man gaya hai Dr Archana pandey

समीक्षक: आचार्य प्रताप
पुस्तक-परिचय
पुस्तक का नाम: मन गाता है
लेखक: डॉ. अर्चना पाण्डेय
विधा: काव्य-संग्रह (ग़ज़ल, माहिया, गीत)
प्रकाशक: उल्लिखित नहीं  (स्वयं प्रकाशन के करण)
कुल पृष्ठ: 146
प्रकाशन वर्ष: 2022
ISBN: 
मूल्य: ₹ 250


समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जब मैं एक समीक्षक की दृष्टि से विचार करता हूँ, तो पाता हूँ कि आज की कविता बौद्धिक विमर्शों और जटिल शिल्प के चक्रव्यूह में उलझकर अक्सर अपनी रागात्मकता और सहज मानवीय संवेदनाओं से दूर हो जाती है। ऐसे समय में जब मेरे समक्ष डॉ. अर्चना पाण्डेय का काव्य-संग्रह "मन गाता है" अध्ययनार्थ उपस्थित हुआ, तो इसके पन्नों से गुजरते हुए मुझे यह अनुभव हुआ कि कविता का मूल तत्त्व उसकी वैचारिकी से अधिक उसकी अनुभूतियों की प्रामाणिकता में निहित होता है। यह संग्रह मुख्य रूप से तीन विधाओं—ग़ज़ल, माहिया और गीत—का एक विस्तृत वितान प्रस्तुत करता है, जिनमें कवयित्री ने जीवन, प्रकृति, राष्ट्रप्रेम, और मानवीय संबंधों की बहुआयामी छवियों को उकेरा है। प्रस्तुत समीक्षा में मैं इस कृति के कथ्य, शिल्प, भाषा-शैली, और दार्शनिक दृष्टि का निष्पक्ष, तटस्थ और सोदाहरण विश्लेषण करूँगा।

संग्रह का आरंभ 'सरस्वती वंदना' से होता है, जहाँ कवयित्री ने अपनी लेखनी को लोकमंगल से जोड़ने की कामना की है। इस वंदना की पंक्तियाँ हैं:
"तमसो माँ ज्योतिर्गमय का, मंत्र सजाए आरती
आलोकित कर दो सब राहें, जय हो माँ भारती"

यहाँ 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' जैसे उपनिषदिक सूत्र का प्रयोग भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रति उनके झुकाव को स्पष्ट करता है। इन पंक्तियों में अनुप्रास अलंकार का सहज प्रयोग है। कवयित्री स्वयं के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के पथ को आलोकित करने की प्रार्थना कर रही है, जो उनके वृहद सामाजिक सरोकार और 'सत्यं शिवं सुंदरम्' की दार्शनिक दृष्टि का परिचायक है।
संग्रह के प्रथम खंड में ग़ज़लें संकलित हैं। डॉ. अर्चना की ग़ज़लें पारंपरिक उर्दू शायरी के 'गुल-ओ-बुलबुल' या नितांत ऐंद्रिक प्रेम के दायरों को तोड़कर राष्ट्रीय चेतना और जीवन के यथार्थ की ओर मुड़ती हैं। उनकी पहली ही ग़ज़ल की ये पंक्तियाँ उनके राष्ट्र-प्रेम को अत्यंत मुखर रूप में प्रस्तुत करती हैं:
"मिलेगा न ऐसा वतन देख लेना,
हिमालय से ऊँचा है मन देख लेना।
नहीं मिल सकेगी कहीं ऐसी ममता,
जहाँ पर पले हर सपन, देख लेना।"

इन पंक्तियों में भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक महानता को 'हिमालय से ऊँचे मन' के बिंब के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। यहाँ अतिशयोक्ति और उपमा अलंकार का सुंदर समन्वय है। वीर रस और वात्सल्य का एक सूक्ष्म मिश्रण यहाँ दिखाई देता है जहाँ मातृभूमि की 'ममता' में पलने वाले 'सपनों' की बात की गई है। हालांकि, शिल्प की कसौटी पर परखें तो 'सपन' शब्द का प्रयोग काव्यात्मक छूट के रूप में किया गया है, जो खड़ी बोली की व्याकरणिक सुदृढ़ता को किंचित कमजोर करता है। ग़ज़ल की बहर (छंद) के निर्वहन में कवयित्री ने भावों को प्राथमिकता दी है, जिसके कारण यत्र-तत्र मात्राओं का पतन दिखाई देता है, परंतु कथ्य की प्रामाणिकता इस दोष को बहुत हद तक ढँक लेती है।
प्रकृति के मानवीकरण का अत्यंत मनोहारी दृश्य ग़ज़ल 05 में देखने को मिलता है। सावन की बूँदों का ऐसा जीवंत और संवेदी बिंब समकालीन साहित्‍य में दुर्लभ है:

