाकत में और ग़ज़लों के मिसरों में खेलती थी, उसने प्रताप की ख़ातिर हिंदी का सबसे कठोर और शुद्ध व्याकरण सीख लिया था। उसके मैसेजों में अब अरबी या फ़ारसी के भारी लफ़्ज़ नहीं होते थे, बल्कि 'अश्रु', 'प्रतीक्षा', 'यामिनी', 'हृदयपरिवर्तन' और 'शुभ-अशुभ' जैसे शब्द किसी विरहिणी तपस्विनी की तरह सजने लगे थे। वह अपने प्रेम को प्रताप की भाषा में ही जीना चाहती थी।
और प्रताप? बघेली की ठेठ ज़बान बोलने वाला, खेत की मेड़ पर बैठ कर बैलों की जोड़ी हाँकने वाला, 'का करत हया' और 'कहाँ जात हया' कहने वाला वह सीधा-सादा युवक अब 'नज़ाकत', 'इनायत', 'तबास्सुम', 'माशाल्लाह' और 'फ़िराक़' जैसे लफ़्ज़ों को अपनी साँसों में घोलने लगा था। प्रेम ने एक को हिंदी का पंडित और दूसरे को उर्दू का शायर बना दिया था।
समय ने एक बार फिर करवट ली। एक दिन, नियति ने दोनों को हैदराबाद की धरती पर आमने-सामने खड़ा कर दिया। जब वे बरसों की जुदाई और इंतज़ार के बाद हैदराबाद में मिले, तो ऐसा लगा जैसे सदियों से बह रही दो नदियाँ बिना किसी शोर, बिना किसी बाढ़ के एक शांत संगम में बदल गई हों। कोई शारीरिक आवेग नहीं, कोई उथला प्रदर्शन नहीं। उनके प्रेम में एक अलौकिक, सात्विक पवित्रता थी, जो मंदिर के दीये और मस्जिद की अज़ान जितनी ही मुकम्मल थी।
उसी दौर में गैस कनेक्शन का वह फॉर्म उनके प्रेम और आत्मीयता का सबसे खामोश, सबसे अनोखा और सच्चा प्रमाण बना। परदेस में जब प्रताप ने अपनी छोटी सी गृहस्थी शुरू करने के लिए, अपने लिए चूल्हे का इंतज़ाम किया, तो उस फॉर्म को भरते वक्त उसके हाथ नहीं काँपे। उसने उस आग के जीवनभर के ताप, उस चूल्हे की हर गर्माहट, उस रसोई की हर गंध का कानूनी और रूहानी उत्तराधिकारी अर्शिया को बना दिया। नॉमिनी के कॉलम में 'अर्शिया' लिख देना महज़ एक सरकारी खानापूरी नहीं थी; वह प्रताप का अर्शिया के नाम अपना घर सौंपना था। वह आग, जो भूख मिटाती है, वह आग, जो घर को रोशन करती है, उसका वारिस अब अर्शिया थी।
लेकिन समाज की दीवारें न तो हिंदी का शुद्ध व्याकरण समझती हैं और न ही उर्दू की मीठी शायरी। वे सिर्फ मज़हब का कड़वा गणित समझती हैं। अर्शिया के घर में जब इस अनाम, अदृश्य और पवित्र प्रेम की भनक लगी, तो एक ऐसा तूफ़ान खड़ा हुआ जिसने दोनों की दुनिया उजाड़ दी। आनन-फानन में, बहुत ही कम उम्र में, अर्शिया की मर्जी और उसकी आंसुओं को दरकिनार करते हुए, उसका निकाह किसी फय्याज़ नाम के युवक से तय कर दिया गया।
जिस लड़की की ज़ुबान कैंची की तरह चलती थी, जो समाज के हर नियम पर सवाल खड़े करती थी, उस हाज़िर-जवाब अर्शिया के होंठों पर मज़हब, समाज की इज़्ज़त और रस्मों-रिवाज़ों ने एक भारी, लोहे का ताला जड़ दिया। वह चुपचाप बलि के पशु की तरह निकाह के मंडप में बैठ गई।
जब यह खबर हैदराबाद पहुँची, तो प्रताप टूट कर बिखर गया। उसके भीतर का पूरा बघेलाँचल जैसे एक भीषण सूखे की चपेट में आ गया। लेकिन वह इतना स्वाभिमानी और अर्शिया का इतना सच्चा प्रेमी था कि उसने कोई तमाशा नहीं किया। उसने अर्शिया के घर जाकर कोई बगावत नहीं की। वह जानता था कि उसकी एक बगावती आवाज़, उसका एक कदम अर्शिया की दुनिया में आग लगा देगा, उसे समाज में कलंकित कर देगा। उसने अपने प्रेम की वेदी पर मौन की भारी चादर ओढ़ा दी। प्यार के उस निःशब्द इज़हार का अंत एक भयानक, असहनीय चुप्पी में हुआ।
"जब मन पीड़ा की हद से गुजर जाता है, तब मन रोता नही है, वो पत्थर हो जाता है।" प्रताप ने खुद को इसी पत्थर में तब्दील कर लिया था। उसने अपनी भावनाओं के कुएँ को पाटने का फैसला कर लिया था।