"हथेली पे उतरी हैं सावन की बूँदें,
बड़ी मुस्कुराती हैं सावन की बूँदें।
तरसता था मन, हम इन्हें बढ़ के छू लें,
बहुत गुदगुदाती हैं सावन की बूँदें।"

यहाँ सावन की बूँदों का मानवीकरण (Personification) किया गया है। 'बूँदों का मुस्कुराना' और 'गुदगुदाना' दृश्य और स्पर्श बिंब का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इन पंक्तियों में शृंगार रस का उजला और सात्विक रूप निखर कर आया है। भाषा में रवानी है और रदीफ़ 'सावन की बूँदें' का निर्वाह बहुत ही सलीके से किया गया है। काफ़िया (उतरी, मुस्कुराती, गुदगुदाती) का संयोजन गज़ल को एक सांगीतिक लय प्रदान करता है, जो इसे गेयता के गुण से समृद्ध करता है।
कवयित्री की दृष्टि केवल प्रकृति के सुहावने रूप तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और पर्यावरण के प्रति उनकी चिंता भी मुखर हुई है। ग़ज़ल 28 में केरल में एक गर्भवती हथिनी की निर्मम हत्या की घटना को जिस तरह उन्होंने अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया है, वह उनकी गहरी मानवीय संवेदना और समकालीन विमर्शों पर उनकी पैनी पकड़ को सिद्ध करता है:

"जिस तरह हथिनी को हमने मौत दी है,
गूँजती है कान में उसकी पुकारें।
वन हुए वीरान, हरियाली कहाँ है?
वक़्त हो तो हम सभी इस पर विचारें।"

ये पंक्तियाँ मानव की क्रूरता और पर्यावरण के क्षरण पर एक सीधा प्रहार हैं। यहाँ कोई लाक्षणिकता या वक्रोक्ति नहीं है, बल्कि अभिधा शब्द-शक्ति के माध्यम से क्रूर यथार्थ को सामने रखा गया है। करुण रस से ओतप्रोत ये पंक्तियाँ पाठक के हृदय में गहरी कसक छोड़ जाती हैं। कवयित्री ने समाज को कठघरे में खड़ा किया है, जो साहित्य के मूल उद्देश्य—समाज का दर्पण होने—को सार्थकता प्रदान करता है।

एक समालोचक के नाते जब मैं इस संग्रह के दूसरे खंड 'माहिए' की ओर बढ़ता हूँ, तो मुझे एक सुखद आश्चर्य होता है। 'माहिया' मूल रूप से पंजाबी लोक साहित्य का एक छोटा और अत्यंत मारक छंद है, जिसे हिंदी में बहुत कम रचनाकारों ने सफलता के साथ साधा है। डॉ. अर्चना ने इस त्रि-पदी छंद के अनुशासन को समझते हुए भावों की गहनता को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है। क़िस्त 11 का यह माहिया उनके युगबोध का श्रेष्ठ प्रमाण है:

"उस माँ का वन्दन है
गौरव है जिस का
बेटा 'अभिनन्दन' है"

भारतीय वायुसेना के जाँबाज विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान के शौर्य को मात्र ग्यारह शब्दों में जिस प्रकार पिरोया गया है, वह गागर में सागर भरने के समान है। यह माहिया वीर रस और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत दृष्टांत है। इसी प्रकार कवयित्री ने भाषाई विविधता का परिचय देते हुए भोजपुरी में भी माहिए रचे हैं, जो उनकी लोक-संस्कृति से जुड़ाव को प्रमाणित करते हैं। क़िस्त 10 का यह माहिया दृष्टव्य है:

"अँखियन से नीर बहे, (१२)
अइसन लाचारी, (१०)
हिरदय सब पीर सहे।" (१२)

भोजपुरी की मिठास और विप्रलंभ शृंगार (वियोग) की पीड़ा इस माहिए में घनीभूत होकर उभरी है। 'अँखियन' और 'हिरदय' जैसे तद्भव शब्दों का प्रयोग लोक-संवेदना को और अधिक सघन बनाता है। यहाँ शिल्प एकदम कसा हुआ है और नाद-सौंदर्य अपने चरमोत्कर्ष पर है।
संग्रह का तीसरा और सर्वाधिक विस्तृत खंड गीतों का है। यहाँ डॉ. अर्चना की भाषा अधिक प्रवाहमयी, लाक्षणिक और बिंब-प्रधान हो गई है। गीत 08 'मैं सत्य हूँ' एक स्त्री के आत्म-संघर्ष, स्वाभिमान और जिजीविषा का सशक्त घोषणा-पत्र है। ये पंक्तियाँ स्त्री-विमर्श के सर्वथा नए आयाम को अनावृत करती हैं:

"मैं जलती हूँ
पर जलने को नहीं
और अधिक निखरने को
मैं चलती हूँ
थकने को नहीं
बहुत दूर तक चलने को"

इन पंक्तियों में विरोधाभास अलंकार का सुंदर पुट है। 'जलना' यहाँ विनाश का नहीं, बल्कि स्वर्ण की भाँति कुंदन बनने की प्रक्रिया का प्रतीक है। यह एक दार्शनिक ऊंचाई है जहाँ पीड़ा को एक साधन के रूप में स्वीकार किया गया है। यह गीत महादेवी वर्मा की 'मैं नीर भरी दुख की बदली' की पीड़ा से आगे बढ़कर एक आधुनिक, संकल्पबद्ध और आत्म-निर्भर स्त्री की हुंकार में परिवर्तित हो जाता है। कवयित्री का यह स्वर समकालीन हिंदी साहित्य में अत्यंत प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण है।

इसी क्रम में गीत 10 'ऐ सावन के मेघ' में कवयित्री का यथार्थवादी दृष्टिकोण और कृषक जीवन की त्रासदी का अत्यंत मार्मिक चित्रण सामने आता है। जहाँ ग़ज़ल 05 में सावन की बूँदें गुदगुदा रही थीं, वहीं इस गीत में वे ही बूँदें विनाश का कारण बन जाती हैं:

"हम रिमझिम में तुम्हें बुलाते,
तुम बाढ़ों में आते हो,
जीवन की हरियाली को तुम,
संग बहा ले जाते हो।
सच्ची खुशी तभी मिलती है,
जब सारे खुश होते है,
पेट में भूख सुलगते हों,
तो क्या मन हर्षाते हैं?"

ये पंक्तियाँ प्रगतिशील चेतना का सटीक उदाहरण हैं। यहाँ प्रकृति का रौद्र रूप और सर्वहारा वर्ग (किसानों) की विवशता चित्रित है। 'पेट में भूख सुलगना' एक अत्यंत सशक्त दृश्य बिंब है, जो अभावों की आग को प्रत्यक्ष कर देता है। कवयित्री का यह प्रश्न कि जब पेट में भूख हो तो मन कैसे हर्षित हो सकता है, मार्क्सवादी चिंतन और प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा का स्मरण कराता है। यह गीत प्रमाणित करता है कि कवयित्री का मन केवल कल्पना के आकाश में उड़ान नहीं भरता, बल्कि वह यथार्थ की खुरदुरी ज़मीन पर भी मजबूती से टिका हुआ है।
सांस्कृतिक और आंचलिक बिंबों का एक विशाल चित्रपट गीत 16 'वो गंगा-घाट है' में देखने को मिलता है। इस गीत में प्रयागराज और संगम तट का जो सजीव और ध्वन्यात्मक चित्रण किया गया है, वह पाठक को सीधे गंगा के घाट पर खड़ा कर देता है:

"कहीं साधु, कहीं पंडे, कहीं पर संत हैं,
भक्तों से घिरे मठ के कहीं महंत हैं
नहाते, अर्घ्य देते सुरसरि का घाट है
केवट नाव खेता है, ये गंगा-घाट है।"