पर नियति की पटकथा में अभी सबसे क्रूर, सबसे वीभत्स अध्याय लिखा जाना बाकी था। अर्शिया का निकाह एक भयानक त्रासदी साबित हुआ, एक ऐसा नरक जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
अर्शिया की ज़िंदगी का वह दौर किसी बंद कमरे में घुटती हुई चीख जैसा था, जहाँ खिड़कियाँ भी दर्द से कांप उठती थीं। उसका पति फ़ैयाज़ दिन-भर रिक्शा चलाकर लौटता। शहर की सड़कों की धूल, पसीना, सवारी के न मिलने की हताशा और अपनी गरीबी का पूरा गुस्सा, अपनी सारी झुँझलाहट वह घर आते ही अर्शिया पर उतारने लगता। वह उसे इंसान नहीं, अपनी जागीर समझता था। वह उसे निर्दयता से बिस्तर पर पटक देता, जानवरों की तरह मारता-पीटता और फिर ऐसी माँग करता, जिसे पूरा करने की हालत में अर्शिया का लहूलुहान शरीर और टूटा हुआ मन होता ही नहीं था। दर्द से उसकी चीखें निकलतीं, वह गिड़गिड़ाती, मगर फ़ैयाज़ के भीतर बैठा वहशीपन उन चीखों में भी अपनी ज़िद और अपने पुरुषार्थ की आवाज़ सुनता था।
एक रात, जब ज़ुल्म अपनी सारी हदें पार कर गया, उसकी हृदयविदारक चीखें फ़ैयाज़ के अब्बू (ससुर) के कानों तक पहुँचीं। उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने कमरे का दरवाज़ा पीटकर बेटे को रोकते हुए कहा कि औरत के साथ इस तरह ज़ुल्म नहीं किया जाता, खुदा का खौफ करो। मगर फ़ैयाज़, जिसके सिर पर गुस्सा और अहंकार सवार था, उसने इसे अपने ऊपर रोक-टोक और अपनी मर्दानगी पर चोट समझा। बात बहुत बढ़ गई। उसने आपा खो दिया और आवेश में आकर अपनी ज़ुबान से वे तीन शब्द निकाल दिए जिसने अर्शिया की दुनिया पलक झपकते तबाह कर दी—उसने अर्शिया को तलाक़ दे दिया।
और जाते-जाते, अपनी नीचता का सबसे घिनौना रूप दिखाते हुए, वह अपने ही अब्बू पर इल्ज़ाम लगाकर बोला—“मेरे पीछे मेरा बाप मेरी औरत को खुश करता है!”
अर्शिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस रिश्ते को बचाने के लिए वह मार खाती रही, वह रिश्ता एक गंदी तोहमत के साथ टूट गया था। फिर भी, समाज के डर और एक अकेली औरत की विवशता के चलते, अर्शिया ने रिश्ता बचाने के लिए महीनों मिन्नतें कीं।
लगभग छह महीने बाद फ़ैयाज़ का गुस्सा शांत हुआ और वह वापस आने को तैयार हुआ, मगर उसकी वापसी के साथ उसने एक ऐसी शर्त रखी, जिसने अर्शिया के बचे-खुचे आत्मसम्मान, उसकी रूह और उसकी अस्मिता को भी चीर कर रख दिया। फ़ैयाज़ ने कहा कि वह दोबारा निकाह तभी करेगा, जब अर्शिया फैय्याज़ के अब्बू के साथ, उसकी आँखों के सामने 'हलाला' की रस्म निभाएगी।
उस मनहूस रात अर्शिया को पहली बार लगा कि तलाक़ से बड़ा, मौत से बड़ा भी कोई शब्द होता है—अपमान। जिस लड़की ने कभी प्रताप के साथ जीवन की खुली पगडंडियों पर चलने के, चाँद सितारों को छूने के ख्वाब देखे थे, उसे धार्मिक और सामाजिक कुरीतियों की सबसे भयावह, सबसे घिनौनी और मानसिक रूप से तोड़ देने वाली अंधेरी रात—'हलाला'—से गुज़रना पड़ा। अपने ही ससुर के साथ, एक अमानवीय दबाव के तहत, वह रात बिताकर, उसी नरक में वापस लौटने के लिए उसे विवश किया गया ताकि उसका वही ज़ालिम पति उससे दोबारा निकाह कर सके।
इस पूरी दर्दनाक प्रक्रिया में, वह हाज़िर-जवाब, निडर, सवालात पूछने वाली, आँखों में दरिया समेटे अर्शिया हमेशा के लिए मर चुकी थी। उसके भीतर की वह उफनती नदी, जो कभी समंदर में मिलकर खारेपन को मीठा करना चाहती थी, अब एक सूखे, मृत और खारे रेगिस्तान में बदल गई थी, जहाँ सिर्फ दर्द की रेत उड़ती थी।
उधर, समय के इस निष्ठुर और बेपरवाह चक्र में प्रताप का जीवन भी अपनी गति से आगे बढ़ गया था। परिवार के भारी दबाव, माँ की कसमों और लोक-लाज के तानों के बीच, प्रताप ने शीतल से विवाह कर लिया। शीतल अपने नाम की ही तरह सचमुच एक शांत, सौम्य नदी की तरह थी, जिसने प्रताप के जीवन के उस भयानक बंजरपन को अपने असीम समर्पण, अपनी निस्वार्थ सेवा से सींचने की पूरी कोशिश की।
अब उनकी एक छोटी सी बालिका है—स्वरात्मिका। स्वरात्मिका की तोतली बोली, पूरे घर में दौड़ते उसके नन्हे कदम और उसके घुँघराले बाल प्रताप के सूखे, रेगिस्तानी जीवन में सावन की ठंडी फुहारों की तरह आते हैं। प्रताप अब एक अच्छा पिता और एक ज़िम्मेदार पति है। वह अपनी गृहस्थी में खुश दिखने का अभिनय इतनी खूबी से कर लेता है कि शीतल को कभी इस बात का एहसास ही नहीं होता कि उसके पति का आधा हिस्सा बरसों पहले किसी और के पास गिरवी रखा जा चुका है।
शाम धीरे-धीरे ढल रही है। हैदराबाद के आसमान पर आज फिर गहरे काले बादल छाए हैं और सावन की झमाझम बारिश शुरू हो गई है। बारिश की बूँदें खिड़की के काँच पर इस तरह फिसल रही हैं, जैसे किसी की आँखों से थके हुए अश्क बह रहे हों। कमरे में अब लालटेन का वह युग नहीं रहा, उसकी जगह अब एलईडी बल्ब की तीखी और सफेद रोशनी ने ले ली है, लेकिन प्रताप के दिल में आज भी वही पीली, मध्यम लौ जल रही है।
प्रताप उस पुराने, जंग लगे संदूक के पास बैठा है। गैस कनेक्शन का वह पुराना, पीला कागज़ उसकी उँगलियों के बीच है। वह उसे ऐसे सहला रहा है जैसे वह कागज़ नहीं, बल्कि अर्शिया का चेहरा हो।
तभी पीछे से दरवाज़े की आहट होती है। शीतल हाथों में दो कप गर्म चाय लेकर कमरे में आती है। वह प्रताप के हाथ में उस पुराने कागज़ को देखती है। एक हल्की सी, निश्चिंत मुस्कान के साथ वह प्रताप के बगल में बैठती है और पूछती है, "क्या है इस कागज़ में जो आप हर बारिश में इसे निकाल कर बैठ जाते हैं? आज तो शहर में हर जगह गैस पाइपलाइन आ गई है, सिलेंडर का ज़माना चला गया, फिर भी आप ये पुरानी रसीद सहेज कर क्यों रखते हैं?"
प्रताप एक पल के लिए ठिठकता है। वह कागज़ को धीरे से मोड़कर अपनी निजी डायरी के पन्नों के बीच बड़ी हिफाज़त से वापस रख देता है। उसकी आँखें डबडबा जाती हैं। गले में रुलाई का एक इतना भारी गोला अटका है कि उसे निगलना मुश्किल हो रहा है, पर होंठों पर वह एक ऐसी दर्द भरी मुस्कान ओढ़ लेता है जिसमें बघेलाँचल की पूरी की पूरी उदास शाम डूब जाए।
"कुछ नहीं शीतल..." प्रताप अपनी आवाज़ का काँपना छिपाते हुए, बहुत ही संयत स्वर में कहता है, "बस एक पुरानी लालटेन की लौ है। चूल्हा भले ही इस घर में जलता हो, लेकिन आग आज भी उसी के नाम पर दर्ज है।"
शीतल नासमझी में, लेकिन एक मीठी मुस्कान के साथ चाय का कप उसकी ओर बढ़ा देती है। प्रताप चाय का कप थाम कर खिड़की के बाहर लगातार गिरती बारिश को देखता रहता है।
प्रेम समाप्त नहीं हुआ था, उसने सिर्फ अपना रूप बदल लिया था। वह अब किसी मिलन की खुशी में, किसी जिस्म के स्पर्श में, या किसी चिट्ठी के जवाब में नहीं था, बल्कि वह जीवन भर की एक कभी न खत्म होने वाली, दर्द भरी 'प्रतीक्षा' में बदल चुका था। एक ऐसी प्रतीक्षा जिसका कोई अंत नहीं। जहाँ गैस की लौ तो प्रताप के घर जलती थी, उस आग पर प्रताप के परिवार की रोटियाँ सेंकी जाती थीं, लेकिन उस आग की तपिश से आज भी मीलों दूर, किसी अंधेरे कमरे में बैठी अर्शिया की मृतप्राय रूह सेंकी जा रही थी। और यही वह अनकहा, मुकम्मल अधूरापन था, जो इस बघेली इश्क़ और उर्दू इंतज़ार की सबसे बड़ी गवाही था।
आचार्य प्रताप