इन पंक्तियों में 'रेला', 'मेला', 'गुड़ही जलेबी', 'पूड़ी कचौड़ी' जैसे ठेठ देशी शब्दों का प्रयोग गीत में अद्भुत आंचलिकता भर देता है। यहाँ शांत रस और भक्ति रस की अजस्र धारा प्रवाहित हुई है। दृश्य बिंबों की एक शृंखला है जो सिनेमाटोग्राफिक प्रभाव उत्पन्न करती है। भाषा में प्रवाह है और लोक-संस्कृति के प्रति गहरा अनुराग स्पष्ट झलकता है।
अब यदि मैं एक निष्पक्ष समालोचक के रूप में इस कृति की सीमाओं और कमियों का विश्लेषण करूँ, तो कुछ तथ्य स्पष्ट रूप से उभरते हैं। यद्यपि भाव-पक्ष अत्यंत सबल है, परंतु कई स्थानों पर कला-पक्ष और शिल्प की शिथिलता अखरती है। ग़ज़लों में बहर का अनुशासन कई बार टूटा है, जिससे ग़ज़ल की स्वाभाविक रवानी और तरन्नुम बाधित होता है। उदाहरण के लिए ग़ज़ल 15 की इस पंक्ति को देखें:

"जीत पर हमको नहीं ऐसे बहकना चाहिए,
हारने वालों के ना आँसू छलकना चाहिए।"

यहाँ भाव उत्कृष्ट है, परंतु 'बहकना' और 'छलकना' काफ़िया के रूप में व्याकरणिक दृष्टि से सटीक नहीं बैठते, क्योंकि 'जीत' और 'आँसू' के साथ क्रिया का संयोजन भिन्न होना चाहिए था। इसी प्रकार, कई गीतों और ग़ज़लों में तुकांत को साधने के लिए शब्दों को बहुत सामान्य या गद्यात्मक स्तर पर ला दिया गया है। कहीं-कहीं पुनरावृत्ति  का दोष भी दृष्टिगोचर होता है; जीवन की शिकायतों और हौसलों से जुड़े भाव कई ग़ज़लों में एक ही शब्दावली के इर्द-गिर्द घूमते प्रतीत होते हैं। भाषा के स्तर पर, कवयित्री ने उर्दू, हिंदी, तद्भव और देशज शब्दों का प्रयोग किया है, परंतु कई बार एक ही शेर या गीत में इन भिन्न प्रकृतियों के शब्दों का संयोजन उतना निर्दोष नहीं बन पाया है, जिससे शैली में एक प्रकार का 'पैबंद' सा लगता है।

निष्कर्षतः मेरा यह स्पष्ट मत है कि डॉ. अर्चना पाण्डेय का काव्य-संग्रह "मन गाता है" शिल्प के कतिपय आवरणों से मुक्त होकर सीधे हृदय से हृदय तक संवाद करने वाली कृति है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी विषयगत विविधता और अनुभूतियों की ईमानदारी है। कवयित्री ने कृत्रिम अलंकरण या दुरूह प्रतीकों का आश्रय लेने के बजाय सहज और संप्रेष्य भाषा को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। जहाँ एक ओर इनमें राष्ट्रप्रेम का ओज है, वहीं दूसरी ओर मानवीय पीड़ा, विरह और स्त्री-स्वाभिमान की मुखर अनुगूंज भी है। शिल्पगत कमियों के बावजूद, समकालीन हिंदी साहित्य में यह संग्रह अपनी सादगी, तरलता और सामाजिक सरोकारों के कारण एक विशिष्ट स्थान का अधिकारी है। यह एक ऐसी पुस्तक है जो पाठक को चमत्कृत करने के बजाय उसके भीतर संवेदनाओं का एक धीमा, लेकिन स्थायी स्पंदन पैदा करती है। समकालीन यांत्रिक दौर में, जहाँ मनुष्य का मन निरंतर कोलाहल से घिरा है, वहाँ इस संग्रह का स्वर प्रमाणित करता है कि तमाम झंझावातों के बीच भी यदि मनुष्यता शेष है, तो 'मन गाता है'।


-आचार्य प्रताप


Achary Pratap

समालोचक , संपादक तथा पत्रकार प्रबंध निदेशक अक्षरवाणी साप्ताहिक संस्कृत समाचार पत्र

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